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जिस इश्क़ में..., ये दिल हारा था...

उस इश्क़ से ही... ये दिल जिन्दा है....

जो मज़ा तलब मे है.....

वो हासिल मे कहा.....

होता होगा तुम्हारी दुनियाँ में गहरा समंदर ...

हमारे यहाँ.... इश्क से गहरा कुछ भी नहीं....

जब तेरे नहीं हुए...

तो पत्थर के हो गए हम......

काजू बादाम खाना छोड़ो.....

धोखा खाओ......

ज्यादा अक्ल आएगी.........

मेरी तरह ज़रा भी तमाशा किए बग़ैर....

रो कर दिखाओ आँख को गीला किए बग़ैर....

दो ही चीज़ बाकी है मुझ मैं......

एक रूह.... दूजा वो.....

चर्चा ए खास हो तो किस्से भी जरूर होते है...

उंगलियां उन्ही पर उठती है.. जो मशहूर होते हैं....

सबका गुनाह मैं अपने माथे ले लेता हूँ....

जहां में मुझे बस एक ही शख्स गुनाहगार चाहिए....

मजबूरी के नाम पर ही हारा हैं अक्सर इश्क.....

वो वहां मजबूर हुयें...और हम यहां तन्हा....