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भ्रात प्रेम

एक शहर में रमेश और महेश नाम के दो सगे भाई रहते थे। उनके बीच में संपत्ति के बँटवारे को लेकर मतभेद थे जो कि इतने बढ़ गये थे कि उनमें आपस में बातचीत भी बंद हो गई थी।
एक दिन महेश एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया और उसे अस्पताल ले जाया गया। वहाँ पर चिकित्सकों ने उसका तुरंत आपरेशन करने का निर्णय लिया और इसके लिए रक्त की आवश्यकता थी। महेश का ब्लड ग्रुप बहुत ही दुर्लभ था जो कि बहुत तलाश करने पर भी उपलब्ध नही हो पा रहा था। जब इस बात की जानकारी रमेश को लगी तो वह तुरंत भागा भागा अस्पताल आया और अपना खून देने की पेशकश की क्योंकि उसका ब्लड ग्रुप भी महेश के ब्लड ग्रुप से मेल खाता था।
यह जानकर रमेश के पहचान वालों ने उसे समझाना शुरू किया कि तुम रक्तदान मत करो। यह तुम्हारा सगा भाई होते हुए भी तुम्हारे हिस्से की भी संपत्ति हडपने की फिराक में था। ऐसे व्यक्ति से इतनी सहानुभूति क्यों ? वहाँ पर महेश के हितैषियों ने भी उसके परिजनों को कहने लगे कि रमेश भाई होते हुए भी किसी दुश्मन से कम नही है। वह महेश के हिस्से की संपत्ति को भी हड़पना चाहता है। ऐसे व्यक्ति से कोई भी सहयोग लेना उचित नही है।
इतना बोलने के बाद भी रमेश ने अपना खून दिया और महेश ने उसे स्वीकार कर लिया और आपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अपने भाई को मुसीबत में देखकर उसके प्रति उमडे प्रेम ने दोनो के बीच के संपत्ति के बँटवारे के विवाद को सुलझा दिया और वे पुनः एक हो कर रहने लगे।

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शव की शवयात्रा

नर्मदा नदी के बहाव के साथ एक शव भी बह रहा था जो कि लकडियों की अर्थी पर रखा हुआ, फूल मालाओं से ढका हुआ था। उस शव को अपनी ओर आता देख नदी में स्नान कर रहे लोग भाग खड़े हुए, इसकी सूचना जब स्थानीय प्रशासन तक पहुँची तो वे भी चौक गये क्योंकि आज ही सायंकाल नर्मदा मैया की आरती के समय प्रदेश के मंत्री जी द्वारा नर्मदा शुद्धिकरण अभियान पर अपना उद्बोधन जनता के बीच देने वाले थे। यदि यह शव बहता हुआ मंत्री जी के कार्यक्रम के दौरान उस घाट पर पहुँच जाता तो बहुत भारी हंगामा खडा हो सकता था। सभी अधिकारीगण एकमत थे कि येन केन प्रकारेण शव को तुरंत नदी से निकाला जाए। अब गोताखोरों की एक टीम शव को अपने नियंत्रण में लेकर उसे किनारे ले आयी। उन्होने जब शव को देखा तो वे सभी चौक गये और उन्होने अपने अधिकारियो को इस बात से तुरंत अवगत कराया। यह जानकर अधिकारीगण भी सकते में आ गये और उन्होने तुरंत मामले को रफा दफा करने का निर्देश दे दिया।
मंत्री जी अपने निर्धारित समय पर नर्मदा जी के घाट पर पहुँचे और आरती में शामिल होने के उपरांत नर्मदा जी को प्रदूषण से मुक्त कराने की नयी योजनाओं की जानकारी जनता को प्रदान करके वापिस चले गये। उनके जाने के उपरांत अधिकारीगण आपस में एक दूसरे को बता रहे थे कि यह कार्य किसी राजनैतिक व्यक्ति के द्वारा किया गया हो सकता है।
वह शव जो नदी में बह रहा था, वह वास्तव में शव ना होकर एक पुतला था जिसका रंग, रूप एवं आकार हूबहू मंत्री जी से मिलता था। किसी के द्वारा हंगामा खड़ा करने की नीयत से यह कार्य किया गया था। यदि आरती के निर्धारित समय पर यह बहकर उस घाट पर पहुँच जाता तो उससे अप्रिय स्थिति निर्मित होकर एक बवाल मच सकता था। अब सभी अधिकारीयों ने भगवान के प्रति धन्यवाद व्यक्त करते हुए, श्रद्धापूर्वक नर्मदा मैया के प्रति भी आभार व्यक्त किया। हमें आजकल पुनीत कार्य में भी अवरोध पैदा करने वाले शरारती तत्वों से सदैव सावधान रहना चाहिए।

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अक्षयपात्र

हरिप्रसाद एक मध्यमवर्गीय परिवार से था जो कि बी.काम अंतिम वर्ष में अध्ययनरत था। एक दिन वह अपने मित्र जो कि शासकीय अस्पताल में भर्ती था उसे देखने के लिए गया था। वहाँ उसने महसूस किया कि ऐसे अस्पतालों में गरीब लोग ही आते है और जनसुविधा के नाम पर बहुत ही सीमित सुविधाएँ उन्हें उपलब्ध होती है। उसके मित्र का दोपहर के भोजन का समय हो गया था और उसे संतुलित आहार अस्पताल के माध्यम से प्रदान किया जाता था।
उसका मित्र जब भोजन कर रहा था तो उसके बगल में लेटे हुए दूसरे मरीज के परिवार का एक बच्चा अपनी माँ से भूख लगने की बात कहकर भोजन देने के लिए कह रहा था परंतु उसकी माँ उसे हर बार चुप करा देती थी शायद उसे पास भोजन खरीदने के लिए रूपये नही थे। हरिप्रसाद को यह दृश्य बहुत द्रवित कर रहा था। उसने अपने मित्र से पूछा कि क्या यहाँ पर मरीजों के साथ आने वालों के लिए भोजन की व्यवस्था नही है ? उसके मित्र ने यह सुनकर कहा कि यहाँ मरीजों को ही भोजन प्रदान किया जाता है उसके साथ आये हुए लोगों को बाहर अपनी व्यवस्था स्वयं करनी पडती है। यदि आपके धन खर्च करने की क्षमता है तो आप भोजन खरीद कर खा सकते है अन्यथा आपको स्वयं ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी।
कुछ समय पश्चात हरिप्रसाद वापस आ जाता है परंतु उसके मन में यह चिंतन चलता रहता है कि ऐसे गरीब व्यक्तियों के लिए जो अपने परिजनों के इलाज के लिए अस्पताल आते है उनके भोजन के लिए भी कुछ व्यवस्था की जानी चाहिए। हरिप्रसाद के पास साधन बहुत सीमित थे फिर भी उसने अपने मित्रों के साथ मिलकर गरीब मरीजों के परिजनों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराना प्रारंभ कर दिया।
इस जनसेवा की खबर जब शहर के समाज सेवी संगठनों तक पहुँची तो उन्होने इसकी विस्तृत जानकारी लेने हेतु हरिप्रसाद को अपने पास बुलाया। उसकी कार्ययोजना को सुनकर वे सभी बहुत प्रभावित हुए और हरिप्रसाद के अनुरोध पर वे भी इस जनहितकारी कार्य में अपना सहयोग देने के लिए सहमत हो गये। अब यह कार्य और भी विस्तृत और सुचारू रूप से होने लगा था और इस कार्य की महत्वता को देखते हुए एक उद्योगपति ने भोजन वितरण की सुविधा हेतु एक मारूति वेन प्रदान कर दी।
हरिप्रसाद ने अपनी सेवा के विस्तार को देखते हुए एक ट्रस्ट की स्थापना कर की जिसका नाम अक्षयपात्र रखा गया। धीरे धीरे इस योजना का विस्तार दूसरे शासकीय अस्पतालों में भी हो गया। इस प्रकार एक छात्र की दृढ इच्छा शक्ति, लगन और समर्पण की भावना ने जनसहयोग से एक अविस्मरणीय कार्य संपन्न करके दिखा दिया।

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संकल्प ही सफलता का सूत्र है

श्री संजय सेठ एक सुप्रसिद्ध चार्टर्ड एकाऊंटेंट होने के साथ साथ संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठ चिकित्सक स्वर्गीय डा. जे.एन. सेठ के ज्येष्ठ पुत्र भी है। वे नगर के सुप्रसिद्ध नर्मदा क्लब जिसका निर्माण ब्रिटिश शासन काल में सन् 1889 में हुआ था और इसी क्लब में विश्व में सबसे पहली बार स्नूकर का खेल खेला गया था। वह ऐतिहासिक टेबिल जिस पर इस खेल को खेला गया था आज भी यहाँ पर सुरक्षित है। ऐसे प्रतिष्ठित नर्मदा क्लब में वे सन् 2004 से लगातार अध्यक्ष पद हेतु निर्वाचित हो रहे है।
वे अपने बीते हुए जीवन के विषय में बताते हैं कि उन्होंने विज्ञान विषय में बी.एस.सी की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वे असमंजस में थे कि वे विज्ञान विषय में आगे अध्ययन करें या अपनी शैक्षणिक दिशा बदल ले क्योंकि उनकी अभिरूचि चार्टर्ड एकाउटेंट बनने की दिशा में हो गई थी। उनका कहना है कि वह समय बहुत ही चुनौतीपूर्ण लग रहा था और उनके शुभचिंतकों की सलाह थी कि विज्ञान विषय में उत्तीर्ण होने के पश्चात सी.ए. की परीक्षा में सफल होना बहुत कठिन है। उनके साथ पढने वाले एक सहपाठी ने सबके सामने उन्हें ताना मारते हुए कहा कि ये तो पढाई में इतने होशियार है कि सी.ए बन ही जायेंगे।
उसकी इस उलाहना से उन्होने मन में यह संकल्प लिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाये, उन्हें कितना भी परिश्रम क्यों ना करना पडें, वे सी.ए की परीक्षा को अवश्य उत्तीर्ण करके ही रहेंगें। इस दृढ निश्चय के कारण वे रात दिन अपने संकल्प को पूर्ण करने में व्यस्त हो गये। उनके परिवार के सदस्यों ने भी उनका मनोबल बढाया और सी.ए. की परीक्षा के उपरांत जब परीक्षा परिणाम आया तो वे आश्चर्यचकित रह गये और उन्हें महसूस हुआ जैसे वे कोई स्वप्न देख रहे हो परंतु यह हकीकत थी कि वे अच्छे नंबरों से सी.ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये थे।
उन्होंने अपने परिवार की भावना के अनुसार अपने पैतृक स्थल जबलपुर से ही प्रैक्टिस शुरू की और सफलता के उच्च आयामों को छुआ। उनका युवाओं के लिए संदेश है कि इंसान सच्चे मन से कोई संकल्प ले और उस दिशा में अथक परिश्रम करे तथा ईमानदारी से प्रयासरत् रहे तो कोई भी ऐसी मंजिल नही है जिसे वह पा नही सकता हो।

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धर्म और कर्म

एक दिन धर्म और कर्म में संवाद होने लगा कि उनमें से कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे दोनो एक संत के पास पहुँचे और उनसे इस विषय पर मार्गदर्शन देने का अनुरोध करने लगे। संत जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि तुम दोनो एक दूसरे के पर्याय हो और एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नही है। यदि धर्म नही होगा तो कर्म सही दिशा में नही होगा वह दिग्भ्रमित हो जायेगा। यदि कर्म नही होगा तो धर्म की प्रधानता समाप्त हो जायेगी क्योंकि कोई भी कार्य धर्मपूर्वक होकर सही दिशा में ही हो इसका निर्धारण करना असंभव हो जायेगा।
इसलिये कहा जाता हैं कि धर्मपूर्वक कर्म करने से सृजन सही दिशा में होता है जिसका लाभ व्यक्ति, समाज और सबको प्राप्त होता है। अब तुम दोनो स्वयं निर्णय लो कि एक के बिना दूसरे का क्या अस्तित्व रहेगा। इसलिये कहा जाता है कि कलयुग में कर्म आगे और धर्म उसके पीछे और सतयुग में धर्म आगे और कर्म उसके पीछे रहता है। उन दोनो की स्थिति उस रेलगाडी के समान है जिसमें एक इंजिन और एक गार्ड रहता है और दोनो की सहमति के बिना रेलगाडी प्रस्थान नही कर सकती। उसी प्रकार मानव जीवन धर्मपूर्वक कर्म के बिना अपूर्ण है। संत जी की बात उनकी समझ में आ गयी और उनके मन से अभिमान समाप्त हो गया तथा वे पहले की तरह एक दूसरे के प्रति समर्पित हो गये।

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नैतिकता

परमानंद जी एक सफल व्यापारी के साथ साथ राजनीति में भी गहरी पैठ रखते थे। वे अपने गृहनगर में भारी मतों से जीतकर एम.एल.ए भी बन गये थे। एक दिन मुख्यमंत्री जी ने अपने कार्यालय में किसी कार्यवश उन्हें बुलाया था। उस दिन दुर्भाग्य से परमानंद जी के निजी सेवक इमरतीलाल, जिसने उन्हें बचपन से पाल पोसकर बडा किया था, वह अचानक हृदयाघात के कारण अस्पताल में गंभीर अवस्था में भर्ती किया गये थे। परमानंद जी स्वयं उसकी देखभाल में व्यस्त थे और उन्होंने मुख्यमंत्री जी को संदेश भिजवा दिया था कि उनके निजी सेवक की तबीयत अधिक खराब होने के कारण वे उनसे नियत समय पर मिल पाने में असमर्थ है।
यह सुनकर मुख्यमंत्री जी काफी नाराज हो गये और सोचने लगे कि यह कैसा व्यक्तित्व है जिसके लिए मुख्यमंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका नौकर है। इस घटना के कुछ समय बाद ही इमरतीलाल की तबीयत स्थिर हो जाने के पश्चात परमानंद जी मुख्यमंत्री जी के पास मिलने के लिये गये। मुख्यमंत्री जी ने मुलाकात के दौरान व्यंग्य करते हुए कहा कि आप बहुत बडे राजनीतिज्ञ हो गये है आपके लिए मुख्यमंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण नौकर है।
यह सुनकर परमानंद जी जो कि एक बहुत स्वाभिमानी और स्पष्ट वक्ता थे। उन्होंने निडर होकर जवाब दिया कि जिस व्यक्ति की गोद में बचपन में खेल कर मे बडा हुआ और जो आजतक मेरी देखभाल परिवार के सदस्य के समान कर रहा हो, उसकी तबीयत के विषय में समय देना मेरे लिए आप से मिलने से ज्यादा महत्वपूर्ण था। मै इस पद पर वैसे भी समाज के कल्याण एवं जनता की सेवा के लिए चुना गया हूँ। यदि आपको यह लगता है कि मेरे इस कृत्य से आपका अपमान हुआ है, तो मैं विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे सकता हूँ।
यह सुनते ही मुख्यमंत्री जी का पारा एक दम से ठंडा हो गया और वे हतप्रभ होकर परमानंद जी के चेहरे की ओर देखने लगे। उन्हें ऐसे स्पष्ट जवाब की अपेक्षा नही थी। उन्होंने इस्तीफा ना देने का अनुरोध करते हुए, दूसरे दिन मिलने के लिए कह दिया। दूसरे दिन मुलाकात होने पर उन्होंने परमानंद जी की तारीफ करते हुए कहा कि आप जैसे व्यक्तित्व आज के समय में बिरले ही होते हे। आपका निर्णय समय एवं परिस्थितियों के अनुसार एकदम सही था।

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प्रायश्चित

एक कस्बे में एक गरीब महिला जिसे आँखो से कम दिखता था, भिक्षा माँगकर किसी तरह अपना जीवन यापन कर रही थी। एक दिन वह बीमार हो गई, किसी दयावान व्यक्ति ने उसे इलाज के लिये 500रू का नोट देकर कहा कि माई इससे दवा खरीद कर खा लेना। वह भी उसे आशीर्वाद देती हई अपने घर की ओर बढ़ गई। अंधेरा घिरने लगा था, रास्ते में एक सुनसान स्थान पर दो लड़के षराब पीकर ऊधम मचा रहे थे। वहाँ पहुँचने पर उन लड़को ने भिक्षापात्र में 500रू का नोट देखकर शरारतवश वह पैसा अपने जेब में डाल लिया, महिला को आभास तो हो गया था पर वह कुछ बोली नही और चुपचाप अपने घर की ओर चली गई।
सुबह दोनो शरारती लड़को का नशा उतर जाने पर वे अपनी इस हरकत के लिये शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। वे शाम को उस भिखारिन को रूपये वापस करने के लिये इंतजार कर रहे थे। जब वह नियत समय पर नही आयी तो वे पता पूछकर उसके घर पहुँचे जहाँ उन्हें पता चला कि रात्रि में उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गयी और दवा न खरीद पाने के कारण वृद्धा की मृत्यु हो गई थी। यह सुनकर वे स्तब्ध रह गये कि उनकी एक शरारत ने किसी की जान ले ली थी। इससे उनके मन में स्वयं के प्रति घृणा और अपराधबोध का आभास होने लगा।
उन्होने अब कभी भी शराब न पीने की कसम खाई और शरारतपूर्ण गतिविधियों को भी बंद कर दिया। उन लडकों में आये इस अकस्मात और आश्चर्यजनक परिवर्तन से उनके माता पिता भी आश्चर्यचकित थे। जब उन्हें वास्तविकता का पता हुआ तो उन्होने हृदय से मृतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुये अपने बच्चों को कहा कि तुम जीवन में अच्छे पथ पर चलो और वक्त आने पर दीन दुखियों की सेवा करने से कभी विमुख न होओ, यहीं तुम्हारे लिये सच्चा प्रायश्चित होगा।

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संकल्प

जबलपुर शहर से लगी हुई पहाडियों पर एक पुजारी जी रहते थे। एक दिन उन्हें विचार आया कि पहाडी से गिरे हुये पत्थरों को धार्मिक स्थल का रूप दे दिया जाए। इसे कार्यरूप में परिणित करने के लिये उन्होने एक पत्थर को तराश कर मूर्ति का रूप दे दिया और आसपास के गांवों में मूर्ति के स्वयं प्रकट होने का प्रचार प्रसार करवा दिया।
इससे ग्रामीण श्रद्धालुजन वहाँ पर दर्शन करने आने लगे। इस प्रकार बातों बातों में ही इसकी चर्चा शहर भर में होने लगी कि एक धार्मिक स्थान का उद्गम हुआ हैं। इस प्रकार मंदिर में दर्षन के लिये लोगों की भारी भीड़ आने लगी। वे वहाँ पर मन्नतें माँगने लगे। अब श्रद्धालुजनो द्वारा चढ़ाई गई धनराशि से पुजारी जी की तिजोरी भरने लगी और उनके कठिनाईयों के दिन समाप्त हो गये। मंदिर में लगने वाली भीड़ से आकर्षित होकर नेतागण भी वहाँ पहुँचने लगे और क्षेत्र के विकास का सपना दिखाकर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास करने लगे।
कुछ वर्षों बाद पुजारी जी अचानक बीमार पड़ गये। जाँच के उपरांत पता चला कि वे कैंसर जैसे घातक रोग की अंतिम अवस्था में है यह जानकर वे फूट फूट कर रोने और भगवान को उलाहना देने लगे कि हे प्रभु मुझे इतना कठोर दंड क्यों दिया जा रहा है ? मैंने तो जीवनभर आपकी सेवा की है।
उनका जीवन बड़ी पीड़ादायक स्थिति में बीत रहा था। एक रात अचानक ही उन्होनें स्वप्न में देखा की प्रभु उनसे कह रहे हैं कि तुम मुझे किस बात की उलाहना दे रहे हो ? याद करो एक बालक भूखा प्यासा मंदिर की शरण में आया था अपने उदरपूर्ति के लिये विनम्रतापूर्वक दो रोटी माँग रहा था परंतु तुमने उसकी एक ना सुनी और उसे दुत्कार कर भगा दिया। एक दिन एक वृद्ध बरसते हुये पानी में मंदिर में आश्रय पाने के लिये आया था। उसे मंदिर बंद होने का कारण बताते हुये तुमने बाहर कर दिया था। गांव के कुछ विद्यार्थीगण अपनी षाला के निर्माण के लिये दान हेतु निवेदन करने आये थे। उन्हें शासकीय योजनाओं का लाभ लेने का सुझाव देकर तुमने विदा कर दिया था। मंदिर में प्रतिदिन जो दान आता है उसे जनहित में खर्च ना करके, यह जानते हुये भी कि यह जनता का धन है तुम अपनी तिजोरी में रख लेते हो। तुमने एक विधवा महिला के अकेलेपन का फायदा उठाकर उसे अपनी इच्छापूर्ति का साधन बनाकर उसका शोषण किया और बदनामी का भय दिखाकर उसे चुप रहने पर मजबूर किया।
तुम्हारे इतने दुष्कर्मों के बाद तुम्हें मुझे उलाहना देने का क्या अधिकार है। तुम्हारे कर्म कभी धर्म प्रधान नही रहे। जीवन में हर व्यक्ति का उसका कर्मफल भोगना ही पड़ता है। इन्ही गलतियों के कारण तुम्हें इसका दंड भोगना ही पडे़गा। पुजारी जी की आँखें अचानक ही खुल गई और स्वप्न में देखे गये दृश्य मानो यथार्थ में उनकी आँखों के सामने घूमने लगे और पश्चाताप के कारण उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी।

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नैतिकता

परमानंद जी एक सफल व्यापारी के साथ साथ राजनीति में भी गहरी पैठ रखते थे। वे अपने गृहनगर में भारी मतों से जीतकर एम.एल.ए भी बन गये थे। एक दिन मुख्यमंत्री जी ने अपने कार्यालय में किसी कार्यवश उन्हें बुलाया था। उस दिन दुर्भाग्य से परमानंद जी के निजी सेवक इमरतीलाल, जिसने उन्हें बचपन से पाल पोसकर बडा किया था, वह अचानक हृदयाघात के कारण अस्पताल में गंभीर अवस्था में भर्ती किया गये थे। परमानंद जी स्वयं उसकी देखभाल में व्यस्त थे और उन्होंने मुख्यमंत्री जी को संदेश भिजवा दिया था कि उनके निजी सेवक की तबीयत अधिक खराब होने के कारण वे उनसे नियत समय पर मिल पाने में असमर्थ है।
यह सुनकर मुख्यमंत्री जी काफी नाराज हो गये और सोचने लगे कि यह कैसा व्यक्तित्व है जिसके लिए मुख्यमंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका नौकर है। इस घटना के कुछ समय बाद ही इमरतीलाल की तबीयत स्थिर हो जाने के पश्चात परमानंद जी मुख्यमंत्री जी के पास मिलने के लिये गये। मुख्यमंत्री जी ने मुलाकात के दौरान व्यंग्य करते हुए कहा कि आप बहुत बडे राजनीतिज्ञ हो गये है आपके लिए मुख्यमंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण नौकर है।
यह सुनकर परमानंद जी जो कि एक बहुत स्वाभिमानी और स्पष्ट वक्ता थे। उन्होंने निडर होकर जवाब दिया कि जिस व्यक्ति की गोद में बचपन में खेल कर मे बडा हुआ और जो आजतक मेरी देखभाल परिवार के सदस्य के समान कर रहा हो, उसकी तबीयत के विषय में समय देना मेरे लिए आप से मिलने से ज्यादा महत्वपूर्ण था। मै इस पद पर वैसे भी समाज के कल्याण एवं जनता की सेवा के लिए चुना गया हूँ। यदि आपको यह लगता है कि मेरे इस कृत्य से आपका अपमान हुआ है, तो मैं विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे सकता हूँ।
यह सुनते ही मुख्यमंत्री जी का पारा एक दम से ठंडा हो गया और वे हतप्रभ होकर परमानंद जी के चेहरे की ओर देखने लगे। उन्हें ऐसे स्पष्ट जवाब की अपेक्षा नही थी। उन्होंने इस्तीफा ना देने का अनुरोध करते हुए, दूसरे दिन मिलने के लिए कह दिया। दूसरे दिन मुलाकात होने पर उन्होंने परमानंद जी की तारीफ करते हुए कहा कि आप जैसे व्यक्तित्व आज के समय में बिरले ही होते हे। आपका निर्णय समय एवं परिस्थितियों के अनुसार एकदम सही था।

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प्रायश्चित

एक कस्बे में एक गरीब महिला जिसे आँखो से कम दिखता था, भिक्षा माँगकर किसी तरह अपना जीवन यापन कर रही थी। एक दिन वह बीमार हो गई, किसी दयावान व्यक्ति ने उसे इलाज के लिये 500रू का नोट देकर कहा कि माई इससे दवा खरीद कर खा लेना। वह भी उसे आशीर्वाद देती हई अपने घर की ओर बढ़ गई। अंधेरा घिरने लगा था, रास्ते में एक सुनसान स्थान पर दो लड़के षराब पीकर ऊधम मचा रहे थे। वहाँ पहुँचने पर उन लड़को ने भिक्षापात्र में 500रू का नोट देखकर शरारतवश वह पैसा अपने जेब में डाल लिया, महिला को आभास तो हो गया था पर वह कुछ बोली नही और चुपचाप अपने घर की ओर चली गई।
सुबह दोनो शरारती लड़को का नशा उतर जाने पर वे अपनी इस हरकत के लिये शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। वे शाम को उस भिखारिन को रूपये वापस करने के लिये इंतजार कर रहे थे। जब वह नियत समय पर नही आयी तो वे पता पूछकर उसके घर पहुँचे जहाँ उन्हें पता चला कि रात्रि में उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गयी और दवा न खरीद पाने के कारण वृद्धा की मृत्यु हो गई थी। यह सुनकर वे स्तब्ध रह गये कि उनकी एक शरारत ने किसी की जान ले ली थी। इससे उनके मन में स्वयं के प्रति घृणा और अपराधबोध का आभास होने लगा।
उन्होने अब कभी भी शराब न पीने की कसम खाई और शरारतपूर्ण गतिविधियों को भी बंद कर दिया। उन लडकों में आये इस अकस्मात और आश्चर्यजनक परिवर्तन से उनके माता पिता भी आश्चर्यचकित थे। जब उन्हें वास्तविकता का पता हुआ तो उन्होने हृदय से मृतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुये अपने बच्चों को कहा कि तुम जीवन में अच्छे पथ पर चलो और वक्त आने पर दीन दुखियों की सेवा करने से कभी विमुख न होओ, यहीं तुम्हारे लिये सच्चा प्रायश्चित होगा।

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