मैं एक आयुर्वेदिक चिकित्सक हूं.लिखना पढ़ना मेरा शौक है.हर जिंदगी में तमाम कहानियां सन्निहित हैं जो मुझे उद्वेलित करती हैं.किसी की भावना को यदि कोई ठेस पहुंचे तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं.आप पाठकोंके स्नेह की आकांक्षा है.

एक सही-गलत फैसला,
एक पल की कोई खता,
बस एक घड़ी को बहकना,
कदमों का जरा सा भटकना,
उम्र भर पश्चाताप में जलना,
एक नजर की मुहब्बत,
गलतफहमी से उपजी नफरत,
एक गलत राह चुनना,
एक बार का गिरना-सम्हलना,
जरा सी चूक एक दुर्घटना,
जीवन का मौत में बदलना,
बस एक लम्हा ही काफी है,
जिंदगी बदलने के लिए।।

रमा शर्मा 'मानवी'
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न तुम कुंभ, न मैं तुम्हारी कुंभकार,
नहीं थोपूंगी तुमपर अपने विचार,
तुम हो स्वतंत्र, सजीव एक आकार,
करो स्वयं अपना व्यक्तित्व निर्माण,
मैं बनूँगी तुम्हारी मात्र पथप्रदर्शक,
सम्भलकर बढ़ते चलो जग पथ पर,
कांटे-कंकड़ चुनकर,कर हर बाधा पार,
रचो सफलता के उच्च आयाम,
भरो अपने जीवन में इंद्रधनुषी रँग,
करो अपने समस्त स्वप्न साकार।

रमा शर्मा'मानवी',अलीगढ़

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सभी पुरुष हिंसक,शोषक नहीं होते,
हर स्त्री अबला,शोषित नहीं होती।
न तो सभी सास कुटिल होती हैं,
न हर बहू तेज और चालाक होती है,
हर युवा नादान,विद्रोही नहीं होता।
सभी बड़े सर्वदा सही ही नहीं होते,
हर बुजुर्ग हमेशा ही लाचार नहीं है,
हर रिश्ते का एक सा आधार नहीं है,
हर कोई एक सा समझदार नहीं है,
न तो सभी निर्धन सदैव ईमानदार हैं,
न ही हर धनवान हमेशा बेईमान है,
मत आंको सबको एक नजरिए से,
न देखो हर किसी को एक चश्मे से,
न ही तोलो सभी को एक तराजू में।
करो सदैव प्रयोग अन्तरचक्षु का,
तभी पहचान सकोगे असलियत।


रमा शर्मा' मानवी'

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देखते ही देखते बच्चे बड़े हो गए,
वो जब प्रथम बार गोद में आए थे,
तब मात्र दोनों हथेलियों में समाए थे,
जब उन्हें हृदय से लगाया था,
ममता का सागर लहराया था,
कांधे से लगाकर सुलाते थे,
थपकते हुए लोरी सुनाते थे,
मासूम किलकारियों पर निहाल होते,
उनके संग ही जगते-सोते,
फिर घुटनों चलना,खड़े होना,
गिरना,सम्हलना,सरपट दौड़ना,
उंगली छुड़ाकर भाग जाना,
खाना कम,बिखेरना ज्यादा,
अक्सर शरारतों पर आमादा,
उनकी परवरिश हम करते रहे,
गुजरते वक़्त के साथ बढ़ते रहे,
वे कद में हमसे ऊंचे हो गए,
समझदार,सयाने,युवा हो गए,
वे हमें नवीन बातें सिखाते हैं,
आज की टेक्नोलॉजी बताते हैं,
हम पुराने हैं, ये भी जताते हैं,
अब वे अपने पैरों पर खड़े हो गए,
देखते ही देखते बच्चे बड़े हो गए।

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मैं हूँ एक आम गृहणी,
मेरी दुनिया मेरा घर-परिवार,
उन्हीं के साथ मेरा हंसना-रोना-गाना,
रुचि नहीं रत्ती भर राजनीति में,
सुन लेती हूँ कुछ समाचार पति संग,
कर लेती हूँ चर्चा बच्चों से फैशन, फिल्मों की,
मेरे प्राथमिक मुद्दे यही हैं,
सुबह का नाश्ता, दोपहर, रात का खाना,
बच्चों की शिक्षा, अच्छी परवरिश,
व्यस्त हूँ घर की व्यवस्था में,
खुश हूं अपनों की देखभाल में,
मेरा व्यायाम गृहस्थी के ढेरों काम,
मनोरंजन मां-बहन-सखियों संग बातें,
नहीं समझती दुनिया की खुराफातें,
क्योंकि मैं हूँ एक आम गृहणी।।

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हम घिरे हुए हैं बेतरह
अनगिनत भय के सायों से,
अपनों के रूठने का,
सपनों के टूटने का,
जिंदगी के छूटने का,
स्वजनों से बिछड़ने का,
जीवन दौड़ में पिछड़ने का,
खुशियों के बिखरने का,
उम्मीदों के सिमटने का,
ख्वाहिशों के मिटने का,
ठोकरों से गिरने का,
बस यूं ही गुजरती है,
ठहरती है, फिर चलती है,
ये जिंदगी है यारों,
ऐसे ही निकलती है।।

रमा शर्मा 'मानवी'
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स्वयं को भूल अबतक करती
रही हर रिश्ते को बेइंतहा प्यार,
अब थोड़ी सी मुहब्बत मैं खुद से करने लगी हूँ।
निभाती रही शिद्दत से हर जिम्मेदारी,
छोड़ दिया अपना हर ख्वाब,
भूल गई अपनी तमाम ख्वाहिशें,
अब कुछ खुद के लिए मैं सोचने लगी हूँ।
व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय
अपने लिए अब निकाल लेती हूँ,
बिखरी लटों से झांकती सफेदी को,
चेहरे के उम्र की लकीरों को
बड़े प्यार से निहार लेती हूँ,
अब खुद के लिए थोड़ा सँवरने लगी हूँ।
लोग क्या कहेंगे, से डरना छोड़
चटक कपड़े पहनने लगी हूँ,
अकेले ही जाकर कभी-कभी
चाट-समोसे खाने लगी हूं,
कभी ऑनलाइन कपड़े,सामान,
पिज्जा भी मंगाने लगी हूँ,
बेवजह अक्सर मुस्कराने लगी हूँ,
हाँ, ऐसा लगता है कि अब
खुद से प्यार मैं करने लगी हूँ।
लोग कहने लगे हैं कि अब 
बुढ़ापे में मैं सठियाने लगी हूँ,
पर मुझे अब नहीं परवाह किसी की
जो समझते हैं मुझे, वे खुश हैं इन बदलावों से,
अब छोटी बातों में मैं खुश रहने लगी हूँ।
हाँ, अब खुद से मैं इश्क करने लगी हूँ।
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मां, मैं तुम्हारी बेटी हूं, 
परछाईं नहीं बनूंगी तुम्हारी।
तुमने खपा दिया खुद को,
उन रिश्तों को सहेजने में,
जिन्होंने तुम्हें तनिक मान भी नहीं दिया,
देखा है मैंने तुम्हारी आँखों की नमी को,
तुम्हारे अस्तित्व को टुकड़े हो बिखरते,
महसूस करती हूँ तुम्हारे छटपटाते मन को,
तुम्हारे मौन की अव्यक्त विवशता को,
हृदय की असीम विह्वलता को,
मैं आवाज बनूंगी तुम्हारी खामोशी की,
तुम्हारे सपनों को पूर्ण करूंगी मैं, मां,
तुम्हारी परवरिश को सार्थक करके,
तुममें भर दूंगी गर्व का ऐसा अहसास,
नाज से कह सकोगी,देखो, यह मेरी बेटी है,
मेरी परछाई नहीं, मेरा अभिमान है मेरी बेटी।

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आज प्रेम रह गया है प्रदर्शन मात्र,
चंद शब्दों के जाल में उलझा हुआ,
हाथों में हाथ ले सड़क पर चलते,
मोबाइल पर घण्टों बतियाते,
पार्कों,रेस्टोरेंट में बैठकर मुस्कराते,
माइक हाथों में थामकर अपनी
स्वीटहार्ट के लिए गीत गाते,
आशिकों की बेहिसाब मुहब्बत 
सिमट गई है केक और बुके में,
चांद-तारे तोड़ लाने वाले,
एक दूजे के लिए जहां छोड़ने वाले,
जीवन रण में घबरा जाते हैं,
दम तोड़ देता है उनका प्यार,
वैवाहिक वर्षगांठ पर पार्टी में,
सजे-सँवरे,होठों पर कृत्रिम हंसी,
घर के अंदर शेष है दूरियां,
घुटन,तमाम आरोप-प्रत्यारोप,
बस अवशेष है बिखरा, मुरझाया प्रेम।
ये आज का प्रेम।।।
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