ज़िन्दगी कविता या कविता ज़िन्दगी यही सोचते हुए उम्र के पल गुजार दिए ,जो दिल देखता सुनता है लिख देती हूं .ज़िंदगीनामा वेबसाइट है मेरी और कुछ मेरी कलम से ब्लॉग काव्यसंग्रह 2 अपने और 15 सांझे पब्लिश हो चुके हैं . पर कलम अभी भी कहती है कि बहुत कुछ लिखना बाकी है .

कोई तो होता ......
दिल की बात समझने वाला
सुबह के आगोश से उभरा
सूरज सा दहकता
रात भर चाँद सा चमकने वाला....

निकले थे घर से
ले कर
किसी समुंदर का पता
पर कभी उसके साहिल तक को
छू भी ना पाए
हाथ में आई सिर्फ़ रेत मेरे
और लबो पर हैं
अनबुझी प्यास के साये....

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तुम भी .......
भावनाओ में जीते हो?
अहसास इसका
तब हुआ मुझको.
जब गिने दिन
तुमने हमारी मुलाक़ातो के,
प्यार के, बातो के,
और उन सपनो के............
जो सच नही होने थे शायद..............?

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"शेडो "बहुत बड़ी हकीकत होती है चेहरे भी हकीकत होते हैं ,पर कितनी देर ? शेडो जितनी देर तक आप चाहे चाहे तो सारी उम्र उम्र बीत जाती है पर वह ख्यालो में आने रुकते नहीं ,बल्कि जाने के बाद और भी याद आते हैं और यह शेडो हर शरीर के नियम से आज़ाद होती है

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बूंद बूंद मेह टपकता रहा टिप टिप यादें दस्तक देती रही
गुजर गया यह साल भी कुछ नफे नुक्सान की पोटली थमा कर
नए साल की आहट उम्मीद की सांस पर नए गीत शब्दों में बुनती रही

रंजू भाटिया

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ज़िन्दगी हर कदम पर नया रंग दिखायेगी
गीत लिखते हुए नया यह उस से जुड़ जायेगी

बनो तुम चाहे
मेरी कविता
चाहे बनो अर्थ
चाहे बनो
संवाद.....
पर मत बनो
ऐसी उलझन
जिसे मैं कभी
सुलझा न सकूं

तुमसे मिलने से पहले

अँधेरे में डूबी किरण थी मैं
जब ज़िदगी गुजरी
तेरी राह से हो कर
तो इन्द्रधनुष से सात रंग चमकने लगे
रंजू भाटिया

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इंतज़ार
करते रहे हम इंतज़ार तुम्हारा
गुजरे लम्हे फिर ना गुज़रे
आँखो में तो भरे थे बादल
फिर भी क्यों वो ख़ाली निकले

खुशबू चाँद ,किरण, औ हवा, में
हर शे में बस तुम्हें तलाशा
पर जब झाँका दिल के दरीचां
वहाँ हर अक़्स में तुम ही निकले

गुज़रे वक़्त का साया है तू
फिर भी निहारुं राह तुम्हारी
दीप जलाए अंधेरे दिल में
तू इस राह से शायद निकले

बिखर चुकी हूँ कतरा- कतरा
अब तेज़ हवाओं से डर कैसा
फिर भी दिल मासूम ये सोचे
कि यह तूफ़ान ज़रा थम के निकले !!#साया संग्रह से .........

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मैं क्या जानूं तू बता ,
तू है मेरा कौन
मेरे मन की बात को बोले तेरा मौन