अदद शब्दो की तलाश में

तिरंगा से ही अभिमान है,
तिरंगे से ही दुनिया में पहचान है।
तिरंगे के तीन रंग महज़ रंग नही है।
तिरंगे से मेरे भारत की शान है।
#राघवेन्द्र राज

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ख्यालों मैं वक्त बरबाद न कर।
पहले हुनर सीख ले हक़ीक़त बयां करने का।

पुराने साल की हवा में,
कई पुरानी यादें जा रही है।
नए साल में ये बासी रूहे ,
नई -नई कसमें खा रही है।

सवालों में रहने दो मुझे। जवाबों में बहुत बुरा हूँ मैं। #shubh
@राघवेन्द्र ‛राज’

ख़्यालों में रहने दो मुझे ।
हकीकत में बहुत बुरा हूँ मैं।
@राघवेन्द्र ‛राज’

किस्मत बदलने का एक नायाब तरीका है कि तुम स्वयं बदल जाओ किस्मत अपने आप बदल जाएगी।
#राघवेन्द्र ‛राज’

अमावस के घोर तिमिर को,
अन्तर्मन के अहंकार को ।
मन के कुलषित अंधकार को मिटाने,
दीप जलाओ दीप जलाओ।

ऊँच नीच का भेद भुलाकर,
सबको अपने गले लगाकर।
ज्योति पर्व की इस पावन बेला पर,
दीप जलाओ दीप जलाओ।

स्वार्थ लोभ को छोड़कर,
चाहत के रंग घोलकर।
उम्मीदों को पंख लगाकर,
दीप जलाओ दीप जलाओ।

रावण प्रतीक विकार मिटाकर,
हृदयपुंज से आग लगाकर।
मर्यादा पुरषोतम को दिल मे बसाकर ,
दीप जलाओ दीप जलाओ।

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लफ़्ज़ों ने दिल मे प्रेम भरा।
अन्तर्मन का कलुष हरा।
अब मन में कैसे द्वेष रहेंगे।
जब लफ्ज़ तुम्हारे दीप बनेंगे।

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हालातों से मजबूर होकर वो झिझोड़ गया मुझे।
खुद को बचाने की खातिर छोड़ गया मुझे।

ऐसा नही है कि वो तोड़ गया मुझे।
खुद को भी बहुत देर जोड़ना होगा उसे।

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वो जला देती थी खत को कागज बोल कर।
बिखर गयी जिसकी खुशबू फ़िज़ा में इश्क घोलकर।।