केवल इतनी जगह बनानी है तुम्हारे दिल में.. की तुम मुझे भुलाने की कोशिश करो। ~रूपकीबातें....... (Introvert Writer)️️...... Insta- Roop_ki_baatein

यदि टूट चुकी ईश्वर की मूर्ति भी पूजा के लिए स्वीकार्य नहीं होती, क्योंकि वह खंडित हो चुकी है।
तो वह टूट चुका इंसान क्या करता है..
क्या वह स्वयं को स्वीकार करता है।
नहीं! वह त्याग देता है.. स्वयं को भी और इस असंवेदनशील संसार को भी।
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पानी जिस भी जगह पर ठहरता है ,उस जगह को पूरी तरह से गला देता है।
तो क्या आँखों में रोक कर रखे गए आँसू देह को नहीं गलाते..?
क्या ऐसी देह दलदल में तब्दील नहीं हो रही, जहाँ खुशियाँ और भावनाएं धंसती जा रही हैं..

सुनो, तुम जवाब मत देना,
मेरे सवाल ख़त्म नहीं होते।
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जब एक पुरुष एक बेटी का पिता बनता है, तो वह अनेक पहलुओं में मानसिक और भावनात्मक रूप से बदल जाता है। अब वह स्वयं को नारियल के व्यक्तित्व के रूप में कठोर प्रकट नहीं करता बल्कि वह स्वभाव से कोमल होता जाता है और उसकी बेटी उसके कोमल, प्रेममय पक्ष को देखती है। जो कभी एक बहादुर पुरुष था, वह अब एक रक्षक के रूप में उस समय चिंतित हो जाता है जब उसकी छोटी सी बच्ची लुका-छिपी का खेल खेलते-खेलते पलंग के नीचे छिप जाती है।
वह अब गुस्सैल युवक के रूप में नहीं रह पाता बल्कि वह एक ऐसा इंसान बनता चला जाता है जो अपनी बेटी को थोड़ा सा भी रोता देख परेशान हो जाता है।
एक बेटे से प्रेमी तक का सफ़र तय करके फिर पति बन आखिरकार जब एक पुरुष बेटी का पिता बनता है तो वह एक योद्धा, गुमनाम नायक और सदैव के लिए अपनी बेटी का निस्वार्थ प्रेमी बन जाता है जो उसके लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
यह सच है की हर लड़की एक राजकुमारी बनने का सपना देखती है लेकिन सच कहूँ तो मैंने ऐसा कभी ख़्वाबों में भी नहीं सोचा क्योंकि मेरे साथ आपने सदैव राजकुमारी की तरह ही व्यवहार किया है और मुझे सदैव ही अत्यधिक प्रेम दिया है।
वैसे तो हर दिन आपका ही दिन है और मैं बहुत बार आपको कह चुकी हूँ मगर फिर भी मैं आपको केवल यह बताना चाहती हूँ कि आप मेरे लिए पूरी दुनिया में सबसे अनमोल हैं। आपके जैसा निस्वार्थ प्रेम मुझे कोई कर ही नहीं सकता। जैसा आप मुझे महसूस कराते हैं, जितना प्यार करते हैं, जितनी आप मेरी परवाह करते हैं, मेरी हर ज़िद पूरी करना और हमेशा ही मुझ पर अपना पूरा ध्यान रखना.. यह सबकुछ आपके अलावा कोई कर ही नहीं सकता।
मैं हमेशा आप से कहती हूँ मैं आप जैसी नहीं बन सकती। सच कहूँ तो आप जैसा बनना मेरे बस में ही नहीं है.. इतनी महानता, इतना प्रेम और इतनी निस्वार्थ भावना सभी के लिए फिर चाहे कोई अपना हो या पराया.. मुझ में आपका ऐसा एक भी गुण हो इतनी अच्छी नहीं हूँ मैं।
आप जैसा पिता पाकर मैं तो धन्य हो गई। प्रत्येक जन्म आप मेरे ही पिता बनना।
आपको पितृदिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं♥️♥️
कृपा बनाए रखना और हाँ पार्टी हमेशा की तरह अपन रात में करेंगे।
बहुत-बहुत प्यार आपको परमार साहब।
- रूपकीबातें
♥️♥️
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स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है

(भाग-3)

डूबने से बचना हो तो हाथ-पैर चलाना ज़रूरी होता है।
अब मैं रोज घर पर ही घण्टों तक लेशन रीड करने लगी। बात करते वक़्त सही बोलने का प्रयास करना शुरू किया और सबसे कहा ग़लत शब्द पर टोक देना और जब इससे भी सुकून नहीं मिला तो आध्यात्मिक पत्रिका पढ़ना शुरू किया। एक योगा सुबह ठीक 4 बजे करना था। तो रोज बिना किसी के जगाए वो योगा भी किया।
क्योंकि मेरी समस्या बड़ी नहीं थी इसलिए कुछ दिन में ही वह चार अक्षर मैं सही और स्पष्ट बोलने लगी। सरल शब्दों में कहूँ तो मेरा तुतलाना बंद हो गया।

इस बात को वर्षों हो चुके हैं मगर मुझे आज तक समझ नहीं आया कि लोग केवल कमियां ही क्यों देखते हैं, खूबियां क्यों नहीं। किसी का मज़ाक बनाकर उसका अपमान करके, उसे खुद से कम आँककर, नीचा दिखाकर कौन सी ख़ुशी मिलती है।
किसी से यह कहना.."अरे तू कितना मोटा है या कितनी मोटी है"। तू पतला/पतली है।
काला/ गोरा/ साँवला या किसी के चेहरे पर बेहूदा टिप्पणी करना..
किसी के तुतलाने या हकलाने का मज़ाक बनाना..
यकीन मानिए बहुत आसान होता है।
किसी के रंग-रूप या शारीरिक बनावट पर टिप्पणी करना या बेवज़ह ही बिना मांगे सलाह देना ही बड़ा बेतुका है।
मज़ाक भी तब तक ही अच्छा लगता है जब तक हद में हो।
क्या आप स्वयं का मज़ाक बनता देख या अपमान होता देख ख़ुश होंगे..?
मुझे लगता है लोगों को आईने में अपनी सूरत नहीं सीरत देखनी चाहिए.. मगर व्यक्ति कुछ बोलने से पहले स्वयं को नहीं देखता।
मैंने कहा ना.. "स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है।
मगर, क्या किसी का मज़ाक उड़ाकर और उसको दुःखी करके आपको सुकून की नींद आ जाती है..?
मुझे तो नहीं आएगी!
💔
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स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है

(भाग-2)

घर जाते समय छुट्टी में चिल्ला-चिल्लाकर मेरा अपमान करना या मुझ पर हँसना आम हो गया था। उनके चुभते शब्द कभी मुझे दुःखी करते, तो कभी मुझे रुला दिया करते थे.. और उनके लिए सामान्य बात थी.. मगर मेरे लिए यह सब सामान्य नहीं था। अब लेशन रीड करने के नाम से ही मैं बहाने बनाने लगती.. मैं प्रार्थना करती की मेरा नम्बर आने से पहले ही क्लास ख़त्म हो जाए। याद होते हुए भी सवालों का जवाब देना मुझे बहुत मुश्किल लगने लगा था और सच कहूँ तो मुझे स्कूल जाने के नाम से ही रोना आने लगता था। कभी-कभी ना जाने का बहाना भी बना दिया करती थी, मगर ऐसा रोज नहीं हो सकता था। धीरे- धीरे मेरा मनोबल कम होने लगा। जैसे-जैसे मेरा मज़ाक बनना बढ़ता गया वैसे-वैसे मेरा आत्मविश्वास दम तोड़ने लगा। ना मुझे खेलना अच्छा लगता था और ना ही किसी से बात करना। बहुत कोशिशों के बाद भी मैं गुमसुम रहने लगी। मैं स्कूल नहीं जाना चाहती थी.. शायद कभी नहीं! रोज-रोज स्वयं का अपमान सहन करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं होता। मुझे परेशान करने वाले बच्चे ना तो पढ़ाई में अच्छे थे और ना ही किसी अन्य गतिविधि में।
मगर स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है।
एक दिन क्लास के बाद अलग बुलाकर एक सर ने मुझसे सवाल किया "आप तुतलाते हो"?.. मैंने कोई जवाब नहीं दिया बस मुस्कुरा दी.. हाँ! मगर आँखें भीग चुकी थी। तब तक उन्हें मेरी सहेली ने जवाब दिया.. नहीं!
मुझे नहीं पता उसने झूठ क्यों कहा.. ना मैंने पूछा। मगर उस वक़्त मेरे लिए यह दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत झूठ था।
मैं दुःखी थी.. बहुत अधिक दुःखी। अधिक दुःख आँखों को बर्दाश्त नहीं होता। परिणामस्वरूप मैं घर पहुंचते ही रोने लगी। अब घर पर सबको पता चल गया था। सबने अपनी-अपनी तरह से समझाया। किसी ने कहा वो उस शैतान बच्चों को डांटेंगे तो किसी ने कहा मैं तुतलाती नहीं हूँ केवल ग़लत बोलती हूँ.. मगर ऐसे सुकून कहाँ मिलना था। जब पापा जी आए तो उन्होंने मेरा चेहरा देख उदासी को भाँप लिया और बहुत प्यार से पूछा.. "किसी से लड़ लिए क्या"?
बस फिर क्या था मैंने रोते-रोते हिचकियों में सारी बात पापाजी को बता दी। उन्होंने हँसकर कहा.. "अरे! इतनी सी बात.. कल हम स्कूल चलेंगे"!
मगर मैंने उनको मना कर दिया। कभी-कभी प्यार ही सब दुःख हर लेता है। मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए और मेरे ख़त्म हो रहे आत्मविश्वास के लिए उनका इतना कहना ही बहुत था।
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क्रमशः

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स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है
(भाग- 1)


मैं बचपन में हिंदी वर्णमाला के 'चार' अक्षर ग़लत बोलती थी....। ग़लत बोलने का अर्थ सीधा है- 'तुतलाना'।
जी! बहुत लोगों को नहीं पता मगर मैं दसवीं कक्षा तक तुतलाती थी।
जहाँ इस वज़ह से मुझे परिचित-अपरिचित से बहुत प्यार मिला है वहीं ज़्यादा तो नहीं, मगर यह चार अक्षर ही बहुत थे मेरा मज़ाक बनाने के लिए।
मुझे लेशन रीड करना बहुत पसंद था। कारण सीधा सा था की मुझे हिंदी, संस्कृत या अंग्रेजी पढ़ने में तकलीफ़ नहीं होती थी। मैं कठिन शब्दों में भी ना के बराबर ही अटकती थी। क्योंकि मैं पढ़ाई में अच्छी थी और टीचर्स की फेवरेट भी इसलिए दसवीं तक आते-आते मैं कई बार क्लास मॉनिटर बनी। क्लास मॉनिटर का जो काम होता है मैंने वही किया और इस कारण क्लास के कुछ शैतान बच्चों को मुझसे समस्या रहने लगी। नतीजतन दसवीं कक्षा में उन बच्चों ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया.. परेशान करने के लिए और कोई रास्ता तो मिला नहीं इसलिए उन्होंने मुझे मेरे तुतलाने पर चिढ़ाना शुरू किया। अब मेरे लिए क्लास का माहौल बदलने लगा था। मैं जब लेशन रीड करती तो कानाफूसी होने लगती। कोई कहता "देख-देख अब ये ग़लत पढ़ेगी"। तो कोई जानबूझकर उन शब्दों पर टोककर मुझे दोहराने के लिए कहता और फिर हँसने की आवाज़ें आने लगती। यह सब करने वाले केवल चार-पाँच ही बच्चे थे.. लेकिन फिर भी मेरे लिए उनको नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन था। वह लोग जब मुझे इस तरह से परेशान करते तो टीचर्स उनको डांटते.. क्लास के बाकी बच्चे भी ख़ामोश रहकर ही सही मगर कहीं ना कहीं मेरा समर्थन ही करते। लेकिन इतना करना भी बहुत नहीं था। उन शैतान बच्चों ने मुझे चिढ़ाना जारी रखा और इतना बहुत था मेरा आत्मविश्वास कम करने के लिए। अब जिन्हें नहीं भी पता था वो भी जान गए थे।
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क्रमशः

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सारी रात करवटों में कट जाना आसान है क्या,
अपनी बाहों में खुद ही सिमट जाना आसान है क्या।
मेरी रूह जो अब बिछड़ी हुई लगती है मुझसे,
उसका बेहिसाब हिस्सों में बँट जाना आसान है क्या।।1

फिर किसी से इश्क़ करना इतना ग़लत क्यों है,
जब दिल पर लकीरों का ज़ोर नहीं चलता।
हर दफ़ा वो और मैं आमने-सामने होते हैं,
फिर चाहे ये पाँव उसकी ओर नहीं चलता।।2

उसके नज़दीक होने की वाहिमा करना भी तो इश्क़ है ना,
तो उसके सामने आने पर नज़रअंदाज़ करना मुमकिन कैसे।
जिसके साथ जीना चाहती हूँ मैं ना जाने कितने जन्म,
उसके इश्क़ में इतनी आसानी से मरना मुमकिन कैसे।।3

उसे पल भर में ही सौ दफ़ा देख लेना भी तो इश्क़ है ना,
उसकी आवाज़ सुन आँखों का भर जाना भी तो इश्क़ है ना।
उससे दूर जाने की नाकाम कोशिशें करना और फिर,
उसके ज़िक्र से ही कदमों का ठहर जाना भी तो इश्क़ है ना।।4

उसके साथ होने के ख़्वाबों में खुद को तड़पाना आसान है क्या,
उसे किसी और का होता देख खुद को समझाना आसान है क्या।
कभी उसकी हथेली पर जो मैंने लिखी थीं इबारतें मोहब्बत की,
उस बेबुनियादी ख़्वाब का हक़ीक़त में बदल जाना आसान है क्या।।5
~रूपकीबातें
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मैंने हमेशा ही अपने हाथों को किसी के आगे केवल सम्मान में जोड़ा है..
लेकिन तुम्हारे जाने की बात सुन मैंने सबके सामने हाथ जोड़े.. केवल इस आशा से, की शायद कोई तो होगा जो तुम्हें रोक लेगा।
~रूपकीबातें
#रूपकीबातें
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दर्पण में तेरा ही मुखड़ा, छवि बनी तेरी अँखियन में,
पनघट पर तेरी ही बतियाँ, सवाल उठे मेरी सखीयन में।
वैर भयो है तोसे ऐसा, सखी कहें मोहे तू बिसरा गया,
चैन भयो मोसे कोसों दूर, हर आहट लागे तू आ गया।।
~रूपकीबातें
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ये कौन है


अगर कोई तुमसे पूछे..
ये कौन है..
तो कहना यूँ तो मुझको ज्ञात नहीं,
महसूस हो सके ऐसी वो जज़्बात नहीं।।
..
फिर कहना बहुत आम है वो,
मगर सीरत से धनवान है वो।
जो दूर होकर भी लगती पास है,
जिसमें माँ का मीठा एहसास है।।

जो खुद सुलझी मगर बहुत सवाली है,
जिसके बिन शहर भी लगता खाली है।
जो लाखों बहानो में सच को ओढ़े है,
जो आँचल की गाँठ से रिश्ते जोड़े है।।

अगर कोई तुमसे पूछे..
ये कौन है..
तो कहना जो खुद पर बहुत इतराती है,
जो ना हो तो आँगन सूना कर जाती है।
ऐसी नदी है जिसका कभी संगम नहीं होता,
मिलोगे तो लगेगा इसे कभी ग़म नहीं होता।।

जो ख़्वाब बनकर भी सच लगती है,
जो जुगनू संग रातों को जगती है।
जो बिखरी हुई है मगर हताश नहीं,
लेकिन फिर भी कुछ खास नहीं।।

अगर कोई तुमसे पूछे..
ये कौन है..
तो कहना यूँ तो मुझको ज्ञात नहीं,
महसूस हो सके ऐसी वो जज़्बात नहीं।।
-रूपकीबातें
❤️❤️
#रूपकीबातें #कविता #roopkibaatein #roopanjalisinghparmar #roop

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