करूं शब्द-शब्द मैं प्रीत की बातें, हाँ तुम मेरा आधार पिया, मैं जोगन कभी बैरागन बनती, और तुम मेरा संसार पिया।~ रूपकीबातें (Introvert Writer)

संबंध कोई भी हो वह केवल बाह्य रूप में आपका सहारा बन सकता है, आंतरिक रूप से नहीं।
प्रेम, मित्रता, सगे-संबंधी या अन्य कोई संबंध आपके दुःख को समझने की कोशिश कर सकता है, परन्तु कभी समझ नहीं पाएगा।
पूर्णरूप से तो बिल्कुल भी नहीं।
यह सभी सम्बंध आपको केवल सहारा दे सकते हैं। परन्तु दुःख को कम या बांट नहीं सकते और उस समय तो बिल्कुल भी नहीं जब आपको इन संबंधों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
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जब कोई मुझसे पूछता है तुम्हारा पता..
तो मैं उस दिशा की ओर हाथ बढ़ा देती हूँ,
जहाँ तुमने मुझे छोड़ दिया था..
मेरे अनुसार आख़िरी जीवित मुलाक़ात वही थी,
इसके अतिरिक्त मैं कुछ नहीं जानती।
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तुमने देखा है कभी मृत कविताओं को..
मैंने देखा है..
वो जो गुलाब प्रेमिका की किताब में छिपा हुआ था, उसकी सूखी हुई पंखुड़ियों में..
किसी ख़ूबसूरत पेड़ पर पत्थर से लिखे गए नामों में..
विरह की आग में झुलसते हुए प्रेमी में..
किसी देह से धीरे-धीरे निकलते प्राणों में..
टूटी हुई चूड़ी में..
..
मैंने देखा है मृत कविताओं को बाबा के माथे पर उभरी लकीरों में..
माँ के हाथों की नरमी को बदलती हुई झुर्रियों में..
किसी मकान की चहल-पहल को बदलती हुई ख़ामोशी में..
व्यक्त की गई भावनाओं के ठुकराए जाने में..
बेघर मनुष्य के हवेलियों को देखते हुए चेहरे पर आने वाले भावों में..

मैंने देखा है..
हँसी के पीछे छिपाए गए आँसुओं में..
किसी की दम तोड़ी हुई चीख में..
खिलौनों को देख कदमों को रोक लेने वाले बचपने में..
समझदारी के नाम पर घुटने वाले हर इंसान में..

मैंने हर दुःख में केवल मृत कविताएं देखी हैं..
💔
Pc- me
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जिस डाल पर बना हो आशियाना
उस डाल को कभी काटा नहीं जाता।
और सिर पर छत है इतना ही बहुत है,
उसको हिस्सों में बाँटा नहीं जाता।।
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तुम्हें गणित, विज्ञान, कला, अंग्रेजी इन सब का ज्ञान है।
तुमने दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान, ग्रन्थ, काव्य सब को पढ़ा।
फिर भी तुमको इंसानियत का ज्ञान नहीं.. आश्चर्य!
इन विषय के अलावा काश तुमने भावनाओं को समझना सीख लिया होता।
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तुमसे मोहब्बत करना आसान नहीं है, मगर आसान है लिखना। हाँ मगर यह भी सच है कि, मैंने तुम पर तमाम बातें लिखी मगर कभी तुम्हें सम्पूर्ण रूप से काग़ज़ पर उतार नहीं पाई.. मगर दिल में तो तुम पूर्ण रूप से ही उतरे हो।
कहने का आशय यह है कि तुमसे मोहब्बत तो मैंने पूर्ण रूप से की है मगर उसको शब्दों में हमेशा ही अधूरा ढाल सकी हूँ। कितना भी लिख लूं मुझे कम ही लगता है।
मैंने कभी तुमसे फ़रमाइश भी नहीं कि.. लिख कर भी नहीं।हाँ, मगर आज दिल चाहता है तुम्हें फ़िज़ूल ही सही मगर बेतकल्लुफ़ ज़िद कर बुलाने का, और जब तुम आ जाओगे, तो भागकर सबके सामने तुम्हारे गले लग जाने का।
हाँ! तुमसे कहना कुछ नहीं है बस इतना ज़रूर चाहती हूँ कि लड़खड़ा जाऊँ तो कुछ वक़्त के लिए तुम मुझे सम्भाल लेना। शायद मैं बिल्कुल उस परवाने की तरह हो गई हूँ। जिसे अपना हश्र मालूम तो होता है, मगर फिर भी उसे शमा के करीब जाना होता है। तो यह भी कहाँ मुमकिन है कि तुम सामने आओ और मैं तुम्हें चोरी से ही सही मगर देखूँ नहीं। कहाँ मुमकिन है कि मेरी नज़र तुम पर जाए तो ठहरे ही नहीं। तुम्हें आँखों में भर लेना ग़लत तो नहीं। राह चलते अचानक ही ठहर जाना और तुम्हारी मौजूदगी की वाहिमा करना.. हर दफ़ा जलना ही तो है।
मगर मोहब्बत को हक़ है की ये जो मोहब्बत मेरी रूह में परवान चढ़ रही है इसे बिना पंखों के उड़ने देने का, या मेरे अंत का।
मुझे बहुत पसंद है चाँद को निहारना, चलते हुए टकटकी लगाए निहारना तो और भी ज़्यादा पंसद है। तुम्हें पता है.. मैं जब छोटी थी तो हमेशा चाँद को देखते हुए चलती थी, मुझे लगता था वो भी मेरे साथ चल रहा है। इस वज़ह से गिरी भी हूँ, बहुत बार टकराई भी हूँ। ऐसे ही मुझे पसन्द है तुम्हें निहारना, जब तक आँखों से ओझल ना हो जाओ तब तक निहारते रहना।
शायद, अब तुम में और चाँद में मुझे फ़र्क़ महसूस नहीं होता। दोनों ही मुझे अज़ीज़ हैं और दोनों को ही मैं कभी पा नहीं सकती।
हाँ! मगर, निहार सकती हूँ दूर से.. बहुत दूर से।
~रूपकीबातें
Insta - Roop_ki_baatein
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तुम्हारा विरह मेरा सब कुछ छीन गया.. मेरा अस्तित्व भी।
अब मैं शायद मैं नहीं रही। किसी कमरे में बिखरा पड़ा वो सामान बन चुकी हूँ, जो घर में मौजूद तो होता है, मगर उसकी ज़रूरत नहीं होती।
💔
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छोड़ कर जाने वाले पलट कर देख लें अगर तो जा नहीं सकेंगे, शायद इसलिए भी वो पलटकर नहीं देखते।
देख लेते तो जान जाते, अपने कदमों के नीचे जिसे कुचलते हुए जा रहे हैं, वो महज़ कोई ज़मीन या मिट्टी नहीं, अरमान और ख्वाहिशें हैं, जिसे धीरे-धीरे कुचल कर वो दिल के टुकड़े कर रहे हैं।
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हथेली से सरकती हुई ज़िंदगी, अब ठहराव माँगती है,
उम्र मेरी मगर आज भी तेरे हाथों की छाँव माँगती है।
मैं अनपढ़ हूँ जो तेरे चेहरे की शिकन को पढ़ ना सकी,
आज हर सिसकी तेरी उलझनों की किताब माँगती है।।
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ये जो 'हद' है ना.. ये अगर जज़्बातों में बढ़ जाए तो आँखों में उतर जाती है, मगर ऐसी हद महसूस नहीं होती।
हाँ, इसे समझना मैं आसान कर देती हूँ..
नफ़रत हो या मोहब्बत, अगर हद पार कर जाए तो दिल से आँखों में उतरने लगती है।
गुस्सा और दर्द का भी फ़साना ऐसा ही है.. यह जब हद से गुज़र जाएं तो आँखों में उतरते हैं।
कभी यह जज़्बात अंगारे बनते हैं, तो कभी आँसू।
मैंने पहले भी कहा है फ़ीकी मुस्कुराहट और भरी हुई आँखें बेहद ख़ूबसूरत होती हैं।
मगर इस तरह से अपने जज़्बातों को काबू में कर लेने वाला शख़्स ख़तरनाक होता है, बेहद ख़तरनाक।

मत जाना कभी तुम मुस्कुराहट पर,
बारिश के बाद की भीगी हुई जमीं है।
जिसको बेवज़ह हँसते हुए देखते हो,
उसकी आँखों में कैद आँसू की नमी है।।
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