करूं शब्द-शब्द मैं प्रीत की बातें, हाँ तुम मेरा आधार पिया, मैं जोगन कभी बैरागन बनती, और तुम मेरा संसार पिया।~ रूपकीबातें (Introvert Writer)

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सुनो,
अब जब मैं तुमसे मिलूँ तो वैसे पेश मत आना, जैसे आया करते हो। बाल भी ज़रा कम बनाना, मुस्कुराना मत मुझे देख कर .. और वो मेरी पसन्द की नीली शर्ट तो बिल्कुल भी मत पहनना। वरना शायद फिर देखने लगूँ तुम्हें जी भर कर, शायद फिर से आहिस्ता-आहिस्ता मुझे मोहब्बत होने लगे तुमसे।

और सबसे खास बात..
बर्ताव ज़रा सा बदल लेना अपना। मुझे तुम्हारा यूँ ही आँखों से बातें करना पसंद है।
पसंद है मुझे.. मेरी अनुपस्थिति में तुम्हारी आँखों का चारों ओर मुझे तलाशना।
पसंद है मुझे.. तुम्हारा बिना किसी संकोच या डर के मुझे अपलक देखना।
मुझे पसंद है, जब तुम इशारे में मेरा हाल पूछते हो।
मुझे पसंद है, जब तुम आँखें चढ़ाकर मुझसे सवाल करते हो।

सच कहूँ तो मुझे तुमसे मोहब्बत भी, तुम्हारी आँखों की वज़ह से ही हुई थी।
एक गहरी उदासी भरी आँखें।
ऐसी उदास आँखें जो पहली बार मेरी बातों से मुस्कुराई थीं।
मैंने जब-जब तुम्हारी आँखों में देखा, तो तुम्हारे बिन कुछ कहे कोई किस्सा सुना है।
मुझे ये उदास आँखें अपनी ओर खींचने लगती हैं।
यह उदासी ही वो वज़ह है जो मैंने तुम्हारी आँखों में एक बार देख, फिर दुबारा देखा था।

सुनो,
अब वही उदास आँखों से मत मिलना मुझे..
शायद अब मैं किस्सा सुन नहीं सकूँगी,
और.. फिर मेरी आँखें कभी मुस्कुरा नहीं सकेंगी।

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शिशु जब जन्म लेता है, तो कुछ भी नहीं समझता, कुछ भी नहीं जानता। ना रंग, ना रूप, ना चेहरा, ना रिश्ता।
मगर स्पर्श समझता है, और यह स्पर्श ही उसे प्रेम करना सिखा देता है।
ऐसे ही मैंने सीखा था तुमसे प्रेम करना.. मात्र तुम्हारे एक स्पर्श से।
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मैं नए ज़माने की लड़की हूँ..
मगर मोहब्बत की बात हो तो सोच से पुरानी हूँ।
ऐसा लगता है जैसे किसी जवान शरीर में कोई बूढ़ा दिल है। जो पहले के लोगों जैसे ही मोहब्बत करता है।
शायद, मुझे वही पुरानी, मासूम मोहब्बत पसन्द है।

कभी सोचती हूँ, तुम्हारे नाम पर कोई ख़त लिखूँ और भेज दूँ तुमको। वैसे ही, जैसे पुराने समय के प्रेमी-प्रेमिका लिख दिया करते थे, बिना किसी संकोच के।
मैं किसी कॉल या मैसेज में मोहब्बत का इज़हार नहीं करना चाहती। मैं अकेले में यूँ ही औपचारिक रूप से नहीं कहना चाहती, कि मैं तुमसे मोहब्बत करती हूँ।
नहीं! कभी नहीं!

मैं चाहती हूँ, किसी ऊँची इमारत में खड़े होकर जोरों से चिल्लाना, कि मैं तुमसे मोहब्बत करती हूँ। (मगर, छोड़ो मुझे ऊँचाई से डर लगता है)
मैं चाहती हूँ, किसी फूलों से भरे पेड़ के नीचे, जोरों की हवा के बीच, घुटनों पर आकर कहना, कि मैं तुमसे मोहब्बत करती हूँ।
कभी सोचती हूँ, अगर तुमने मुझसे मोहब्बत का इज़हार किया तो? क्या कहूँगी तुमसे? किस तरह से प्रतिक्रिया दूंगी।
मगर इतना जानती हूँ.. कि मैं रोने लगूंगी।
बताया था ना.. मैं ज़्यादा ख़ुश होने पर रोने लगती हूँ।

ऐसे ही ना जाने कितनी बातें हैं जो मुझे तुमसे कहनी हैं। मगर कहना आसान नहीं है।
शायद मोहब्बत करना सरल है, मगर उसको कहना कठिन। ये लोगों ने मोहब्बत के प्रदर्शन को बहुत कठिन बना दिया है।
कभी सोचती हूँ किसी शाम जब मैं तुम्हारे आँगन में तुलसी की पूजा करूँ, तो तुम जोरों से आवाज़ देकर मुझको बुलाओ, और मैं भागती हुई तुम्हारी आवाज़ पर तुम्हारे पास आऊँ.. और मेरी पायल की छन-छन मुझसे पहले ही मेरे आने की गवाही दे दे।

तुम्हारी पसन्द मैं अपना लूँ, और मेरी पसन्द तुम अपना लो।
हमारी कमियां, खूबियाँ.. दोनों को ही बराबर सम्मान मिले।

मगर हाँ, मुझे चाय से ज़्यादा कॉफ़ी पसन्द है। तुम मेरे लिए कभी काफ़ी पी लेना। मैं तुम्हारे लिए रोज चाय पी लूंगी।
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मैंने मेरे हर सुख और दुःख पर हमेशा ही कुछ लिखा है,
लेकिन तुमसे हुए अलगाव पर लिखी गई मेरी किसी भी रचना ने मुझे संतोष नहीं दिया।
वो शायद इसलिए क्योंकि मैं उतना नहीं लिख पाई जितना चाहती हूँ।
या शायद वो ईमानदारी नहीं है मेरे लिखने मैं जो बाकी समय हुआ करती थी।
फिर लगता है अलगाव पर लिखना आसान कहाँ है।
जब मकान बनता है तो नींव पक्की होती है।
मैं जब भी तुम पर लिखती हूँ,
नींव भीग जाती है, और पानी भर जाता है..
फिर, मेरा मकान बनता ही नहीं, केवल नमी बाकी रहती है।
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मर जाऊँ पिया❤️❤️

मैं दासी बनूं, मैं सेवा करुं,
मैं देहरी तेरी आऊं पिया।
निज प्रेम को त्याग, भोगूं बनवास,
मैं जी तोसे लगाऊं पिया।।1

भई निशा, मिला तोरा दर्श नहीं,
अंखिया चौखट पे बिछाऊँ पिया।
मैं बाबरिया, हुई तेरी सुहागिन,
बोल कैसे तोहे मनाऊं पिया।।2

दर्पण मोहे खूब सताए,
देह कैसे सजाऊँ पिया।
फेर लिया जो तूने मुखड़ा,
अब तोहे कैसे रिझाऊं पिया।।3

बेरी पिया मेरा भयो सांवरिया,
चहुँ ओर बांसुरी बजाऊं पिया।
जो तू कान्हा बन, मैं बनूं राधा,
किस तान पर रास रचाऊं पिया।।4

मैं जोगन, मैं ही बैरागन,
गीत प्रेम का सुनाऊं पिया।
तू मोहे निहार, मैं तोहे निहारूँ,
फिर देह त्याग, मर जाऊँ पिया।।5
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सहानुभूति देने और प्यार देने में उतना ही फ़र्क है,
जितना फ़र्क भीख देने और दान देने में है।
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लोगों को अपने व्यस्त समय से थोड़ा वक़्त दो,
कभी खामोश रहकर केवल सुनो।
उन्हें कहो, तुम उनसे बहुत प्यार करते हो।
उन्हें कहो, तुम उनकी परवाह करते हो।
उन्हें कहो, तुम हर हाल में उनके साथ हो।
उन्हें कहो, वो अकेले नहीं हैं।
उन्हें कहो, कोई भी बात हो तुम बिना सोचे मुझसे बोला करो।
उनके आगे बाहें फैलाए खड़े हो जाओ, बेझिझक गले लगाने।

क्योंकि.. अवसाद में इंसान एक झटके में नहीं जाता।
ये एक बीज के ,पौधे से पेड़ बनने तक की कहानी होती है।
एक-एक दिन के सदी की तरह गुज़रने की कहानी होती है।
जीवन कितना भी ख़ूबसूरत हो, कड़वी हक़ीक़त की बदसूरती उसे खा ही जाती है।
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एक पिता जब अपनी संतान को माता की गोद में देता है तो आश्वस्त होता है।
मगर माता सृस्टि के किसी भी इंसान की गोद में अपनी संतान को देखकर आश्वस्त नहीं होती।
संभवतः माता की दृष्टि में उसका शिशु केवल उसकी ही गोद में सुरक्षित है।
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#रूपकीबातें #mother
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हमें काफी तेज ज़ुकाम हो गया है,
कान में गाना गूंज रहा है..
"कहीं ये वो तो नहीं"
खैर..
हमारी पोस्ट पढ़ने के पहले मास्क लगा लें,
और लाईक तो ज़रूर ही करें, मगर फिर सेनेटाइजर लगा लें।
(हम अच्छे हैं ना तो सोचा बता दें)
#रूपकीबातें
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हाँ शायद मुझे तुमसे मोहब्बत है।
कब हुई, क्यों हुई.. मैं नहीं जानती।
मगर हो गई।
शायद तुमसे मोहब्बत होने का एक कारण यह भी है कि तुमने मेरे डर को पहचान लिया था। मेरी कमजोरियों को भांप लिया था।
जैसे तुमने मुझे इतने गौर से देखा कि चेहरा ही पढ़ लिया।
इतने करीब से जाना कि खामोशी का मतलब समझ लिया।
तुमने वो पढा था, जो मैंने कभी लिखा ही नहीं।
तुमने वो सुना, जो मैंने कभी कहा ही नहीं।

तुम मुझे बहुत कम समय में बहुत ज़्यादा जान चुके थे।
मैंने कभी तुमसे उतना नहीं कहा, जितना कहना चाहती थी।
मैंने कभी तुमको उतना नहीं सुना, जितना सुनना चाहती थी।
तुम यकीन नहीं करोगे,
मगर मैं.. तुम्हें खामोशी से सारी जिंदगी सुन सकती हूँ।

सुन सकती हूँ.. इसलिए कह रही हूँ,
क्योंकि तुम्हारी ओर देखना मेरे लिए किसी चलती हुई ट्रेन में चढ़ने जैसा है। कितना सम्भव है और कितना असम्भव है.. ये बस असमंजस भरा हुआ है।
हाँ, जब तुम दूर कहीं होते हो तो तुम्हें देखना आसान है, बस तुम मेरी ओर ना देखो।
और करीब होने पर तुम मुझे कितना देखते हो, तुम ही जानते होगे, क्योंकि मेरी नज़र तुम पर कुछ क्षण से ज़्यादा नहीं ठहर पाती।

तुम्हें देख मुस्कुराना भी मेरे लिए उतना ही मुश्किल है जितना किसी नन्हे शिशु के लिए पहला कदम बढ़ाना।
तुम्हारी मौजूदगी से ही मैं सब भूल जाती हूँ।
कुछ याद नहीं रहता, ये भी याद नहीं रहता कि बोलना क्या है.. मेरे शब्द जैसे गूंगे हो जाते हैं और ज़ुबान अनपढ़।

तुम्हें देख के मेरे दिल में कोई गाना नहीं आता,
या कोई संगीत नहीं बजता, क्योंकि धड़कनों का इज़ाफ़ा सब कुछ रोक देता है।
जैसे, उस पल सारी दुनिया ठहर सी गई हो।
जैसे, तुम्हारे होने से मेरा होना ही मुझे महसूस नहीं होता।
ऐसा लगता है मेरा वजूद तुम में घुलता ही जा रहा है।

सुनो, पता नहीं मैं जीवन में किसी पल तुमसे यह कह भी सकूं या नहीं, कि मैं तुमसे मोहब्बत करती हूँ,
कभी अपने दिल की ऐसी अनगिनत बातों को तुमसे साझा कर भी सकूं या नहीं।
वो चाँद की रोशनी में बैठ के बातें करना, तुम्हें जी भर देखते हुए सुनना.. कभी सच होगा भी या नहीं।
और, यह भी नहीं पता मुझे की तुम्हें मुझसे मोहब्बत भी है या नहीं।
जानती हूँ प्रतियोगिता नहीं है.. मगर,
इस बात को पूरे ईमान से कह सकती हूँ..
कि मुझसे ज़्यादा मोहब्बत तुम्हें कोई नहीं कर सकता।
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