मैं, संध्या राठौर - इंजीनियर , एक माँ , बेटी , बहन , सखी -इतने सारे किरदार और इन सब के बीच एक और किरदार -लेखिका ..... सपने देखने का शौक - कुछ पुरे हुए भी - कुछ नहीं भी। लेखन में रूचि बचपन से ही थी। उम्र के साथ साथ , ज़िन्दगी के बहुत सारे चेहरे देखे- कुछ अच्छे तो कुछ बुरे… बस जो कभी जुबां कह न पाई , कलम ने कह दिया - और बड़े ही पुरज़ोर ढंग से कहा। कवि ह्रदय था - काँच की तरह था - बड़े सारे दरक पड़े इसमें - फिर भी संजो के रखा। मेरी रचनाये, अपने समाज में इर्द गिर्द घट रही घटनाएँ का वर्णन मात्र है

दूर रहकर ही करीब आने दो
पास रहकर तो रिश्तों में दरार आती है

#मैं_ज़िन्दगी

~संध्या राठौर

यादें यादें न हुई गोया प्याज़ हो गई 

परते खुलती गई ,आँखे जलती गई

#मैं_ज़िन्दगी
~संध्या राठौर

तेरी आदत सी लगी है
आदत ये छोड़ना चाहती हूं ..
बेसबब जो बेसाख्ता सी
चल पड़ी है ये ज़िन्दगी
इस बार ...
तुझ से ...
तेरे गम से
तेरी हर खुशी से
रुख मोड़ना चाहती हूं ..
ताल्लुक थे जो तेरे मेरे
ताल्लुक वो सब
अब तोड़ना चाहती हूं !

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Fiendish love

These whispering Woods ....

They often call

my name ...

Alluring me into

Murky Darkness !

Into the

Enticing nothingness..

Raging silences ..

And

Mystical chaos !!

O Naiad..

O Oread..

O Daphne..

O country nymphs ...

Don't lumber me to

Fiendish love !

#love

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पेड़ ...

ये अक्सर होते है

 बेतरतीब  बेढ़ंगे से ...

ये उग आते है

जहां तहां ...

तुड़ जाते है

मुड़ जाते है

झुक भी जाते है

कहीं भी

कितने मर्तबे .....

 

बेडौल  कठोर

खुरदुरी छाले

ऊबड़खाबड़

तने वाले  होते है

पसार देते है

टहनियां  अपनी

कहीं भी  ...कभी भी ..

 

 

 

मगर

कभी गौर किया है ?

बड़ी सलीकेदार होती है

पत्तियां

फूल फल और बीज सारे ..

ज्यामिति के नियमों

में बंधे हुए

भिन्न भिन्न

रंग और गंध समेटे हुए !

 

मैं...

 पत्ती फूल फल  और

बीज सम होना चाहती हूं...

हवाओं  और पानीयों संग

सुदूर प्रदेशों में

किसी  मिट्टी से जुड़

वही  पेड़ फिर

बोना चाहती  हूं!

 

सुनो ... ईश्वर ..

मैं...

हर ज़िन्दगी में नई

इक ज़िन्दगी

 बोना  चाहती हूं !!

 

सरल शब्दों में

कहूं तो ...

हे ईश्वर ...

हर पुरुषत्व में

 यही  स्त्रीत्व मैं

पिरोना  चाहती हूं ...

किसी  पत्ती

किसी फल फूल

या किसी बीज  से

एक पेड़

होना चाहती हूं !

 

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पेड़ ...

ये अक्सर होते है

 बेतरतीब  बेढ़ंगे से ...

ये उग आते है

जहां तहां ...

तुड़ जाते है

मुड़ जाते है

झुक भी जाते है

कहीं भी

कितने मर्तबे .....

 

बेडौल  कठोर

खुरदुरी छाले

ऊबड़खाबड़

तने वाले  होते है

पसार देते है

टहनियां  अपनी

कहीं भी  ...कभी भी ..

 

 

 

मगर

कभी गौर किया है ?

बड़ी सलीकेदार होती है

पत्तियां

फूल फल और बीज सारे ..

ज्यामिति के नियमों

में बंधे हुए

भिन्न भिन्न

रंग और गंध समेटे हुए !

 

मैं...

 पत्ती फूल फल  और

बीज सम होना चाहती हूं...

हवाओं  और पानीयों संग

सुदूर प्रदेशों में

किसी  मिट्टी से जुड़

वही  पेड़ फिर

बोना चाहती  हूं!

 

सुनो ... ईश्वर ..

मैं...

हर ज़िन्दगी में नई

इक ज़िन्दगी

 बोना  चाहती हूं !!

 

सरल शब्दों में

कहूं तो ...

हे ईश्वर ...

हर पुरुषत्व में

 यही  स्त्रीत्व मैं

पिरोना  चाहती हूं ...

किसी  पत्ती

किसी फल फूल

या किसी बीज  से

एक पेड़

होना चाहती हूं !

 

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पेड़ ...

ये अक्सर होते है

 बेतरतीब  बेढ़ंगे से ...

ये उग आते है

जहां तहां ...

तुड़ जाते है

मुड़ जाते है

झुक भी जाते है

कहीं भी

कितने मर्तबे .....

 

बेडौल  कठोर

खुरदुरी छाले

ऊबड़खाबड़

तने वाले  होते है

पसार देते है

टहनियां  अपनी

कहीं भी  ...कभी भी ..

 

 

 

मगर

कभी गौर किया है ?

बड़ी सलीकेदार होती है

पत्तियां

फूल फल और बीज सारे ..

ज्यामिति के नियमों

में बंधे हुए

भिन्न भिन्न

रंग और गंध समेटे हुए !

 

मैं...

 पत्ती फूल फल  और

बीज सम होना चाहती हूं...

हवाओं  और पानीयों संग

सुदूर प्रदेशों में

किसी  मिट्टी से जुड़

वही  पेड़ फिर

बोना चाहती  हूं!

 

सुनो ... ईश्वर ..

मैं...

हर ज़िन्दगी में नई

इक ज़िन्दगी

 बोना  चाहती हूं !!

 

सरल शब्दों में

कहूं तो ...

हे ईश्वर ...

हर पुरुषत्व में

 यही  स्त्रीत्व मैं

पिरोना  चाहती हूं ...

किसी  पत्ती

किसी फल फूल

या किसी बीज  से

एक पेड़

होना चाहती हूं !

 

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