zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

लिख तो देंगे "अनुवर्ती" पर भी कुछ भी..
पर हर शब्द पर शायरी ये जरूरी भी नहीं..😄
#अनुवर्ती

ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत रखती हूं..
हां मैं बेख़ौफ़ सही पर मरने की हिम्मत रखती हूं..
और ये जो मुट्ठी भर ख़ुशियों के लिए ज़मीर मार देते हैं..
हां मैं उन ख़ुशियों के बिना भी जीने की हिम्मत रखती हूं..
#गलत

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बेख़ौफ अब फिर लोगों के चेहरे चमक रहें हैं..
कुछ नए-पुराने सिक्के फिर बाज़ारों में खनक रहे हैं..
जाने कितने फूल जो मिट्टी बन गए हैं इस बगिया के,
खुशकिस्मत हैं वो फूल जो अब भी महक रहें है..

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आते जाते वक्त बेवक़्त के ख़्वाब से तुम..
किसी रोज़ हक़ीक़त में आओ तो क्या बात हो..

गुजरते वक़्त के साथ हर वक़्त ख़्याल आया
कि तुम नही हो,
पर अब कभी कभी खामोश सोचती हूँ..
तो लगता है तुम ही तुम थे हर वक़्त..
ख़ुशियों से गूँजती हर हँसी में तुम थे..
गुस्से से बिलखती हर "मैं" में तुम थे..
हां सिर्फ तुम ही तो थे..
ज़िम्मेदारियों भरी धूप में,
जब थक गयी थी चलते चलते..
तब मेरी हिम्मत में हमेशा साथ थे तुम..
ज़िन्दगी की दौड़ में हर वक़्त
दौड़ती, भागती, गिरती फिर संभलती..
मुश्किलों से लड़ती हर "मैं" में सिर्फ तुम थे..
हां एक "#पिता " ही ऐसा कर सकता है..
खुद को बेचकर वो कई सपने खरीद सकता है..
हां तुम ही थे कहीं ना कहीं मुझमें
हाथ पकड़कर पास नहीं थे तुम..
पर मुझमें ही कहीं हमेशा साथ थे तुम..
चंद अल्फ़ाज़ नही बयां कर सकते लिखकर तुम्हें..
सिर्फ़ एक दिन का ख़्याल नहीं हो तुम..
मेरी पूरी ज़िंदगी का अनमोल अहसास हो तुम...

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मिट जाएगी एक दिन ये तमाम हसरतें,
कुछ यादें, कुछ बातें, ये तमाम ख़्वाहिशें..
मिट जाऊंगी एक दिन खुद में मैं भी..
फिर भी तुम मुझमें कहीं बाकी रहोगे..

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हां नहीं कहना कुछ तो कोई बात नहीं,
ख़ामोश ही सही पर इशारा तो कर..
पूरी ज़िंदगी नहीं चन्द लम्हे ही सही,
कोई वक़्त हमारे साथ गुजारा तो कर..

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