zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

आज भी रखे है दिल की आलमारी में,
एक दो वादे जो दोनों से निभाए ना गए..
कुछ वादे हमेशा साथ निभाने के,
कुछ वादे तुझे भूल जाने के....

-Sarita Sharma

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पतझड़ की पहली बारिश में,
मिट्टी की सोंधी खुशबू सा इश्क..
सर्दी के मौसम में,
वो गुनगुनी धूप सा इश्क़..
मदहोश कर जाए,
वो छलकता जाम सा इश्क़..
बेमतलब, बेपरवाह, बेअंजाम सा इश्क़..
सुकून दे जाए, वो बेनाम सा इश्क..
हर पल धड़कता जाए,
मेरी सांसो में बहता तेरा इश्क़..

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अब जब हम आधुनिक है तो,
पुरानी चीजे ही जाएंगी,
और नई को घर लाया जाएगा।
इसलिए आधुनिक बनने की चाह में,
संस्कार , सभ्यता , वेशभूषा , भाषा
को बाहर कर आये है।
घर में आधुनिकता के नाम पर,
दिखावा लेकर आये है।
बड़ो का सम्मान, छोटो के प्रति प्यार,
गरीबों पर दया, अपंगों की मदद,
माफ करें, हम भेदभाव नही करते।
अब सब समान हो गए है।
दिखावे की चादर ओढ़े,
हम आधुनिक हो गए है।

-Sarita Sharma

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बरसात के बाद जब धूप पड़ती थी, दादाजी हमेशा अपने सन्दूक के समान को धूप सेकने के लिए आंगन में रख देते..दादाजी का वो पुराना सन्दूक खुलना भी हमारे लिए कौतूहल सा होता.. पुराने सन्दूक में बंद कितने साल की कितनी यादें, बन्द परतों में प्रत्यक्ष.. जिसमे वक़्त ठहरा सा लगता है.. एक थैले में बंद लगभग आधा मीटर झीने से कपड़े का रंग बिरंगा सा टुकड़ा..कपड़ा अपनी पुण्यतिथि कबकी मना चुका था। पर दादाजी थे कि उसकी अंत्येष्टि ही नही कर रहे थे.. मैं और मेरी बहन निहायती उदण्डी जो केवल इसी ताक में रहती की कब दादाजी की नज़र हटे और हम उनके बेशकीमती समान का तरीके से जाइज़ा लें.. हमारे लिए तो वो कोई अलीबाबा और 40 चोर के खज़ाना जैसा था.. दादाजी भी सामान की निगरानी में चौकस रहते और हम भी.. तो मौका मिलते ही मैं और मेरी बहन ने फटाफट वो थैले में से रंग बिरंगा कपड़ा खीच लिया..इतने समय में कपड़ा बहुत कमजोर पड़ चुका था.. जो धीरे धीरे बिखर कर जमीन में गिर रहा था। जिसका एक छोर मेरे हाथ मे और दूसरा मेरी बहन के हाथ में.. वो पूरा फटा कपड़े का टुकड़ा तिरंगा था..जिसमें चक्र की जगह हाथ का निशान था..पर मुझे याद है दादाजी बीजेपी के कट्टर समर्थक थे.. तो फिर ये कांग्रेस का झंडा इतनी सम्भाल कर क्यों रखा था.. दादाजी ने जैसे हमे देखा और झंडे को यू बिखरा देख शायद उन्हें गुस्सा बहुत आया होगा हमपर.. लग रहा था मार बहुत पड़ेगी. पर उन्होंने कुछ कहा नहीं.. बस उसे समेटने लग गए.. उनका वो उन कंपकपाते हाथों से उस जमीन पर बखरे तिरंगे को समेटना..अब भी याद है..मैं मंदबुद्धि उसमे केवल कॉंग्रेस का चिन्ह-हाथ देख रही थी.. और वो केसरिया, सफेद हरा वो रंग तो देख ही नही पाई जो पहचान है हमारी.. जो हम है.. हां वो कोई फौजी नहीं थे, ना पुलिस में थे, पर वो भारतीय तो थे ही.. झंडे में भले कांग्रेस का चिन्ह था पर था तो तिरंगा ही..वो कैसे फेंक सकते थे उसे.. उस समय हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी बाजपेयी जी थे. जब भी उनकी फोटो उनके सामने आती दादाजी ऐसे रियेक्ट करते जैसे वो भगवान हो..और हमे बहुत हंसी आती थी ये देखकर.. हां देश का प्रधान मंत्री देश का राजा होता है और राजा पिता समान होता है.. पिता को भगवान समझना कोई गलत सोच नहीं हो सकती..हां अब इस समय किसी को भगवान तो नही समझ सकते..पर अपने देश का इससे जुड़ी हर चीजों का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है...हंसी तो अब आती है खुद पर..सोचती हूं काश उनके जैसी थोड़ी सी भी निस्वार्थ देशप्रेम की भावना मुझमें भी होती..

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं..🙏

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कहो ना कोई इस चांदनी से,
झुलस रहा है मेरा मन हर पल..
तुम चले आये ए-चाँद फिर से,
फिर से किसी की याद लेकर..
इतने तारों के बीच जैसे तुम अकेले हो,
मेरा मन भी अकेला है इस भीड़ में..
छुप जाओ तुम कहीं इन बादलों के पीछे,
झुलस रहा है मेरा मन इस चाँदनी से..

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तेरे नाम के साथ खिलती,
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट,
तेरे अहसास के साथ आती,
मेरी आंखों की चमक..
अगर तुम देख पाते,
तो तुम महसूस कर पाते,
उस इश्क़ को,
जो मैंने सिर्फ तुमसे किया है..

-Sarita Sharma

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सोचते रहे ये रातभर, करवट बदल बदलकर,
जाने क्यों बदल गया कोई, मुझे इतना बदलकर..

वो सर्वोपरि प्रेमपरिभाषा,
वो सर्वश्रेष्ठ प्रेमी गौरा का शिव..
वो दीनदयाला, करुणासागर,
वो प्रेम लुटाता सबका शिव..
वो भांग उड़ाता, धूनी रमाता,
बेपरवाह सा मस्त मगन सा,
वो भोला भंडारी मेरा शिव...🙏

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जो लोग मरते हैं वो कभी नहीं मरते..
जो रह जाते है वो मर जाते है..
जहां कुछ लोग किसी की एक झलक को पाने के लिए ज़िन्दगी भर तड़पते है..
वहीं कुछ लोग पास होकर भी उन्ही रिश्तों को जीते जी दफन कर देते है..

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