zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

एक पल फुरसत नहीं थी रुकने की,
होड़ सबसे आगे होने की..
सर्वस्व खुद को समझकर,
ये नफ़रत धरती पर बोने की..
महामारी तो पहले से ही थी..
बीमारी तो अब आयी है..
कुछ अच्छे, बुरे सबक के साथ..
वो मृत्यु साथ लायी है..
वन उपवन नष्ट कर दिए, शहरों का निर्माण किया,
प्रकति के नियम बदलकर विनाश का आह्वान किया..
खुद को खुदा समझ कर ईश्वर का परिहास किया..
शायद अब मनुष्य खुद को बदले,
जब उसने प्रकृति के आगे मुह की खायी है..
महामारी तो पहले से ही थी..
बीमारी तो अब आयी है...

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अपने बच्चों के पंख बनकर,
ख्वाबों को उड़ान देती..
तिनकों को इक्कठा करके,
वो सपनों का आशियाँ बुनती..
खुद सब मुश्किलें सहकर..
एक एक खुशियों को, आँचल में समेटा करती..
बीते वक़्त में गुजरे उसके त्याग के निशां है,
छोटे से आँगन में सिमटा वो मेरा सारा जहां है..
वो माँ है..वो माँ है.. हां वो मेरी माँ है..

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इस सफ़र के हम दो हमसफर हैं,
हां इस सफ़र पर बस "सफ़र" हो रहा है..
वो नहीं समझ पाता तन्हाई को मेरी,
वो हर पल मुझे अपने साथ जो देखता है..

-Sarita Sharma

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गुजरते वक़्त के साथ,
हर वक़्त ख़्याल आया
कि तुम नही हो,
पर अब कभी-कभी खामोश सोचती हूँ..
तो लगता है तुम ही तुम थे हर वक़्त..
ख़ुशियों से गूँजती हर हँसी में तुम थे..
गुस्से से बिलखती हर "मैं" में तुम थे..
ज़िम्मेदारियों भरी धूप में,
जब थक गयी थी चलते-चलते..
तब फिर से जगती उम्मीद में सिर्फ तुम थे..
हां हाथ पकड़कर पास नहीं थे तुम..
पर मुझमें ही कहीं हमेशा साथ थे तुम..
चंद अल्फ़ाज़ नही बयां कर सकते लिखकर तुम्हें..
सिर्फ़ एक दिन का ख़्याल नहीं हो तुम..
मेरी पूरी ज़िंदगी का अनमोल अहसास हो तुम...

-Sarita Sharma

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दूर हो जाते हैं दो इश्क़ करने वाले,
पर दो दिलों के दरमियां फ़ासले नहीं होते..

-Sarita Sharma

कितना ख़ुशनसीब होगा वो शख़्स,
जिसका नाम तेरे नाम के साथ जुड़ जाएगा..
कोई थक गया मिन्नतें कर करके,
किसी को तू यूँही मिल जाएगा..

-Sarita Sharma

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अलग है तू अलग हैं तेरी मशरूफियत के अंदाज़
तुझे ये तक नहीं है याद, तुझे कोई याद करता है...

मिट चुकी है इंसानियत, अब हैवानियत बाकी है,
किससे डरते हो तुम, अब और क्या मरना बाक़ी है..
अपनो ने अपनो को त्यागा,
सम्बन्धों ने बहिष्कार किया है..
क्या मृत्यु का ख़ौफ़ वाक़ई इतना है?
तुमने मानवता को भी शर्मसार किया है..
जब कांधा ना मिल सका किसी अर्थी को,
मृत देह का भी तुमने तिरस्कार किया है..
तज आया एक बेटा माँ को,
ममता की अश्मिता को भी तार तार किया है..
आंसुओ को अवसर देखा तुमने,
मजबूरियों का सौदा किया है
अपनत्व को तुम भूल गए हो,
इंसानियत को शर्मसार किया है..
विमुख हो गया जो कर्तव्य पथ से,
उसका अब क्या जीना बाकि है..
ज़मीर बेच दिया जिसने गर्दिश में,
उसका अब क्या मरना बाकी है..
मृत्यु जब अटल सत्य है तो फिर डरना क्या है...
इस तरह ही जीना है तो फिर मरना क्या है?

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बिछड़ कर धरती से, एक नया रूप रखती है,
किसी की याद में तब ये गरज गरज के बरसती है..
मिलने की चाहत लिए जब गिरती है ये बूंदे..
प्रकृति के हर कण में तब ये बस इश्क़ भरती है...

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