मैं एक प्राइमरी अध्यापिका हूं l मैं दिल्ली में रहती हूंl शुरू से ही पढ़ने, पढ़ाने में मेरी रूचि रही है l अपने मन के भावों को कविता, कहानी का रूप देने का यह मेरा छोटा सा प्रयास हैl आप सभी मेरी रचनाओं को पढ़ मेरा मार्गदर्शन करें, जिससे मेरी लेखनी को सही दिशा मिल सकेl

मात्र एक रावण के पुतले को फूंक
दशहरे की इतिश्री समझ लेते हम हर साल।
धू धू करते जलता देख
उस पुतले को मन ही मन खुश हो जाते हैं
कर दिया आज हमने रावण रूपी बुराई का अंत
सोच अपनी पीठ थपथपाते हैं।
लेकिन अपने मन के भीतर झांकने की
क्यों नहीं कभी हम जहमत उठाते हैं
या कहूं, अपने अंदर बैठे रावण को
देखने से हम खुद ही घबराते हैं!!
चलो, इस दशहरे पर हम करें खुद से शुरूआत
अपनी व्याधियों- विकारों रूपी रावण का कर दहन
सही मायनों में दशहरे के अभियोजन को बनाए सफल।।
सरोज ✍️

-Saroj Prajapati

Read More

कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

-Saroj Prajapati

हमारा दूसरा घर हमारा स्कूल है
और हम सब सखी सहेलियों की
यारी दूर दूर तक काफी मशहूर है।
सुख हो या दुख हर हाल में हम
एक दूजे का साथ निभाते हैं।
लंच में मिल बांटकर हम एक दूजे
के हाथों का लजीज़ खाना खाते हैं।
बर्थडे एनीवर्सरी हो या त्योहार
हर मौके पर हम खूब रौनकें लगाते हैं।
जिंदगी की छोटी छोटी खुशियां का
मिलकर भरपूर लुत्फ उठाते हैं।
हर छोटे-बड़े मौके पर हम सब
सेल्फी फोटो भी खूब खिंचवाते हैं।
फेसबुक और स्टेटस पर लगा उन्हें
सबके सीनों पर खूब तीर चलाते हैं।
ईश्वर से है बस यही दुआ हम सब
सखियों का साथ रहे यूं ही सदा बना।

-Saroj Prajapati

Read More

फूलों संग कांटे भी मंजूर है मुझे
जिंदगी तेरा हर रंग कबूल है मुझे।
सरोज ✍️

-Saroj Prajapati

सुना है ! तंग है ये इश्क की गली
फिर भी हर कोई इससे क्यों गुजरता है
दर्द और रुसवाइयां मिलती है इन गलियों में
फिर भी खुशी खुशी हर कोई क्यों जहर ये चखता है।

-Saroj Prajapati

Read More

उम्र के अंक अब बढ़ने लगे हैं
ख्वाहिशों के कद कुछ घटने लगे हैं
जिंदगी की इस भागदौड़ से
अब मैं थककर हो गई हूं चूर
भर ले मां, मुझे अपने अंक में तू
सहला मुझे फिर उसी प्यार से तू
तेरे स्पर्श मात्र से मिट जाएंगी
मेरी सब दुख तकलीफ और चिंताए
बचपन की तरह सो सकूंगी मैं
तेरे अंक में,निश्चित हो आराम से।।
सरोज ✍️

-Saroj Prajapati

Read More

आकर तेरी बाहों के दरम्यान , पूरे हुए दिल के सभी अरमां।।

-Saroj Prajapati

ब्याही बेटियों पर मां की ममता
कुछ यूं बरसती है.........................
इतने दिनों बाद तो आती हो, आते ही
क्यों जाने की इतनी जल्दी दिखलाती हो
अपनी सेहत का क्यों नहीं रखती ध्यान
देखो तो कितनी दुबली हुई जाती हो
मना करने के बाद भी मां प्यार से
हर बार एक रोटी ज्यादा खिलाती है
बिठा सबको साथ कितने चाव से
बचपन के कितने अनमोल किस्से सुनाती है
खोल अपनी संदूकची के पट मान
मनुहार से सूट साड़ियां छंटवाती है
माना बहुत कमाती है तू कहकर
हथेलियों में रख एक नोट वो मुस्काती है
विदाई की बेला में जल्दी आने का वादा ले
नम आंखों से गले लगा बेटियों पर
अपार स्नेह और ममता लुटाती है।
सरोज ✍️

-Saroj Prajapati

Read More

आया कैसा कठिन ये दौर है
हर ओर दहशत का माहौल है
सांसों को मुनाफाखोरों ने खरीद लिया।
असमय कितनी ही जिंदगियों को
उनके लालच ने हाय! लील लिया।
खोदते हैं जो दूसरों के लिए गड्ढा
वो खुद ठोकर खा उसमें गिर जाएंगे।
तमाशा देख रहे हैं जो दूसरों की मौत का
एक दिन चंद सांसों के लिए वो भी गिड़गिड़ाएंगे।
माना दुख की रात है कुछ गहरी और लंबी
पर हमारे हौंसले और विश्वास के आगे
वो जल्द ही समेट अपनी कालिमा ढल जाएगी।
विश्वास की किरणों संग, हरने दुख संताप
करने जीवन में फिर से खुशियों का संचार
वो सुबह जरूर आएगी, वो सुबह जरूर आएगी।

-Saroj Prajapati

Read More