human being, creative,

विचलित मन में फैला विवाद
उद्घोष हुआ जब शंख नाद
मचल पड़े सब वीर धीर
निकले भाले और खड़ग तीर
उठ तू भी धनु को थाम जरा
अंदर के अहम को मार गिरा
रावण तेरे भी भीतर है
कब तूने उसे पहचाना है
जब जो चाहा, है तूने किया
अब सत्य तुझे अपनाना है
मिथ्या वाणी, तू छोड़ तनिक
आ गई दशमी विजया प्रतीक

-Satish Malviya

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कोई गर बात मैं कह दूं, तुझको बतंगड़ लगती है
कोई जस्बात गर छेडूं, तुझको नौटंकी लगती है
कोई वाक्या सुनाऊं तो, तुझे अफसाना लगता है
तेरी तारीफ़ गर कर दूं, तुझे साज़िश सी लगती है।

सलीके जीने के सारे, तुझी को तो हैं आते
मेरी गिनती गवारों में, तेरे विद्वानों से नाते
बोलने पे जो तू आती, कसम से कहर ढा जाती
जुबां होते हुए भी हम, सहम के बोल ना पाते।

मुझे तू आग लगती है, तुझे लगता हूं मैं पानी
छुरी और खरबूजे जैसी ,है तेरी मेरी ये कहानी
शिकायत करता हूं मै पर, पता है तुझको दीवानी
धड़कनों मैं तू है बसती, तू मेरी है जिंदगानी।

-Satish Malviya

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लबों से पूछूं, या मुस्कुराहट से पूछूं।
डर से पूछूं, या आहट से पूछूं।
तू ही बता, ऐ रोज़ बदल जाने वाले वक़्त
अल्फाजों से पूछूं या लिखावट से पूछूं।

चमन से पूछूं, या गुलाब से पूछूं।
जाम से पूछूं, या शराब से पूछूं।
मुकर्रर रखना है अगर, चांदनी आसमां की
तो चांद से पूछूं,या आफ़ताब से पूछूं।

आंखो से पूछूं या इशारों से पूछूं।
दामों से पूछूं, या बाजारों से पूछूं।
जब हो जाएगा कभी बेमुरब्बत।
तो गर्दिश से पूछूं या सितारों से पूछूं।

-Satish Malviya

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तेरे भीतर जो दो चीज़
मुझे मिली हैं
एक तेरा दिल, दूसरी ज़िंदादिली है

-Satish Malviya

उनके दिल के किसी कोने में आज भी हम हैं
लोग कहते हैं तुम्हारी मुहब्बत में दम हैं
मगर कमबख्त इकरार ही नही मिलता उनका
इसी बात की तकलीफ़ और इसी का गम है

-Satish Malviya

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दुश्मनी तुझसे नहीं,तेरे इरादों से है
मोहब्बत खुद से नहीं,उन मुरादों से है
जो पूरी होती है,वतन पर मर मिट कर
इनका नाता तो,किए उन वादों से है





-Satish Malviya

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ऐ वक्त, ज़रा अपना दिल
थाम के रखना
तू भले परख ले हमे
जितना है, परखना
हार मानने वाले तो हम
कतई नहीं हैं
पर याद रख, तेरी तो
फितरत ही है बदलना

-Satish Malviya

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भले ही मेरे हाथ में, वो लकीरें ना हों
रुतबे, शोहरतें, दौलत के ज़खीरे ना हों
पर ईमान, और मेहनत के नगीने जो हैं मेरे पास
उन्ही से हैं ज़िंदा मेरी उम्मीदें और ये आस
कि मंजिले भी करेंगी इस्तकबाल मेरा
ना होगा कोई गिला ना कोई सपना अधूरा
क्योंकि हौसला है बुलंद, चाहे तकदीरें ना हों
हाथ तो हैं,भले उनमें वो लकीरें ना हों


-Satish Malviya

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कितने भी नुकीले हों कांटे
उनकी क्या मजाल
की वो हमे
चुभ जाएं
अंगार हैं हम
कोई शमा की लौ नहीं
जो किसी की भी फूंक से
बुझ जाएं

-Satish Malviya

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धड़कनों में, रूह में
ख़्वाबों में, ख़यालो में
बस गए थे, तुम जो मेरे
ज़िक्र में, सवालों में
ढूंढता हूं, तुमको हरदम
ढूंढ मै पाता नहीं
अक़्स तेरा गढ़ता रहता
ज़हन की दीवालों में

-Satish Malviya

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