संक्षिप्त शब्दों में वे तीन कारण जिनके लिए आपको मुझे पढ़ना चाहिए। 1. बेहतर शैली और वाक्य रचना 2. पारम्परिक हिंदी को नयी वाली हिंदी के साथ समाहित करके रोचक मगर सरल शब्दों में पाठकों तक पहुँचाना। 3. सामाजिक जीवन से जुड़े वास्तविक अनुभवों पर अर्थपूर्ण लेखन। मैं एक हैंडसम व्यंग्यकार हूँ, और यह अतिशयोक्ति नहीं है ।

तुम्हारी बद्दुआ थी कि बर्बाद हो जायेंगे किसी रोज़,

हमने वो हश्र किया है अपना कि देखोगे तो रो दोगे।

-Satyadeep Trivedi

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तुमने क्या गँवाया ये तुम्हारा दिल जाने,
हमने तो आतिश-ए-इश्क़ में जवानी फूँक दी।

-Satyadeep Trivedi

How its feel to get separated from someone, for the sake of world.

And then just act noRmaL for the sake of world.

-Satyadeep Trivedi

कौन है ये मुझको आवाज़ लगाने वाला।
कह दो मैं लौटकर नहीं आने वाला।
बाम से उतर के आओ तो गुफ़्तगू होगी,
या ढूँढ लो कोई चौखट पे सर झुकाने वाला।।

-Satyadeep Trivedi

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कसमें, वादे, वफ़ाएँ सब रास्ते में खो गए।
वो किसी और की हुई, हम किसी और के हो गए।।

-Satyadeep Trivedi

हमें भी था बहुत अरमान लेकिन,
कभी आया नहीं पैग़ाम लेकिन।
मुहब्बत की हमें भी है तमन्ना,
कई बाकी पड़ें हैं काम लेकिन।।

-Satyadeep Trivedi

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कुछ हिम्मतवर ऐसे भी हैं, सौ बार मुहब्बत करते हैं।

हम एक दफ़ा की जुर्रत में ही तौबा करते घूम रहे।

-Satyadeep Trivedi

साक़िया की ख़ुशामद करके जाम तक आया हूँ।

मैं बहुत मिन्नतों के बाद इस मुक़ाम तक आया हूँ।


-Satyadeep Trivedi

रातभर बादलों के भँवर में रहा।
रातभर कोई आशिक़ सफ़र में रहा।

एक चेहरा कि थीं जिसपे रुसवाईयाँ
ज़िंदगी भर हमारी नज़र में रहा।

जाम तो चढ़ के कबका उतर भी गया,
वस्ल के आँसुओं के असर में रहा।

हसरती आँखों से देखते वो रहे,
ना मैं रुख़सत हुआ ना ही घर में रहा।

घड़ी दो घड़ी बैठकर रो सकें
कोई ऐसा ना कंधा शहर में रहा।

घर में फ़ूलों की ख़ुश्बू बराबर रही
नाम जबतक तुम्हारा ज़िकर में रहा।

रातभर बादलों के भँवर में रहा।
रातभर कोई आशिक़ सफ़र में रहा।

-Satyadeep Trivedi

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अंतर के खालीपन को; बाहरी सुखों से नहीं भरा जा सकता।

-Satyadeep Trivedi