शिक्षा - एम.ए. संस्कृत, इंग्लिश, (रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली) अन्य - “लघु शोध साहित्य पर”, “प्रसार भारती आकाशवाणी दिल्ली, वाणी प्रमाण पत्र” एवं “पी जी डी सी ए”आदि ! अनुभव - न्यूज़ पेपर मे एडिटिंग वर्क, सहायक संपादक ५ वर्ष, आकाशवाणी बरेली में अनाउंसर । प्रकाशन - पाँच किताबें प्रकाशित, दो काव्य संग्रह ‘ये मेरा आसमां’ व “सागर मीठा होना चाहता है” तीन कहानी संग्रह “लिव लाइफ” बोधि प्रकाशन, “दर्द की लकीर” यश प्रकाशन व “आखिर कब तक” साहित्य संचय, एक उपन्यास “अडिग प्रेम” परिदृश्य प्रकाशन, मुंबई ! गूगल पर दो ब्लॉग = सीमा असीम का शब्द संसार, सीमा असीम की दुनिया ! कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, कादम्बिनी, दैनिक जागरण, अमर उजाला, लहक, परिंदे, समाज कल्याण, आदि अनेकों साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित रूप से प्रकाशन ! आकाशवाणी, दूरदर्शन पर कविता कहानी व परिचर्चा आदि में शिरकत करना ! हिंदी कविता कोष में रचनाओं का शामिल होना !! इसके साथ ही रंगमंच से जुड़ाव व अपने शहर के अलावा अन्य शहरों में नाट्य मंचन के लिए सम्मान मिलना !! नेशनल बुक ट्रस्ट, केंद्रीय निदेशालय के सेमिनार व अन्य अंतराष्ट्रीय सेमिनार मे बुलाया जाना आदि ! सम्मान - सारस्वत सम्मान, विशिष्ट सरस्वती सम्मान, सृजनलोक युवा कहानीकार का सम्मान आदि !! संपर्क - २०८ डी , कॉलेज रोड, निकट रोडवेज, बरेली – 243001 फ़ोन - 09458606469, 09870920329

लघुकथा
सीमा असीम, सक्सेना
अमीर
वो दंपति एक फाइव स्टार होटल मे ठहरे हुए थे ! उनका 6 माह का दुधमुहा बेटा भी साथ था !
क्या एक कप दूध मिल जायेगा सर ? माँ ने होटल मैनेजर से पूछा !
हाँ ! 100 रुपए मे मिलेगा !
ठीक है दे दो !
अगली सुबह जब वे कार से जा रहे थे तो बच्चे को फिर से भूख लगी ! कार को टूटी फूटी झोपड़ी वाली चाय की दुकान पर रोका और बच्चे को दूध पिलाकर उसकी भूख को शांत किया !
दूध के पैसे पूछने पर बूढ़ा दुकान मालिक बोला, हम बच्चे के दूध के पैसे नहीं लेते अगर आपको रास्ते के लिए चाहिए तो अधिक दूध लेती जाओ !

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दर्द
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यह कैसी दर्द घुटन बेचैनी सी
मुझमें भर गयी है
मैं अचानक गहरी नींद से
चौंक गयी हूँ
प्रिय सीने में उठता दर्द
असह्य सा हो रहा है
मानो कुछ गरम गरम टपक सा
रहा है
मेरे जख्मी दिल का लहू है शायद
सुर्ख लाल
मैं अपनी पूरी ताकत लगा कर
चीख उठी हूँ
आओ प्रिय
लो थामो मेरा हाथ
और चलो खुली हवा में
मैं स्वांस नहीं ले पा रही हूँ
मैं तुम्हारे हाथ पर रखकर अपना हाथ
उस अनंत आकाश की परिक्रमा करें
अपने वक्ष से लगाकर प्रेम करें
कि स्वांस को स्वांस आये
ताकि यह धरती अपनी धुरी पर
निरंतर चलती रहे
समस्त ब्रह्मांड के सभी कार्य
नियमवत होते रहें
आओ चलें हम साथ साथ
यह पुकार सुनो
कहीं देर न हो जाये
सुनो प्रिय
आओ चलें !
seema असीम saxena

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प्रेम
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मेरा प्रेम मुझमें विश्वास भर देता है
दे देता है जीवनी शक्ति
आस्था श्रद्धा से परिपूर्ण कर देता है
मैं लीन होकर प्रार्थना में
तपा कर
जलाकर और
मिटा कर खुद को
जीने लगती हूँ तुम्हें
तुम्हारे अक्स में पा लेती हूँ
स्वयं को
धड़कन धड़कने लगती हैं
साथ साथ
प्रेम सच में सच होता हैं
जो अमर रहता है
सदियों तक
जीवन मरण से मुक्त होकर
seema असीम saxena

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अचानक से चौंक कर आँख खुल जाती है
और दिल में घबराहट सी होती है फिर
सारी रात यूँ ही जागते हुए गुजर जाती है
तुम्हारी याद और तुम्हारी बातें
उन्हें सोचकर मन को बहलाती हूँ
काभी चहक पड़ती हूँ और कभी
उदास हो जाती हूँ
कल हम मिलेंगे कुछ मन को सकूँ आयेगा
फिर तन्हाई और बेइंतिहा दर्द का साथ
जो सिर्फ मुझे किसी तरह या मर मर के
अकेले सहना होगा
प्रिय तुम मुझे प्रेम करते हो न
बस यही एक बात मन में
खुशी भरती है लेकिन तुम्हारी शर्तें
दुख भर देती है और मुझे बंधनों में जकड़ देती है
प्रिय प्रेम तो आजादी देता है न
उछाह देता है न फिर
ये कैसी जकड़न कि लब सी देते हैं
मुस्कान को
और आँख में मेरे भर जाती है नमी
सिर्फ नमी ll
seema असीम saxena

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आत्मा
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जैसे जैसे रात गहराती है
वैसे वैसे मेरी आँखों की नमी
बढ़ती चली जाती है
मैं ज़ोर से आवाज लगाती हूँ
प्रिय आओ
मेरी बाहें हवा में लहराते हुए
दुआ माँगती है
मानो मेरी आत्मा शरीर से निकल कर
तुम्हारे पास पहुँच जाती है
और तुम्हारी आत्मा से एकाकार हो जाती है
दर्द गम घुटन बेचैनी उदासी तड़प
सबसे छुटकारा पा
खुशी से लबरेज हुई जाती है
प्रिय प्रेम में इतना दर्द क्यों है
और इतने आँसू.
तकलीफ है तो खुशी कैसे
पल में खुश हो जाता है मन
प्रिय तुमसे मिल कर
सब बीमारी गायब और दूर जाते ही
फिर बीमारियां तकलीफें
अब मुझे कभी अपने से दूर मत जाने देना
क्योंकि मेरी आत्मा दर्द से कराह उठती है ll.
सीमा aseem सक्सेना, बरेली

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कविता
ओ हवाओं घटाओं फिजाओं
और शाम की गहरी उदासियों
जो भी हो तुम सब जाओ और
मेरे प्रिय से कहकर आओ कि
मैं प्रेम में डूबी हुई कैसे दिन काट रही हूँ
मैं जी भी रही हूँ या नहीं,नहीं पता
मुझे कुछ नहीं पता
गर पता है तो इतना कि मैं
तुम्हें जी रही हूँ
तुम्हारा नाम लबों पर सजाये
पुकार रही हूँ कि
आओ मेरे प्रिय आओ
जहाँ भी मेरे प्रेम को महसूस करो और
मेरी फैली हुई बाहों में समा जाओ
आओ मेरे प्रिय आओ ll

seema aseem

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दुआओं में उठे हैं हाथ दर्द आँखों से बहा है
दिल को आये सकूँ बार बार सजदा किया है
ये मोहब्बत की दुनिया है सनम दिखाबा न करना
जो एहसास दिये तुमने वही कागज पर लिखा है ll
seema aseem

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सिर्फ तेरी,,
जहाँ तुम होते हो
वहाँ मैं
और जहाँ मैं
वहाँ तुम
पल भर भी तुमसे दूर नहीं
क्षण भर भी तुमसे दूर नहीं
कण मात्र भी दूरी नहीं
सुनो प्रिय प्रेम में
इतना डूब गयी हूँ तुम्हारे कि
अब सिर्फ तुम ही तुम नजर आते हो मुझे
खुली आँखो में भी तुम
और बंद आँखों में भी lll
असीम
सुनो प्रिय
मैं तुम्हें कल प्रेम करती थी
मैं तुम्हें आज प्रेम करती हूँ
मैं तुम्हें कल भी प्रेम करूँगी
और सिर्फ तुमसे प्रेम करूँगी
और सिर्फ तुम्हारे लिए ही
समर्पित होऊंगी
तन और मन से
कोई मुझे हाथ भी नहीं लगा पायेगा
और किसी ने मुझे छूने की कोशिश की तो
उसके लिये श्राप लगेगा
यह मेरा प्रण है
अब तुम अपनी तु जानो
जो वादे किये तुमने
क्या उनको निभाया
सोचो
बार बार सोचो
मैं तेरी हूँ
और सिर्फ तेरी ही रहूँगी सनम
जन्म जन्म तक
सिर्फ तेरी ही ll ll
असीम

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सुनो प्रिय
जब मैं तुमसे बात करती हूँ
तब जी को करार आ जाता है सकूँ भर जाता है
मन में बेचैनी न जाने कहाँ चली जाती है
स्वांस को स्वांस आ जाती है
दर्द गुम जाता है
मानो खुशी की लहर
दौड़ने लगी है
और जीने की आस फिर से बल्बती हो गयी
सुनो प्रिय तुमसे ही मेरा जीवन है
मेरी जीवन जोत तुम ही हो
तुमसे प्यारा कोई भी नहीं
तुम मेरे हो
सिर्फ चाहती हूँ तुम्हें और
कोई चाहत नहीं हैं मेरी
ख़ुश रहो तुम खुश होती मैं
मेरे दर्द की दवा तेरी खुशी के
सिवा्‍य कुछ भी नहीं मेरीll
असीम

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ऐसा भी होता है न कभी कभी
जब आसमाँ गाता है और
धरती झूमती है
टिकते ही नहीं पाँव जमी में
मानो हवा में उड़े जा रहे हैं
मुस्कान ऐसे चिपक जाती है आकर
कि मुँह दुख जाता है
वैसे कितनी प्यारी है तुम्हारी भी
मुस्कान
तुम्हारे चेहरे पर जब खिलती है
तो लगता है कि सूर्य की किरणें
अंधेरों को चीर कर चमकने लगी हो
और जगमगा गया हो पूरा आलम
कहीं कण मात्र भी अंधेरा नहीं
जैसे मुखर होने लगे हो भाव धरती के
और मौन होके झुक गया हो आसमाँ
या धरती कुछ उठने लगी हो
धड़कने कितनी तेज धड़कने लगी
मानो सीने से निकल कर सामने आकर बैठ गई हो
और नजरो ने नजर झुका कर धड़कनों की
हर बात मान ली हो
सोचती हूँ
क्यों हम अपनी खुशियाँ भूल जाते हैं
क्यों हम जी नहीं पाते
क्या सपनों को साकार करना अपराध है
समझ नहीं आता
असमंजस में हूँ
seema aseem

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