मै भोपाल मध्यप्रदेश से ,मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं..."वो नीम का पेड़" "हिन्दी और सिनेमा" एवं "हम तिरंगा लेकर आऐंगे."बाल कविता संग्रह

टूटे ख्वाबों की बोरियां भर लो
सितारों में मिलेंगे ना जब
हम मिलकर के तब जोड़ लेंगे.,.

सीमा शिवहरे सुमन

हम भी
टूटी आस को
रख देंगे किसी ताक पर
कहते हैं एंटिक चीजें
लाखों की कीमत
रखती हैं।

सीमा शिवहरे सुमन

भुलाने की कोशिश में
ये क्या कर रहे हो ?
पहले तो कुछ कम ही था
अब ज्यादा
याद कर रहे हो...

सीमा शिवहरे सुमन

#गांधीगिरी


‌मैंने अपने एक रिलेटिव को शादी की सालगिरह के अवसर पर नाॅनवेज डिनर पर बुलाया। वो परिवार के चार सदस्यों सहित बीस रुपए के फूलों का बंच लेकर आईं। बड़ा ही अजीब लगा कि लखपति लोग भी इतने चिक्कट , कंजूस हो सकते हैं । फिर कुछ दिनों बाद उनकी बेटी की बर्थडे पार्टी में हमें बुलाया गया और हमारे अंदर गांधीगिरी का कीड़ा जाग उठा और उन्हें शर्मिंदा करने की मनसा लिए 1000 का ए.डी.का कंगन गिफ्ट में ले गए । कंगन बहुत पसंद आया और बदल कर साइज़ बड़ा लाने का भी आॅडर दिया गया जिसे बेटी की मम्मी ने अपने पहनने के लिए बदलवाया था। कुछ महीनों बाद फिर हमारे यहां बेटे के बर्थडे पर वो महान महिला बीस रूपए का खिलौना लेकर आईं ।


‌सीमा शिवहरे सुमन

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कोई न रखी
तुमसे मैंने आशा
जानती हूं
मुहब्बत सिर्फ देने का ही नाम तो है।

सीमा शिवहरे "सुमन"

दिल रुक -रुक के, मेरा धड़कने लगा है।
हुआ क्या है, जो इस तरह तड़पने लगा है।
इस लगाव का , खुदाया अंदाजा हुआ तब,
कोई अपना जब , मुझसे बिछड़ने लगा है।।

सीमा शिवहरे सुमन

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रूह प्यासी थी , प्यासी है , प्यासी ही लौट जाएगी...
रूह को मेरी छू सके ,ऐसा कोई मिला ही नहीं....

सीमा शिवहरे 'सुमन'

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रात बादलों में से ज्यों चाँद की
चाँदनी बिखरती है।
छमा-छम वारिशों के बाद ज्यों
हरियाली निखरती है।
और गहन गाम्भीर्य के बाद
यूँ आपका मुस्कुराना...
मससूस होता है प्यासों के लिए
सहरा में भी, नदिया निकलती है।

समेटे मुझ जैसों को आँचल में अपने
आपकी ममता पिघलती है।
समझाइश आपकी भटके हुओं
की बुराई निगलती है।
गुजरती शाम को भी मैंने कई द़फा
रोशन होते हुए देखा।
आपके व्यक्तित्व से जो अनुपम
आभा निकलती है।।

मेरी आदरणीय गुरूओं को समर्पित
शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाए...

सीमा शिवहरे 'सुमन'

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*ईद मुबारक*

यूं अक्सर ईद का आना बड़ा बेकरार करता है..
मैं उसको याद करती हूं ,जो मुझको प्यार करता है..
चले आते हैं छतों पर हम, बहाना चांद का करके,
असल में, मैं उससे, वो मुझसे आंखें चार करता है!!

सीमा शिवहरे "सुमन"

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