मै भोपाल मध्यप्रदेश से ,मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं..."वो नीम का पेड़" "हिन्दी और सिनेमा" एवं "हम तिरंगा लेकर आऐंगे."बाल कविता संग्रह

रात बादलों में से ज्यों चाँद की
चाँदनी बिखरती है।
छमा-छम वारिशों के बाद ज्यों
हरियाली निखरती है।
और गहन गाम्भीर्य के बाद
यूँ आपका मुस्कुराना...
मससूस होता है प्यासों के लिए
सहरा में भी, नदिया निकलती है।

समेटे मुझ जैसों को आँचल में अपने
आपकी ममता पिघलती है।
समझाइश आपकी भटके हुओं
की बुराई निगलती है।
गुजरती शाम को भी मैंने कई द़फा
रोशन होते हुए देखा।
आपके व्यक्तित्व से जो अनुपम
आभा निकलती है।।

मेरी आदरणीय गुरूओं को समर्पित
शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाए...

सीमा शिवहरे 'सुमन'

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*ईद मुबारक*

यूं अक्सर ईद का आना बड़ा बेकरार करता है..
मैं उसको याद करती हूं ,जो मुझको प्यार करता है..
चले आते हैं छतों पर हम, बहाना चांद का करके,
असल में, मैं उससे, वो मुझसे आंखें चार करता है!!

सीमा शिवहरे "सुमन"

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तू मेरे लिए

अपनों से न बेवफाई
कर बैठे..

बस यही सोचकर ..

तुझको तन्हा छोड़ा मैंने..

सीमा शिवहरे 'सुमन'

रूहें जो हुई एक तो

मंजिल भी मिल गई.

यही चाहत की

सबसे बड़ी नैमत है।

Seema shivhare suman

इक रास्ता ऐसा चुना

जिसकी कोई मंजिल ही नहीं

जिंदगी गुजर जाएगी

यूं ही चलते-चलते....

सीमा शिवहरे 'सुमन'

*ऐ जमाने शुक्रिया तेरा*

*मैंने टुकड़े -टुकड़े सहेज कर*
*खुद को जोड़ा फिर से....*
*मुझे हर तरह से तोड़ने वाले*
*शुक्रिया तेरा...*.

*बहुत दूर थी मंजिल*
*मैं तय कर पाती नहीं...*
*मुझे पहली सीढ़ी से गिराने वाले*
*शुक्रिया तेरा...*

*मेरे घाव हरे ही रखे...*
*कभी सूखने न दिये...*
*मुझे हर घड़ी जख्म देने वाले*
*शुक्रिया तेरा....*

*अब तो मैं समंदर में*
*गोते लगाया करती हूं.....*
*मुझे कुए से निकाल फैंकने वाले*
*शुक्रिया तेरा.....*

*अब मुस्कुराने लगी हूं !*
*सामने पाकर मंजिल....*
*मुझे हर घड़ी रुलाने वाले*
*शुक्रिया तेरा......*

*हर कोई मुझे अपना कहे..*
*अब कुछ तो काबिल हूं मैं..*.
*मुझे अकेला छोड़ने वाले*
*शुक्रिया तेरा..*

*मुझमें निकालते रहे कमियां*
*उम्र दराज होने तक..*.
*अब खूबियां ही बची हैं खाली।*
*ओ अहंकारी! शुक्रिया तेरा...*

*सीमा शिवहरे "सुमन"*

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thanks matruBharti