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चलते चलते....

आ ढूंढते हैं एक शहर
जहाँ न गम आबाद हो।

महक हो वफाओं की
न दौलत का ख्वाब हो।

दिव्या राकेश शर्मा✍️

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उन हर्फो की खूशबू को महसूस किया मैंने
जिनमें लिखा था 'मोहब्बत'❤️❤️

दिव्या राकेश शर्मा।

जीवन....

बंद कर मुठ्ठियों को .....
समेटना चाह उसे.....
वह रेत की तरह.....
पल में बिखर गया।

दिव्या राकेश शर्मा।

कुरेदती रहती हैं दुनिया
जिस्म में छिपे किरदारों को..

शुष्क सी है जिंदगी यहां

चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं
आओ साथ इन्हें भी जीना सिखाएं।
सुना है बहुत बेरूख़ी से यहाँ जीते हैं लोग
आओ थोड़ी तबीयत इनकी रंगीन बनाएं।
सड़क के गलीचे सब ओर बिछे है
मिट्टी की चादर आओ मिलकर फैलाएं।

चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।

चलते दिखते हैं अक्सर कुछ जिस्म यहाँ
चाहतें बहुत है पर फिर भी है तन्हा
आओ यह अकेलापन उनका मिटाएं।
चलो इश्क का दीदार उनको कराएं।

चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं

हर शख्स मालिक है खुद का ही यहां
पर भरता रहता है क्यों किराया यहां।
न जाने क्यों आँखों में एक तिश्नगी है
कि ताबूत में बंद हर एक जिंदगी है।
चलो आज उनकों आजाद कराएं
कि उनकी जिंदगी से उनको मिलाएं।

चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।

लटके हुए कुछ चाँद तारें यहां हैं
पर वे भी है अकेले न जाने कहाँ है
हर बंद कमरें में एक दास्तां छिपी है
कि हँसता है हर कोई फिर भी दुखी है।

चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।

न जाने यह वक्त क्यों बदल रहा है
वो रूकता नहीं क्यों हर वक्त चल रहा है
बांध दो तुम समय को जरा घड़ी को छिपाओ
छेड़ो न साज न गम को गुनगुनाना
न जख्मों को तुम अब मरहम लगाना
आओ जमाने को खुशियां बांट आएं।

चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।

दिव्या राकेश शर्मा।

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रूह की चाहत है वस्ल ए रात की
न जुस्तजू है कोई माहताब की।

ढूंढते हैं वे सकूं औ इश्क हुस्न में
परवाह किसे है जाने जनाब की।

रुखसार भी महके है, दिखते गुलाब से
महसूस हम करते हैं खूशबू जनाब की।

हम रहते है गुमां में उनके ही इश्क के
वह सुरखाब बन गई है अपने ही ख्वाब की।

लिखते हैं बज्म भी उनकी निगाहों पे
वह तकदीर बन गई मेरे सवाब की।

दिव्या राकेश शर्मा।

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कुछ दर्द बहते नहीं दिल से
रिसते रहते हैं किरच किरच कर....

अग्नि रुप में है विद्यमान
स्त्री का हृदय धरा पर
है आधारभूता जीवन की
और मृत्यु भी करें प्रदान।
ज्वाला बन,कर रही
रक्षा इस जगत की
और रौद्र रूप धरकर
दुष्टों का करें संहार....

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इश्क को पाकर
बिलकिस बन गई
नूर फिजां में आया है
या रब ये तेरा करम है
मैंंने खुदा को पाया है...
दिव्या राकेश शर्मा।

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शब्दों के खंजर से लगे निशान,
दिखते नहीं, पर दुखते बहुत है।