One can experiences direct experience like suspense, thriller, action, romance, murder mystery in short story, long story and red it in my written book most of the stories, novels, social, spiritual, inspirational, creative, imaginative, Psychological, etihasic, technological, love emotional, Buddha, I have written books on all these topics and write Poetry, well thought out and creative quotes.. There are occupations and passions that flow in my blood like a veil Always... by--- Shekhar Kharadi

#विधवा

विधवा की ऐ कैसी विवशता, कैसी विडंबना ?
सदियों की प्रथाके नाम पर , परंपरा के नाम पर
स्त्री का शारीरिक, मानसिक शोषण होता रहा ।

जबरन श्वेत वस्त्र पहनाकर ,
केशों का गजरा उधेड़ दिया
माथें का सिंदुर मिटा दिया
काया का शृंगार हटा दिया
रूप का शीशा तोड़ दिया
पति की यादें जला दि ,
समाजनें अपशुकन मान लिया
लोगोंने सरेआम ठुकरा दिया
स्वजनों ने खुल्ला धुत्कार दिया
असहनीय,अकल्पनीय शब्दों से
अविश्वसनीय निर्दयी बर्ताव से
कलंके के छीटें छिड़ककर ,
धृणा का हलाहल पीलाकर
डाकन-चुड़ैल का नाम देकर
संबंधों में लकीरें खींचकर ,
कठोर नियमों में जकड़कर
खुशियों पर ग्रहण लगाकर
देखके प्राण सिसकते, बिलखते रहें ।


विधवा की ऐ कैसी विवशता, कैसी विडंबना ??
सदियों के प्रथाके नाम पर , परंपरा के नाम पर
स्त्री का शारिरिक, मानसिक शोषण होता रहा ।

जीवन नीरस-सूखा-बंजर बनाकर
दुःख के मातम में छोड़ कर ,
व्यथा के सागर में डूबो कर
कांटों के पथ पर चलाकर
नैनों के दृश्य में उलझाकर
भीतरी द्वंद्व में भटकाकर
इच्छा के मझधार में बहाकर
हृदय की भावना सूखाकर
रक्त का प्रवाह रोककर
नाड़ी को सिथिल बनाकर
कष्टों के भंवर में छोड़कर
सारे बंधनों को भूलाकर
अस्तव्यस्त त्रस्त करके ,
पग पग पर व्यवधान ड़ालकर
उसका सारा जीवन स्मशान बना दिया ।


विधवा की ऐ कैसी विवशता कैसी विडंबना ???
सदियों के प्रथाके नाम पर, परंपरा के नाम पर
स्त्री का शारिरिक, मानसिक शोषण होता रहा ।

( २०/९/२०२० )

--© शेखर खराड़ी

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#शिकार

चौबीसे घंटे कार्य में व्यस्त रहतीं
जीवनभर गृहस्थी में डूबीं रहतीं
सभ्य संस्कारों में पिसती रही
परंपरागत जड़ों में मिटती रही
प्रतिक्षण सेवा में खोई रहतीं
उपकार पर उपकार करतीं रही

फिर भी क्यूँ.. जुल्म सितम की
शिकार एक स्त्री बनती रहीं ?

रोकटोक कड़वे घूंट पीकर
व्यंग्य बाणों का प्रहार झेलकर
तिरस्कृत के खट्टे भाव चखकर
निरुत्साह के तीखें स्वाद जानकर
दुत्कार के ज़हरीले शब्द सुनकर
प्रताडऩा के तीक्ष्ण ज़ख्म सहकर

फिर भी क्यूँ.. जुल्म सितम की
शिकार एक स्त्री बनतीं रहीं ??

वो रोज जीकर मरती रही
रीतिरिवाजों के पोखर में
यातना की नदी में, बंद दिवारों में
अल्पसंख्यक सपने मारकर,
स्वयं का ठोस अस्तित्व भूलाकर
निर्दयी विचारों में सौबार रेंगकर

फिर भी क्यूँ ..जूल्म सितम की
शिकार एक स्त्री बनतीं रही ???

जीने की आश एकबार न रखकर
क्रूर समाजों में सहस्त्र बार टूटकर
इच्छाओं में छिन्न भिन्न होकर ,
हृदय से द्रवित फटती रही
देहके टूकड़े टूकड़े करके
पतझड़ कि तरह झड़ती रही
स्वयं को स्वयं में तलाशती रही

फिर भी क्यूँ..जुल्म सितम की
शिकार एक स्त्री बनतीं रही ????

(१९/९/२०२०)

-© शेखर खराड़ी

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#विजय

हे..मनुष्य
तू क्यों ड़रता है, क्यों घबराता है ??
लक्ष्य की प्राप्ति में बढ़कर तो देख
कांटों भरी राह में चलकर तो देख
जंगलों-पहाडों में जाकर तो देख
आखिरी श्वास तक लड़कर तो देख
विकट बाधाओं को हराकर तो देख
विजय पताका लहरा कर तो देख
पराजय मुठ्ठी में कैद करके तो देख
किसीकी तलाश में जान देकर तो देख
तूफ़ानों पे सवारी करके तो देख
व्यवधानों पे हंसकर तो देख
तू हिम्मत हारना नहीं, रास्तों से भटकना नहीं
हड्डियों को वज्र बना, हृदय को उत्साही बना
ड़र नहीं तो पराजय नहीं, जीत ही मिलेगीं
तेरे मन पे विजय पाकर तो देख
सफलता तेरे सामने नद मस्तक होगीं ।।

( १७/९/२०२०)

-© शेखर खराड़ी

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#भद्दा

हां.. मैं एक स्त्री हूँ
भद्दे समाजों में ,
बेढंग विचारों में
जड़ प्रथाओं में ,
रिति-रिवाजों में..

मैं भी घुटती हूँ
पिटती हूँ, पिसती हूँ ,
बिखरती हूँ, टूटती हूँ
भीतर ही भीतर रो कर
क्षण क्षण मरती हूँ...!!

देह की आड़ में
वंश की चाह में ,
दहेज की मांग में
पिट पिटकर,
सतायी जाती हूँ
जलायी जाती हूँ
निष्ठुर रिश्तों में ,
निःशब्द व्यथा में
स्वाहा करके....!!

हाँ..मैं एक स्त्री हूँ
खुलकर उड़ना चाहती हूं
सपनों को जीना चाहतीं हूं
करूप रिवाजों से मुक्त होकर ,
दोगले व्यवहारों से रिक्त होकर
उन्मुक्त हवा में दौड़ना चाहती हूँ
खुली राहों में चलना चाहती हूँ
उमंगीं लहरों में तैरना चाहती हूँ
हा..मैं एक स्त्री हूँ, हा..मैं एक स्त्री हूँ
बस मेरे बंजर हृदय में खुशियाँ लौटा दो..!!!

(१६/९/२०२०)

- © शेखर खराड़ी

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