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काव्य संग्रह "रेंगते केकड़े"
https://www.amazon.in/dp/938975738X

मेरी क़िताब

ज़िन्दगी कलयुग की बेल है
अपने शान की न करो बातें।
जिंदगी में दुर्योधन घुसा है
अपने आन की न करो बातें।
त्रेतायुग अब कभी वापिस
लौट कर न आएगा-
अब होंगे न कभी दशरथ
राम की न करो बातें।
शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द

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मेरी किताब 'रेंगते केकड़े' काब्यसंग्रह
शीघ्र प्रकाशित होने वाली है।
शिव भरोस तिवारी

कल्पनाओं का पूरा
संसार लिए मेरी किताब
'रेंगते केकड़े' काब्यकृति प्रकाशनाधीन है जो शीघ्र ही
पाठकों तक पहुचने वाली है।

शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

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माँ ने घर के आंगन में लगाया था एक तुलसी का बिरवा।
पिता ने उगाया एक बटबृक्ष।
पत्नी उसी जगह रोप दिए दो गुलाब।
इसी के पास खिंची लकीर
के शौर्य मंडल में
अनगिनत प्रश्नों की गठरी लिए मैं खड़ा हूँ।
शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

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वर्ष-2020
बीते वर्ष की बूंदों से उम्र की दोहनी भर गई।
नववर्ष 20 आने से जीवन की दोहनी खाली हो गई।
शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

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प्याज प्याज न रहा
आलू भी छोड़े साथ।
महगाई काट रही
अब जन जन के हाथ।
शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

यदि देश के शासक द्वारा देश हित में बनाये गए कानून से देश के विपक्ष में हंगामा परपे तब समझ लीजिए कि राजा अपनी प्रजा के लिए सही निर्णय लिया है जिसका स्वागत होना चाहिए।
शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

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कोई बिठा दिया है जैसे तुंग शिखर के भयानक खुरदरे कगार के तट पर;इन शिखरों की यात्राओं से डर के बुलबुले मेरे शून्य में तैरते हैं,इस आभास के स्पर्श की गहरी खोह से खुद को निकालने का मार्ग प्रशस्त कर जिंदगी को उन्मुक्त उड़ान भरने का अवसर प्रदान करना है। शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

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