Hey, I am on Matrubharti!

तुम मुझे देखो या फिर न देखो मगर मैं तो तुम्हे देख रहा हूँ।
थोड़ा नही आधा नही मैं तुममे पूरा ही लीन हूँ मेरे कृष्ण जी।

Read More

"पापा"
पापा इतने पैसे भेजवाया न करो।
मुह फेर कर आंसू बहाया न करो।
मैं जानता हूँ पापा दर्द तुम्हारा
कितना बड़ा है बोझ तुम्हारा
खुद को इतना विवस पाया न करो।
पापा इतने पैसे भेजवाया न करो।

कुछ ही वर्षों का दर्द है पापा
तेरे दर्द की कीमत मैं चुकाऊंगा
जब कलेक्टर बन घर आऊंगा
तब दीदी की शादी करवाऊंगा
छोटे भाई को डॉक्टर बनवाऊंगा
बातें कर मम्मी को रुलाया न करो।
पापा इतने पैसे भेजवाया न करो।

डांट कर मुझको रोज उठाया
भविष्य के मेरे सपने सजाया
मेरे लिए मंहगे सूट सिलवाया
खुद के कपड़े सस्ते बनवाया
कार की जगह बाइक चलाया
पापा ज्यादा प्यार जताया न करो।
पापा इतने पैसे भेजवाया न करो।
किताब-'सत्य के छिलके' कविता संग्रह से
रचनाकार:-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

Read More

"जिंदगी भटक गई है"
बरसों के चक्रव्यूह में फंस कर घूम रहा हूँ
पलकों से बहती ख्याहिशों को चूम रहा हूँ
बेमौषम की हवाएं चित्रकूट की
अंधेरी खोह में पटक रही हैं
कितने ही हलों की नोकें
देह की धरती में गड़ी हैं
जीवन की डोरें क्षीण होने पर
अब तुली पड़ी हैं
अरमानों की फटती चादरें
दशकों से मुझे पुकार रही हैं
आशाओं की भट्टी ललकार रही है
कर्म का घन मुझे गुहार रहा है

मैं तब भी भटक रहा था
मैं अब भी भटक ही रहा हूँ
कच्चे घर की खपरेलें
सिसकियां भरती हैं शदियों से
फटे खेत प्यासे हैं बरसों से
संध्या मैली हो गई है
सुबह पर छाया घना अंधेरा
छाती पर कितने उलाहने
शूली बन उर में धसक रहे हैं
सूखी धरती के कण कण को
दशकों से चूम रहा हूँ
मजबूरी के इर्दगिर्द मैं घूम रहा हूँ
मन मे अंतर्द्वंद छिड़ा है
वक्त के अकुआएँ कजरियों पर
मैं कब से कृतघ्न पड़ा हूँ
रचनाकार-शिव भरोस तिवारी "हमदर्द"
किताब:-"सत्य के छिलके" संग्रह से
सर्वाधिकार सुरक्षित

Read More

(63)*जहाँ से चले वही ठहर जाना है अब*
जब मैं दूर देश
गली खेत खलिहानों की मिट्टी के साथ
अपनी यादों की पंखुड़ियों को लेकर
एक अंजान शहर के एक कोने में आकर
बनाया था सुंदर एक रैन बसेरा
शहर की चरण की धूल को
अपने मस्तक में पोत कर
दिन रात तोड़ने लगा था पत्थर

जिंदगी की बैलगाड़ी को
खींच रहे हैं शहरी अंधेरे में
कभी हाँकना तो कभी हाँफना
सरारती गलियों के घुप्प अंधेरे में
उदास बैठा है जीवन का उजाला
उर का भार उलझे ख़यालों में
दर्द की एक अनकही अंतहीन यात्रा
शंकाग्रस्त सपनों के थरथराते पैर
पहाड़ सी चढ़ान पर पीछे सरकती
जिंदगी की यह बैलगाड़ी जहां से चली थी
वही पर आकर ठहर गई सी गई है,

सड़क की तमभरी चढ़ान
बलखाते खतरनाक मोड़ पर
अनंत गहराई के संस्पर्श के साथ
बिपरीत हवाओं से आलिंगन कर
एक ओर भयानक खड्ड तो दूसरी ओर
बरसों का गहराया अंधेरा चढ़े थे
मजबूरी के खयाली शिखरों पर
उतर कर जा रहे जन्मभूमि की ओर
जो सोने की लंका से भी महंगी है
जहां से चले थे पैर वही पर
पुनः ठहर जाना है अब।
रचनाकार-शिव भरोस तिवारी "हमदर्द"
सर्वाधिकार सुरक्षित

Read More

(58) मजदूर की आत्मकथा
भुखाग्नी की काष्ठ के बीनते नित्य सूखे डंठल
सुखतीं टहनियां, डालें सूखे सभ्यता के जंगल
भोर की नई उम्मीदों के दरख्तों पर हस्ताक्षर
सपनों की टोकरी में जमा करते रहे नवसाक्षर
साँसों की धौकनी से निकालते रहे सभी धुआं
वर्षा-गरमी-सरदी अतृप्त क्षुधा का श्रप्त कुआं
कोमल अतिशय कोमल अति नवीनतम पैर
साश्रुनयन मूल्यांकन समीक्षा में रहे जैसे तैर,

सातवें असमान के कहीं दूर खंडहर हुए महल
चुम्बी इमारतों के पुनर्निर्माण का होगा पहल?
मजदूर प्रतीकात्मक सपनों की उदास गलियां
गंभीर करुणात्मक उर भेद खोलतीं कलियां
देश के मजदूर की अतृप्त से घिर उठीं आँखें
बरगद के तने जैसे टूटीं गहन नेतृत्व की साखें
मजदूरों तरफ नही बढ़ाएं गए कल्याणी हाथ
रास्ते पर कचरे सा हाल नही दीं सरकारें साथ,

सम्बेदनहीनता के मृदुल कर्कश के गूंजे स्वर
आँखों में अश्रु और अभिमान का नाचा नश्वर
मन के भीतर बिघलती हुई हिमालयी चट्टान
रीढ़, पसलियों, पाँव मे जैसे जम गया खून
छाती की मटमैली उष्ण छरित हो गई सब
गांव के कछार की धूप किलकारी भरे अब
मजदूर चेतना,ज्ञान,अनुभव जाग्रत हो गए
निष्कर्ष में भयाबह अंधेरे के दिन कट गए।
रचनाकार:-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'
सर्वाधिकार सुरक्षित

Read More

"बेचैन मजदूर"
बेचैन मजदूर
गांव से दूर,बहुत दूर
प्यासे प्यासे,भूखे भूखे
देख रहे आश्वासन की झील
चलना है अभी हजारों मील,

बेचैन मजदूर
पड़ गए पांव में छाले
पीठ पर नन्हा सा बच्चा
गठरी में बासी रोटी के टुकड़े
बरगद के बूढे छांव तले
नमक घोल कर खाते रोटी
पेट और पीठ दोनो गए मील,

बेचैन मजदूर
सप्ताह में पहुच जाएंगे गंतब्य
शहर नही आएंगे कर शंकल्प
चलते उठते बैठते पैर थरथराते
राज्यो की सीमा मिली होगी सील
कइयों को रास्ता ने लिया लील
रचना-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

Read More

(51) शस्य श्यामल गाँव
घने अंधेरे में नियति ने दिया है डाल
हुई चकित भ्रमित मानव की हर चाल
कौन?नही चाहता समाजिक नजदीकियाँ
परिस्थितियों ने गढ़ लीं समाजिक दूरियाँ
क्या कोई भी चाहेगा शून्य से भी टकराना
कौन? चाहेगा अदृश्य युद्ध में जान गँवाना
दुनिया का देख दर्द मेरा ह्रदय हुआ पाषण
इस वैश्विक युद्ध में क्या? बच पाएंगे प्राण

नियति से कहाँ? चला है किसी का बिरोध
मानव कर ही सकता है नियति से अनुरोध
प्रकृति के अवबोध का है प्रत्यक्ष ऐ परिणाम
आसमान में चमकता तो सूर्य,धरा पर शाम
ईश्वर के खौप का कहाँ? है किसी को बोध
मानव ब्यर्थ में ही कर रहा है ईश्वर से क्रोध
रूठी गेहू की बाली,चना,अरहर और धान
नही निकलते कमल,कुमुदनी,तालमखान

याद आने लगे हैं शस्य श्यामल गांव कछार
छोड़ शहर घर आये कर लक्ष्मण रेखा पार
जाने लगे हैं मिलने सब जमीदारन के पास
भूला कर बीती बात लेकर काम की आस
धन्य हैं वे जिनके मृदुलतम खेतों की सुगंध
जिसे सूंघ कर मिटती थी भूखन की दुर्गन्ध
याद आतीं हैं मुझे लगुईन लगुवन की बात
खेतों के मेड़ो में बीतती थीं पूरी ठंढ़ी रात!
रचनाकार-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'
सर्वाधिकार सुरक्षित:-

Read More

(50) "पत्थर के देवता"
पत्थर के देवता
हे शिव शंकर भगवान!
करूँ हमेशा मै उद्दण्ता के ही काम
भूल कर भी कभी न जपु तेरा नाम
करूँ सदा निर्भय होकर पाप हजार
फिर भी चाहू नतमस्तक रहे संसार
अदृश्य नाग़ बन डसता रहूँ सुख-चैन
ब्रम्हपुत्र कभी न पहुचें मुझ तक तेरे नैन,

पत्थर के देवता
हे शिव शंकर भगवान!
नहीं चाहिए मुझे तुझसे कैसे भी बरदान
खुला रहे आतंक का मेरा यह रोशनदान
मानवता को लीलने मुझको है अधिकार
नहीं कभी रगडू मै तेरे कोई मंदिर के द्वार
गलियां करूँ मै सकरी ले न पाएं कोई साँस
गले को जैसे जकड़े है यहाँ करोना की फाँस,

पत्थर के देवता
हे शिव शंकर भगवान!
नीहारिकाओं का करे न कोई अभिसार
हो गया तेरा जतन प्रभु,तडप रहा संसार
सड़े मानव आदर्श विचारों के महा अर्श
माह में ही गिर गया मानव दंभ, अब फ़र्श
अत्याचार,ब्याभिचार,मानव खून रंगी धरती
बिकल हुई माया संघार करे वो क्या? करती
मूँद आँख कर करूँ शून्य का ही ध्यान
पत्थर के देवता हे शिव शंकर भगवान!
रचनाकार-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

Read More

(01) "कल्पना की देवी"
कल्पना की देवी
हे माँ सरस्वती भवानी
करता हूँ मै तेरी अगवानी
नही मुझे अभिशाप चाहिए
नही मुझे संताप चाहिए
दे दो मुझको तुम शांति
कर दे दूर उलझन,दर्द,भ्रांति
रहे नही मन तनिक बेचैन
करुणा,स्नेह बरसते रहें नैन,

कल्पना की देवी
हे माँ सरस्वती भवानी
करता हूँ मै तेरी अगवानी
मन मंदिर में करो निवास
पपित्र करो पूरा आकाश
अक्षर का तुम ज्ञान कराओ
शब्दों का भंडार दिखाओ
सांसों में सुर गीत सजाओ
प्राणों को संगीत सुनाओ,

कल्पना की देवी
हे माँ सरस्वती भवानी
करता हूँ मै तेरी अगवानी
क्रोध का अक्रोध से करो अंत
बन जाऊं मै एक आदर्श संत
तुन्ही हो भव तुन्ही हो निर्माण
तन भी मन भी तुन्ही में प्राण
तुन्ही संभावना तुम्ही अनुमान
तुम्ही स्मृति,विस्मृति का स्थान
रचनाकार-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

Read More

रात्रि नींद आने की अचूक दवा यदि पसंद आए तो जरूर इस्तेमाल करें बस 20 मिनट ध्यान लगा कर आध्यत्मिक या पर्सनालिटी की पुस्तक पढ़ने से नींद आ जाती हैं।
शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'

Read More