Singer + Writer ( instagram - poetry_of_sjt )

जिन्दगी की जरूरतें क्या कुछ नही करवाती ,
पूरा करने की चाहत में मैं बहुत थक जाता हूं ,
घर से निकला था मां के कदमों को चूम कर ,
कामयाब तो हो रहा हूं पर बहुत थक जाता हूं ,

पहली बार घर से दूर निकला हूं मंजिल पाने ,
चलता रहता हूं राह में पर बहुत थक जाता हूं ,
कई तरह के लोग मिले कुछ अच्छे तो बुरे भी ,
रुका नही रोकने से मैं पर बहुत थक जाता हूं ,

कुछ दोस्त बनाए हैं सुख दुःख बाटने के लिए ,
मुसीबत से अकेले लड़ के बहुत थक जाता हूं ,
एक सहारा बना रहता है इनके साथ रहने से ,
ख़ुद को तैयार कर रहा हूं बहुत थक जाता हूं ,

किराए का कमरा है बड़ी मुश्किल से मिला है ,
किसी का सहारा नही पर बहुत थक जाता हूं ,
नौकरी भी मिल गई है मेरी मां की दुआओं से ,
काम तो ठीक ठाक है पर बहुत थक जाता हूं ,

पेट तो भर जाता है यहां मिले इस भोजन से ,
मन में तसल्ली नही होती बहुत थक जाता हूं ,
स्वाद नहीं मिलता यहां मां के बने हाथों जैसा ,
कभी कभी खुद से बना के बहुत थक जाता हूं ,

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रास्ता बुलाता है चलने का इरादा तो कर ,
मंजिल मिल जायेगी खुद से वादा तो कर ,
मुश्किल होता है ख़ुद को साबित करना ,
विजय मिल जाएगी परिश्रम ज्यादा तो कर ,

सपने सिर्फ़ देखने से पूरे नही हुआ करते ,
कोशिश करने से वो अधूरे नही हुआ करते ,
रातों की नींद दिन का चैन खोना पड़ता है ,
कभी कभी तो भूखे पेट ही सोना पड़ता है ,

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#_बारिशों_के_दौर_में____SJT

बारिशों का दौर न था फिर भी एक तरफा बरसे ,
एक सदी से मिल न पाए उनसे इस तरहा तरसे ,
गांव के गलियारों में जब कभी जुगनू इक चमके ,
देखकर एक मुसाफ़िर लगा वो चलने जब घर से ,

कई दफा मुश्किलों ने घेरा फिर भी जीत आए ,
सावन में सुहावन लता-वन मिलकर गीत गाए ,
भंवर को कली से मिले एक अरसा गुज़र गया ,
गुज़ारिश है यही अब संग रहकर उम्र बीत जाए ,

कहानियों में ही अक्सर राजा रानी एक होते हैं ,
असल जिन्दगी में दुश्मन प्यार के अनेक होते हैं ,
बिखर जातें हैं शीशा कुछ ख़ुदगर्ज देखकर के ,
मुकम्मल होते हैं लोग इरादे जिनके नेक होते हैं ,

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तुम मेरे हो न सके तो गिला कैसा ,
शायद मेरा था नही तो मिला नहीं ,
गुज़ारिश है मुझे पहले जैसा कर दो ,
दिए तेरे जख्मों का कोई सिला नहीं ,

एक सदी से सिर्फ़ तुम्हें चाहा हमने ,
जिन्दगी के कुछ पल तेरे साथ रहूं ,
चाहत यही की हर खुशी मिले तुम्हें ,
दूर से ही सही उसके मैं पास रहूं ,

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यादों के साए में रहना मुश्किल होता है ,
तन्हा होकर भी हंसना मुश्किल होता है ,
समंदर ख़ुद में गहराई रखता है लेकिन ,
ख़ामोश होकर बहना मुश्किल होता है ,

#PoetryOfSJT

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बहुत तन्हा कर देता है शहर का शोर अक्सर ,
उजाला जगनुओं से मैं उधार लेकर आया हूं ,
मौत की हवा कुछ इस तरह से चली है यहां ,
नफरतों के दौर में सिर्फ प्यार लेकर आया हूं

शिकायतों को भी मौका मिलेगा शिकायत का ,
सुख दुःख का अपना व्यापार लेकर आया हूं ,
काटें भरी राहों में चलता रहता सिर्फ कहने से ,
गुलशन से फूल एक असरदार लेकर आया हूं ,

चालाकियों के कई चहरे से वाकिफ हूं तब से ,
जब से विश्वास का इक आधार लेकर आया हूं ,
बहुत ही आसान हो गया है अपनों को जानना ,
ख़ुद का वैसा ही इक किरदार लेकर आया हूं ,

अलग हो गया चांद चांदनी से सुबह होने पर ,
इस लिए तो दोस्त मैं वफादार लेकर आया हूं ,
खैर हटाओ अब सब बकवास बातों को मेरी ,
मैं जन्म दिवस का समाचार लेकर आया हूं ,

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सुकून की तलाश में भटकता रहा सारी उम्र ,
बन गया मुसाफिर अजनबी गलियों का मैं ,
इक अधूरी ख्वाहिश की ख्वाहिश लिए यहां ,
हूं बंजारा लगता है जैसे कई सदियों का मैं ,

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बस दिल ही जानता है जो दिल में चलता है ,
आज ग़म है कल खुशी वक्त यूं ही बदलता है ,
फ़िराक ए वफ़ा में दरबदर हुआ ज़माने में तो ,
इसी टीस में एक उम्र से दिल रोज़ जलता है ,

सबने रिश्तों के रंग दिखाए माना चलता है ,
अंदर ही अंदर इंसान के ज़हर भी तो पलता है ,
बोल के अगर तौल दे बातों को फिर तराज़ू पर ,
तभी सारी समस्याओं का हल भी निकलता है ,

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जब भी वक्त मिले तो चले आया करिए ,
सुना है वक्त हर वक्त नहीं आया करता ,
मिले जो मोहलत ताल्लुक़ात रखने की ,
ऐसे मौके हरगिज़ मैं नहीं गवाया करता ,

देता हूं आवाज़ की मुझे आवाज़ दो कभी,
लेकर तेरा नाम कभी नहीं बुलाया करता ,
पल भर में बात अख़बार हो जाती है यहां ,
चिंगारी को हवा देकर नहीं सुलगाया करता,

तेरे शहर में ख़ुद को मैं मुसाफिर बनाया हूं ,
तेरे घर वाली गलियों से नहीं जाया करता ,
चर्चे तमाम हैं हमारे नजदीकियों के यहां ,
बात ऐसी है किसी को नहीं बताया करता ,

तुम्हें ऐतराज है इश्क -ए मोहब्बत से बहुत ,
बस इसी लिए इश्क को नहीं जताया करता ,
मलाल रहता है मुझे तेरे इसी बेरुखीपन से ,
नज़रों को अपनी तुझसे नहीं हटाया करता ,

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बहुत रूठने लगी हैं ख्वाहिशें मुझसे ,
मुफलिसी के घर में रहने लगा हूं अब ,
कोई भूले से आना नहीं चाहता यहां ,
खुद अपनी मौज में बहने लगा हूं अब ,

हर शख्स दिवाखा करता है यहां पर ,
ख़ुद ही जख्मों को सहने लगा हूं अब ,
खफा हो जाते हैं अक्सर मुझे लोग ये ,
सच लोगों के मुंह पे कहने लगा हूं अब ,

सोता नहीं आजकल रातों में अक्सर ,
चांद तारों को देख जगने लगा हूं अब ,
लोग पूछते हैं क्या लिखते रहते हो ये ,
मन के जज़्बात को लिखने लगा हूं अब ,

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