Singer + Writer ( instagram - poetry_of_sjt )

अंग्रेजी सभ्यता का बुखार चढ़ा है तुमको ,
इस लिए ख़ुद को पहचान नहीं पा रहे हो ,
आदत है गुलामी जिंदगी  जीने कि तुमको ,
तभी असली मां बाप  जान नहीं पा रहे हो ,

अरे जागो अब  अंधकार की  नीदों से तुम ,
बाहर तुम्हारा शत्रु तैयार खड़ा है लड़ने को ,
गर अब भी जो  तुम ने न  जवाब दिया तो ,
मज़हब के लिए अपने वो अड़ा है मरने को ,


#PoetryOfSJT
#2022

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आंधियां हैं अंधेरा है न जुगनू कोई ,
अभी चलना है मंजिल बहुत दूर है ,

तुमसे मिलना अभी तो मुकम्मल नहीं ,
पर पता है मुझे, आज है.. कल नहीं ,
सारे लम्हों को खुल के मैं जी लूं जरा ,
नफ़रत का सारा ज़हर  मैं पी लूं जरा ,
जिन्दगी तो बसर  हो रही  है मगर ,
कुछ आदतों से  दिल ये मजबूर है ,
आंधियां हैं अंधेरा है  न जुगनू कोई ,
अभी चलना है  मंजिल  बहुत दूर है ,

#PoetryOfSJT

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बहते आंसुओं को छिपा लेते हैं ,
कोई देख न ले मुस्कुरा देते हैं ,
शिकायत नहीं रही शिकायतों से ,
चराग खुद का खुद बुझा देते हैं ,

कई जन्मों से बंदी हैं ग़म के  ,
चलो आज फिर रिहाई देते हैं ,
ज़माना को सुनना पसंद है तो ,
चलो आज फिर सफाई देते हैं ,

अभी हमसे न पूछो कहां थे ,
अफवाओं के किस्से सुनाई देते हैं ,
ये जो कुछ लोग अपना कहते हैं ,
पीठ पीछे औकात दिखा ही देते है,

#PoetryOfSJT #love

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एक पंछी का घोंसला बिखरने लगा ,
कुछ लोगों का चेहरा निरखरने लगा ,

कुछ मसीहा बनेंगे सिर्फ़ दिखावा को ,
कुछ ताक जमाए बैठे हैं बस धावा को ,

ज़िंदगी सबका हिसाब करेगी एक दिन ,
जो बोया है वही फ़सल कटेगी एक दिन ,

जो तमाशा देखकर मुस्कुरा रहे हैं आज ,
बाहर व्याकुल मन में हर्षा रहे हैं आज ,

खुशियां मानो मेरे घर का रास्ता भूल गईं ,
मुझसे क्या है वो शायद वास्ता भूल गईं ,

हर रात के बाद उम्मीदों की सुबह होती है ,
जो चलता रहता है उसी की फतह होती है ,

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हर एक रोज़ जिन्दगी तमाशा करती है ,
उम्मीदों की सुबह से बस आशा करती है ,

शाम ए चराग जलाने में निकल जाती है ,
ख्वाबों को आंखों से रात निगल जाती है ,

हासिल कुछ होता नहीं नई ख्वाहिशों से ,
महसूस हो रहा है बंध गया नई बंदिशों से ,

हवा सुकून वाली आज कल चलती नहीं ,
फिजाओं में खुशबू सुकून की मिलती नहीं ,

दरख्तों से यादों का धुआं निकले ही जा रहा ,
नफरत की आग से दिल पिघले ही जा रहा ,

ख्याल शायर का गाल गुलाबों से लगते हैं ,
तुम्हारे सारे सवालात किताबों से लगते हैं ,

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चांद को सवरने की ज़रूरत क्या है ,
दरिया को ठहरने की ज़रूरत क्या है ,
आप तो ख़ुद नूर हो इस गुलशन का ,
नूर को निखरने की ज़रूरत क्या है ,

कली को फूल बनने की ज़रूरत क्या है ,
बन के फूल बिखरने की ज़रूरत क्या है ,
कुछ फूलों की हिफाज़त कांटे करते हैं ,
बाग में माली रखने की ज़रूरत क्या है ,

प्यार को सिर्फ़ जताने की जरूरत क्या है ,
बिना रूठे को मनाने की ज़रूरत क्या है ,
ज़रूरी नही इश्क़ में जिस्म ही मुकम्मल हो ,
सिर्फ जिस्म में समाने की ज़रूरत क्या है ,

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जिन्दगी खोने में लुटाई हासिल कुछ हुआ नहीं ,
जिसे चाहा पाना,वो बिछड़कर मुझे मिला नही ,
तमाम हसरतें दम तोड़ देती हैं मेरी चौखट में ही ,
ख़ुद को हर बार समझा लेता हूं मुझे गिला नहीं ,

शिकायत खुद के नसीब से है सच पूछो तो तुम ,
नासूर ज़ख्मों में कभी मरहम मैंने लगाया नहीं ,
यूं तो जिन्दगी में हर कोई हमदर्द बनकर आया ,
जबरजस्ती किसी को भी गले मैंने लगाया नहीं,

कोशिश की बरसते पानी को सिमेटने की कल ,
भिगा के अरमानों को निकला रोक पाया नहीं ,
फिजूल आरज़ू है किसी को अपने पास रखने की ,
उसका ठिकाना मेरे दिल में क्यों ? बनपाया नहीं ,

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मुश्किलों से इस कदर दोस्ती हो गई है ,
रफ्ता रफ्ता अब जिंदगी बसर हो रही है ,

चराग उम्मीदों वाले कुछ बुझ से गए हैं ,
शायद बद्दुआ किसी की असर हो रही है ,

बस्ती के साहूकारों का मिजाज़ बदल के ,
मुफलिसी प्रति दिन तर-बतर हो रही है ,

मौत शिकायत करे भी तो किस्से करे ,
जिन्दगी ग़म को पीकर अमर हो रही है ,

मैं हो गया मुसाफिर चलते यूं ही राहों में ,
मंज़िल ख़ुद ही दूर जाके सफ़र हो रही है ,

बादल बरसा नहीं एक अरसे से चाहकर ,
पर घरौंदे के लिए बारिश कहर हो रही है ,

तोड़कर आया हूं मैं सभी बंधनों को आज ,
कम यहां सासों की लेकिन उमर हो रही है ,

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शिकायत थी मुझसे मगर कहा नहीं ,
हंसा थोड़ा फिर उदास हो चला गया ,
है तो बहुत ज़रूरी मेरी जिन्दगी में वो ,
ख़ास ही था और ख़ास हो चला गया ,

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किश्ती रेत पे चल रही है किनारा नही है ,
जहां में ख़ुद के सिवा कोई सहारा नही है ,
अक्सर मीठे लोग ज़हर का काम करते हैं ,
यूं तो यहां सब हमारा हैं पर हमारा नही है ,

कोई देखे मेरी अमानत को गवारा नही है ,
जिन्दगी में बिन जिन्दगी के गुजारा नही है ,
हैं बहुत अपने इस जहां में सिर्फ कहने को ,
हर किसी को हमने भी यहां पुकारा नही है ,

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