Singer + Writer ( instagram - poetry_of_sjt )

एक पंछी का घोंसला बिखरने लगा ,
कुछ लोगों का चेहरा निरखरने लगा ,

कुछ मसीहा बनेंगे सिर्फ़ दिखावा को ,
कुछ ताक जमाए बैठे हैं बस धावा को ,

ज़िंदगी सबका हिसाब करेगी एक दिन ,
जो बोया है वही फ़सल कटेगी एक दिन ,

जो तमाशा देखकर मुस्कुरा रहे हैं आज ,
बाहर व्याकुल मन में हर्षा रहे हैं आज ,

खुशियां मानो मेरे घर का रास्ता भूल गईं ,
मुझसे क्या है वो शायद वास्ता भूल गईं ,

हर रात के बाद उम्मीदों की सुबह होती है ,
जो चलता रहता है उसी की फतह होती है ,

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हर एक रोज़ जिन्दगी तमाशा करती है ,
उम्मीदों की सुबह से बस आशा करती है ,

शाम ए चराग जलाने में निकल जाती है ,
ख्वाबों को आंखों से रात निगल जाती है ,

हासिल कुछ होता नहीं नई ख्वाहिशों से ,
महसूस हो रहा है बंध गया नई बंदिशों से ,

हवा सुकून वाली आज कल चलती नहीं ,
फिजाओं में खुशबू सुकून की मिलती नहीं ,

दरख्तों से यादों का धुआं निकले ही जा रहा ,
नफरत की आग से दिल पिघले ही जा रहा ,

ख्याल शायर का गाल गुलाबों से लगते हैं ,
तुम्हारे सारे सवालात किताबों से लगते हैं ,

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चांद को सवरने की ज़रूरत क्या है ,
दरिया को ठहरने की ज़रूरत क्या है ,
आप तो ख़ुद नूर हो इस गुलशन का ,
नूर को निखरने की ज़रूरत क्या है ,

कली को फूल बनने की ज़रूरत क्या है ,
बन के फूल बिखरने की ज़रूरत क्या है ,
कुछ फूलों की हिफाज़त कांटे करते हैं ,
बाग में माली रखने की ज़रूरत क्या है ,

प्यार को सिर्फ़ जताने की जरूरत क्या है ,
बिना रूठे को मनाने की ज़रूरत क्या है ,
ज़रूरी नही इश्क़ में जिस्म ही मुकम्मल हो ,
सिर्फ जिस्म में समाने की ज़रूरत क्या है ,

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जिन्दगी खोने में लुटाई हासिल कुछ हुआ नहीं ,
जिसे चाहा पाना,वो बिछड़कर मुझे मिला नही ,
तमाम हसरतें दम तोड़ देती हैं मेरी चौखट में ही ,
ख़ुद को हर बार समझा लेता हूं मुझे गिला नहीं ,

शिकायत खुद के नसीब से है सच पूछो तो तुम ,
नासूर ज़ख्मों में कभी मरहम मैंने लगाया नहीं ,
यूं तो जिन्दगी में हर कोई हमदर्द बनकर आया ,
जबरजस्ती किसी को भी गले मैंने लगाया नहीं,

कोशिश की बरसते पानी को सिमेटने की कल ,
भिगा के अरमानों को निकला रोक पाया नहीं ,
फिजूल आरज़ू है किसी को अपने पास रखने की ,
उसका ठिकाना मेरे दिल में क्यों ? बनपाया नहीं ,

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मुश्किलों से इस कदर दोस्ती हो गई है ,
रफ्ता रफ्ता अब जिंदगी बसर हो रही है ,

चराग उम्मीदों वाले कुछ बुझ से गए हैं ,
शायद बद्दुआ किसी की असर हो रही है ,

बस्ती के साहूकारों का मिजाज़ बदल के ,
मुफलिसी प्रति दिन तर-बतर हो रही है ,

मौत शिकायत करे भी तो किस्से करे ,
जिन्दगी ग़म को पीकर अमर हो रही है ,

मैं हो गया मुसाफिर चलते यूं ही राहों में ,
मंज़िल ख़ुद ही दूर जाके सफ़र हो रही है ,

बादल बरसा नहीं एक अरसे से चाहकर ,
पर घरौंदे के लिए बारिश कहर हो रही है ,

तोड़कर आया हूं मैं सभी बंधनों को आज ,
कम यहां सासों की लेकिन उमर हो रही है ,

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शिकायत थी मुझसे मगर कहा नहीं ,
हंसा थोड़ा फिर उदास हो चला गया ,
है तो बहुत ज़रूरी मेरी जिन्दगी में वो ,
ख़ास ही था और ख़ास हो चला गया ,

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किश्ती रेत पे चल रही है किनारा नही है ,
जहां में ख़ुद के सिवा कोई सहारा नही है ,
अक्सर मीठे लोग ज़हर का काम करते हैं ,
यूं तो यहां सब हमारा हैं पर हमारा नही है ,

कोई देखे मेरी अमानत को गवारा नही है ,
जिन्दगी में बिन जिन्दगी के गुजारा नही है ,
हैं बहुत अपने इस जहां में सिर्फ कहने को ,
हर किसी को हमने भी यहां पुकारा नही है ,

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मेरे रंगीन किस्सों को सुन परेशान हो जाता है ,
वो शख्स इतना चाहता है उदास हो जाता है ,
ख़ुद को तैयार करता है इस ज़माने के लिए ,
चलता है मीलों उम्मीद लेके हतास हो जाता है ,

ज़माने भर से मुझे बचाने की बात करता है वो ,
मुश्किलों में कदम मिलाकर साथ चलता है वो ,
यूं तो उम्र के जजुर्बे कम हैं या कहूं तजुर्बा नहीं ,
कई दफा कठनाइयों में गिरकर संभलता है वो ,

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जिन्दगी की जरूरतें क्या कुछ नही करवाती ,
पूरा करने की चाहत में मैं बहुत थक जाता हूं ,
घर से निकला था मां के कदमों को चूम कर ,
कामयाब तो हो रहा हूं पर बहुत थक जाता हूं ,

पहली बार घर से दूर निकला हूं मंजिल पाने ,
चलता रहता हूं राह में पर बहुत थक जाता हूं ,
कई तरह के लोग मिले कुछ अच्छे तो बुरे भी ,
रुका नही रोकने से मैं पर बहुत थक जाता हूं ,

कुछ दोस्त बनाए हैं सुख दुःख बाटने के लिए ,
मुसीबत से अकेले लड़ के बहुत थक जाता हूं ,
एक सहारा बना रहता है इनके साथ रहने से ,
ख़ुद को तैयार कर रहा हूं बहुत थक जाता हूं ,

किराए का कमरा है बड़ी मुश्किल से मिला है ,
किसी का सहारा नही पर बहुत थक जाता हूं ,
नौकरी भी मिल गई है मेरी मां की दुआओं से ,
काम तो ठीक ठाक है पर बहुत थक जाता हूं ,

पेट तो भर जाता है यहां मिले इस भोजन से ,
मन में तसल्ली नही होती बहुत थक जाता हूं ,
स्वाद नहीं मिलता यहां मां के बने हाथों जैसा ,
कभी कभी खुद से बना के बहुत थक जाता हूं ,

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रास्ता बुलाता है चलने का इरादा तो कर ,
मंजिल मिल जायेगी खुद से वादा तो कर ,
मुश्किल होता है ख़ुद को साबित करना ,
विजय मिल जाएगी परिश्रम ज्यादा तो कर ,

सपने सिर्फ़ देखने से पूरे नही हुआ करते ,
कोशिश करने से वो अधूरे नही हुआ करते ,
रातों की नींद दिन का चैन खोना पड़ता है ,
कभी कभी तो भूखे पेट ही सोना पड़ता है ,

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