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वो और उसकी खामौश कभी समझ मे ना आईं !!

-sk hajee

एक आत्महत्या का केस हम सब के सामने आया । वह बेहद दुखद और हमारी-आपकी इस्तेमाई नाकामी है । ऐसे नही के हर घर में यही हालात है । हमने जब दिन ए इस्लाम से मुंह फेरा याने जो हमे अच्छा लग रहा है हम वह हम पर और समुदाय पर लागु कर रहे है । लेकिन जो हमे फिट नही बैठता, हल्के से हम उससे मुंह फेर रहे है ।

मैने कुछ नजदीकी रिश्तों के अंदर यह देखा है के लड़की शादी के बाद महिनों से अपने बाप के घर रह रही है । वजह बहोत से जगहों पर दो खानदानों के अहम का है । बस हम बड़े और वह छोटे इस निय्यतों की वजह से लड़का और ज्यादातर मामलों में लड़की बिना वजह परेशान हो जाते है । जिनमें मियां-बीबी का कुछ कुसूर नही होता है ।

बहोत से लोग आज अच्छे ख़ानदान-अखलाक वाले रिश्ते अपने से गरिब/ ज्यादा मालदार ना होने की वजह से पसंद नही करते । शायद उनकी इज्जत कम हो जाती हो ? यह इज्जत नापने वाली मशीन का इजाद तो होना चाहिए !

एक हमारे मित्र है । ज़िंदगी मे दिन भी है और पैसा भी । याने अच्छा-खासा कमा लेते है । उनका रिश्ता एक जगह तय पा गया लेकिन उन्होंने शर्त यह रखी के शादी धुम-धाम से नही होगी । और बस यही एक कारण से वह रिश्ता टुट गया । लड़की वालों ने पता नही क्या-क्या मतलब निकाल लिए इसके । ऐसा करेंगे तो समाज क्या कहेगा ? हमारी भी इज्जत है और फलां-फलां (तकब्बुर)

बस एक सोंच है जो हमे 1400 साल पहले बताई गई थी । आज हमने उसपर अमल करना छोड़ दिया । उसका सिला यह हुआ के इतना भारी मात्रा में बुराइयाँ हमारे दरमियां खुस गई है । ना इस्लाम के मुताबिक चल रहे ना सही दुनिया के मुताबिक ...

आज तलाक को हमने ऐब के रूप में ले लिया । तलाक नही होना चाहिए लेकिन हुआ तो उन्होंने लड़कीयों को सही रिश्ते नही मिलते । तलाक के मामलों में सबमें ज्यादा तकलीफें लड़कीयाँ उठाती है । बेहद कम मामले मिलेंगे जहाँ लड़को को भी परेशानी उठानी पड़ती है ।

यहाँ हर कोई एक समान सोंच रखने वाला नहीं है । आज-कल थोड़ी सी बातों को लेकर अच्छे रिश्तों का जनाजा निकल जाता है ।

अगर अच्छे अखलाक, आमाल, खानदान और दिन छोड़कर पैसे के पिछे भागा जाएगा तो दुनिया के साथ आख़िरत भी बर्बाद होने का खतरा रहता है ।

पैसा होने के बावजूद लोग दिन ना हो उस घरमें रिश्ते करना बंद कर दे तो कुछ हद तक ऐसे मामलों में कमी हो सकती है । लोग यह नही देखते के उनकी लड़की जो उसे सालों से बडे लगाव से उसे पाला-बड़ा किया है, वह उस घर में पैसा होने के बावजूद वह खुश रह सकेगी या नही ।

शायद कुछ बातें आपको पसंद भी ना आए, उसको आप नजरअंदाज कर दीजीए । बस जो अच्छा लगा और जो मालूमात थी वह आपके सामने रखने की कोशिश की है ।

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सहाब, समाज के कुछ कड़वी बातों से सामना हुआ । होश ही उड गए । हमारे महाराष्ट्र में कुछ ऐसे केसेस सामने आए, जिसको समझने कै बाद परेशानी में और इजाफा हुआ ।

कहीँ दरिंदगी(बलात्कार) की घटना सामने आए तब पुरा समाज हर सोशल मीडिया प्लैटफार्म पर चीखता रहता है और ज्यादातर दुसरे समुदाय के लोग खामौश होते है । तब लगने लगता है के पुरा समुदाय ही खतरे में है ।

लेकिन जब पीड़ित और आरोपी एक ही समुदाय से आते है तब पुरा समुदाय खामौश रहता है । शायद यह फ़िक्र तब अचानक से गायब हो जाती होगी ? शायद कोई जादु कर देता होगा ? आक्रोशीत होने वाला समाज ...

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और बरसों बाद मिलकर जब उसकी एक झलक देखी
तो लाजवाब पल थे वह ...

महसूस हुआ वह भी उतने ही बेताब है, मगर और मजबूरियाँ !!!

अब अलग दोस्तों ख़ैर कोंन जोड़ सकता है, पेचीदगियों में घुसकर और पेचीदा रास्ता क्यों बनाए ...

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लगता है बीजेपी वालों ने पहले काँग्रेस ने 60 सालों में क्या किया यह पूछकर मालूमात एकजुट की, अब बारी-बारी उन सब चीजों को बेच रहे है !!!

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किसी-किसी बात पर टिप्पणी भी किया किजीए,

समझने में आसानी होगी के क्या हाल छे !



ई-लाईकवा की जरूरत ना है ...

#बाकी_सब_बढीया_छे ?

पेट्रोल-डीजल, गैस, एजुकेशन और आम लोगों से जुड़ी हुई चीजें महंगी हो जाए लेकिन वोट तो मोदीजी को ही दिया जाएगा । अब आप को ऐसे मुद्दों को लेकर जनता में विरोध नही देखने को मिलेगा । लोगों ने इन सब मुद्दों को लेकर बीजेपी- नरेन्द्र मोदी को वोट नही दिया था । बहुसंख्यक समुदाय के अधिक लोग कट्टर-धर्मी बन चुके है । और यह हकीकत है, इसे कोई झुटला नही सकता । बहुसंख्यक समुदाय के बाकी बचे लोगों को कुछ लेना-देना नही है । उन्हें भी अंदर से एक अदभुत सुकून का लाभ मिल रहा है । बाकी अल्पसंख्यकों को ही इसकी ज्यादा पड़ी है ।

बस आज हमे पेट्रोल-डीजल दिख रहा है, और कुछ मुर्ख कह भी रहे है - हमे कुछ फर्क ही नहीं पड़ता चाहे कीमतें कितनी भी क्यों न बढ़ जाए । लेकिन आगे चलकर सबसे ज्यादा तकलीफें और रोने वाले यही लोग होंगे । सबसे ज्यादा असर/नुकसान इन्हीं लोगों का होगा ।

जिस विचार को भारत ने दशकों पिछे फेक दिया, उसे फिर से जनमानस में रूझाने का काम हो रहा है । व्यवस्था ऐसे है के, अच्छे खासे (पढ़े-लिखे) लोग भी गुमराही के जाल में फस चुके है ।

अल्पसंख्यक समुदाय के एक छोटे से समाज का भय दिखाकर बार-बार लोगों को मुर्ख बनाया जा रहा है । कहते है के - धर्म की रक्षा होगी ...

हम कहते है : "धर्म की रक्षा करने वाले पहले, अपनी सुरक्षा हटा कर घुमना-फिरना चालु कर दे" चाहे ऐसे लोग किसी भी मजहब के मानने वाले हो ! जिस भगवान् ने पृथ्वी बनाई, इन्सानो को बनाया, उन्हें अपने से जोडने के लिए #धर्म का रास्ता दिया अब यही गिने-चुने लोग उस धर्म को बचाने निकले है ।

अगर धर्म किसी के साज़िशों से खत्म हो सकता है ? अगर हो सकता है तो भगवान्, ईश्वर, खुदा भी यही चाहता होगा ? अब उसके सामने किस की चलती है ? वह जैसा चाहे वैसा ही होगा, यही अंतिम सत्य छे ।

22 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता से जो लोग डर रहे है, दंगे मे मदत करने वाले वकील से, दिल्ली में जमा हुए शाहीन बाग के लोंगो से और उसी दिल्ली में जमा हुए उनके हिसाब से मुट्ठी भर किसानों से जो लोग डर रहे है, अब ऐसे डरपोक लोग हमारे महान मज़हब की रक्षा कर सकेंगे ?

मै नकारात्मक बाते नही कर रहा, ना ही डराना मकसद है । बस मकसद यह है हम खुद के साथ ही अपनी नस्लों को बरबादी की राह पर ढकेल रहे है । हमे मालुम है के ऐसे "अंधेरे के बाद उजाला-सवेरा होगा" लेकिन ऐसा ही चलता रहा तो हम लोग तो वह सवेरा देख नही पाएंगे ।

कल को शिक्षा नही मिलेगी । महिलाओं की आजादी नही बेचेगी । कुछ करने-बोलने-सुनने-चलने-फिरने की आजादी खत्म हो जाएगी । इन्सान के शक्ल में सब रोबोट मै शुमार होंगे । और कुछ गिने-चुने लोग सब पर राज करेंगे ।



- यसके हाजी

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