Hey, I am on Matrubharti!

मन ही मन मैं,
तेरा नाप लेकर,
बनाती रही
तेरे तन के कपड़े   
नहीं ये छोटा होगा,
नहीं ये होगा बड़ा,
करती खुद से
जाने कितने झगड़े
तन के कपड़े …!  
….
तू गोरी होगी?
या सांवरी?? मैं भी बावरी बन
सजाती रही गुडि़या पे
तेरे वो कपड़े
तन के कपड़े …!!   

झलक तेरी
आंखों में लेकर सोती तो,
ख्‍वाबों में फिरती
तुझको पकड़े-पकड़े
तन के कपड़े …!!!
...
मैं अपना बचपन
फिर से जी लूंगी
तू आ जाएगी तो,
मिट जाएंगे
मन के ये सारे झगड़े
तन के कपड़े …!!!!

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मन की नदी में
तर्पण किया है पापा भावनाओं से,
भीगा सा मन लिए ...
इस पितृपक्ष
फिर बैठी हूँ आकर, भोर से ही
छत पर, जहाँ कौए के
कांव - कांव करते शब्द
और सूरज की बढ़ती लालिमा
के मध्य, निर्मल स्नेह भर अंजुरी में
कर रही हूँ अर्पित,
नेह की कुछ बूंदें गंगाजल के संग
आशीष की अभिलाषा लिए!!!
…..
© सीमा 'सदा'
#पितृपक्ष_पापा

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शिक्षा से नाता
गुरू भाग्य विधाता
माँ देती सीख।

- सीमा 'सदा'
©

जब भी ये वक़्त
इम्तिहान लेता है न
तो पहरे पे
मुश्किलों को लगा देता है !!
©

ज़िंदगी को सवांरती रही,
#बेख़बर हर अंजाम से
रब जो करेगा,
वो अच्छा ही करेगा!!

©- सदा

जब भी ये वक़्त
इम्तिहान लेता है न,
तो पहरे पे
#मुश्किलों को
लगा देता है !!
...
©सीमा 'सदा'

कर कमल
पग धरो दिव्यता
आलोकित हुई धरा,
कण-कण है शोभित
आगमन से आपके
मन मुग्ध हुआ
जो अधीर था !
….
कामना शुभता की
ह्रदय में संजोये
अभिनन्दन है
आदिशक्ति का
कर कमल 
पग धरो दिव्यता !!
© सीमा 'सदा'

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हँसती थी जब भी जिंदगी
#खुशियों  के मेले में
फ़िक्र, परेशानी, और
उदासियों के
गुब्बारे उड़ा कर
तालियाँ बजाकर
कोई मन बच्चा हो जाना चाहता था !
....

- सीमा 'सदा'

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खेलता मन,
#संचित यादों संग
प्रफुल्लित हो !
....
सीमा 'सदा'