Best Social Stories stories in hindi read and download free PDF

मुखौटा ही मुखौटा - 2
by Henna pathan
  • 141

 अब तक आपने पढ़ा देव जो की आज के जमाने का लड़का है और वह सोशल मीडिया का आदि है और जिंदगी में बस गेम और सोशल मीडिया ही ...

स्थानीय बोली का विकास
by Anand M Mishra
  • 72

बाजारवाद ने स्थानीय भाषा को करीब-करीब समाप्त कर दिया है। एक बालक जन्म के बाद अपनी माँ से भाषा सीखता था। घर के वातवरण तथा आसपास के वातावरण से ...

ब्रेड-बटर...
by Saroj Verma
  • 258

रामनगर में एक किसान रहता था,जिसका नाम रामसजीवन था,उसकी मेहरारू बिंदिया और वो दिनभर खेतों में कड़ी मेहनत करते थे,तब जा के दो वक़्त के खाने का जुगाड़ हो ...

संयोग--मुराद मन की - 2
by किशनलाल शर्मा
  • 105

उस दिन के बाद अनुराग को रोज तीनो लडकिया नज़र आने लगी।वे तीनों लडकिया कहां जाती है?इस बात का पता करने के लिए एक दिन उसने उनका पीछा किया।तब ...

नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 2
by राज बोहरे
  • 126

राजेन्द्र लहरिया- नाट्यपुरुष 2   --- मंगलिया ने आगे कुछ नहीं पूछा। एक गहरी सांस ली और बाहर को निकल गया। लेकिन श्यामा को ऐसा लगा जैसे किसी ने ...

इन्तजार एक हद तक - 10 - (महामारी)
by RACHNA ROY
  • 459

रमेश बोला देखो हमें बहुत ही जरूरी है वो आशा से मिलना।अमित बोला अरे मामाजी आप।मामा जी बोले अच्छा एक बार मुझे डिन से मिलना है।फिर कुछ देर बाद ...

मुझे बचाओ !! - 1
by Brijmohan sharma
  • 330

(लड़कियों से) (मीटू पुरुष) ब्रजमोहन शर्मा (1) ( एक खूबसूरत शर्मीले अध्यापक को उसके स्टाफ व छात्राओं द्वारा परेशान किए जाने की मनोरंजक दास्तान ) १ उसके अनुसार सारे ...

नकली गहनें
by SHAMIM MERCHANT
  • 546

"चाचाजी, नेहा के लिए, शादी के गहने मेरी तरफ से।""लेकिन बेटा, ये तो बहुत ज़्यादा है। तुम इतना बोझ अपने सिर पर मत लो, मैं कुछ न कुछ बन्दोबस्त ...

नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 1
by राज बोहरे
  • 186

राजेन्द्र लहरिया–नाट्यपुरुष 1   आख्यान    बूढ़ा क्यू में था! क्यू 'महामहिमावान’ के सार्वजनिक अभिनंदन करने के लिए लगी हुई थी, जिसमें स्त्री-पुरुष नौजवानों-जवानों से लेकर बूढ़ों तक की ...

इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 4 - अंतिम भाग
by राज बोहरे
  • 330

महेश कटारे - इस सुबह को नाम क्या दूँ 4         फट-फट फटक, फटक फट फट की दनदनाती आवाज़ के साथ प्रवेश द्वार पर वजनी एन्फील्ड़ मोटर-साईकिल चमकी ...

इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 3
by राज बोहरे
  • 504

महेश कटारे - इस सुबह को नाम क्या दूँ 3           बाबू के जाने के बाद रेडियो खोलकर शर्मा जाने क्या-क्या सोचते रहे। दूध पीकर सोने की ...

कुछ अल्फाज खामोश क्यों?? - क्या मैं लड़की हूं ?
by Bushra Hashmi
  • 558

वह केवल एक राज़ था जिसे मैं जानना चाहती थी मेरे अंदर जो छिपा था । मैं खुद अपने अंदर के बदलाव से दंग थी ना जाने कैसी असमंजस ...

जिंदगी और जंग
by Anand Tripathi
  • 519

जिंदगी और जंग की कहानी बड़ी विचित्र है। जीवन की धुरी पर एक साथ वर्षो तक घूर्णन करना कोई खेल नहीं है। बस एक अनुमान ही है जिसके सहारे ...

इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 2
by राज बोहरे
  • 390

महेश कटारे -इस सुबह को नाम क्या दूँ 2         रामरज मिसमिसाकर फूट पड़ना चाहते थे। पर जानतेथे कि इससे स्थिति तो बदलेगी नही, उल्टे उन्हीं की हानि ...

सर्कस - 3 - अंतिम भाग
by Keval Makvana
  • 465

                         हार्दिक ने उर्मी को मार डाला था। सभी कलाकार हैरान थे कि जिस जोड़े की शादी को एक महीने से भी कम ...

इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 1
by राज बोहरे
  • 648

महेश कटारे - इस सुबह को नाम क्या दूँ 1         रामरज शर्मा अभी अपना स्कूटर ठीक तरह से स्टैंड पर टिका भी नहीं पाए थे कि उनकी ...

सर्कस - 2
by Keval Makvana
  • 504

(उर्मी हार्दिक के पास जा कर बोली) उर्मी : हार्दिक! तुम समझ रहे हो ऐसा कुछ भी नहीं है। (हार्दिक हंसने लगा) हार्दिक : मैं जानता हूं कि ऐसी ...

मिडल क्लास - 1
by Jigar Joshi
  • 489

अपने भारत में करीब 50% मिडल क्लास के लोग रहते हे llहर  समय के चलते इसमें संख्या हर साल बधता चला।   ये। वो?  हे  जो सपने तो इनके भी ...

यहाँ कुछ लोग थे - राजेन्द्र लहरिया - 4 - अंतिम भाग
by राज बोहरे
  • 411

राजेन्द्र लहरिया कहानी यहाँ कुछ लोग थे 4                  और साहब, बाकी रहे लोगों का तनाव उनके चेहरों से ऐसे उड़ गया जैसे ठंडी हवा लगने से पसीना ...

काश
by Ana AT
  • 792

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बूढ़ा मरता क्यों नही ?
by Neelima Sharrma Nivia
  • 402

बूढ़ा मरता क्यों नी !!!रिश्ते  कितने मुश्किल होते हैं आजकल . एक जमाना था सबसे आसान  रिश्ता था  माँ- बाप का बच्चो से  और बच्चो का माँ- बाप से  ...

गृहकार्य और मिमामोरू पद्धति
by Anand M Mishra
  • 309

  कोरोना के कारण देशबंदी में शिक्षकों को पढ़ाने का ‘जुनून’ होता है तथा साथ ही वे अपने छात्रों से ‘लगन’ के साथ ‘कठोर परिश्रम’ चाहते हैं। ये बच्चों ...

सर्कस - 1
by Keval Makvana
  • 531

              रॉयल सर्कस शहर का प्रसिद्ध सर्कस था। वहा शो सप्ताह में तीन दिन होता था, इसलिए टिकट खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। इस सर्कस के फेमस ...

स्वीकृति - 6
by GAYATRI THAKUR
  • 1.5k

    विनीता अपनी मौसेरी बहन मीनाक्षी के आने से बेहद खुश थी ,उसके आने से मानो  उसके अकेलेपन का दुख जैसे  कम हो  गया हो ..और  साथ ही  ...

आधार
by राज कुमार कांदु
  • 702

रज्जो का पति कल्लू शहर में दिहाड़ी मजदूरी का काम करता था । बहुत दिन हुए उसने शहर से कुछ नहीं भेजा था । जब पिछली बार फोन किया ...

सपनों की कीमत
by Rama Sharma Manavi
  • 609

   हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है,सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने पर हम अक्सर अकेले रह जाते हैं, इसे सफलता का अभिशाप भी कह सकते हैं या मूल्य,यह ...

दायरों के पार - 10
by नादान लेखिका
  • 1.2k

मैंने विशु को बहुत समझाया, बहुत बार माफी मांगी उससे, उसके सामने गिड़गिड़ाई भी मगर उसने जैसे कसम खा ली थी कुछ भी ना सुनने की। वो गुस्से में ...

रिश्तों में फूफा-मौसा-जीजाजी की भूमिका
by Anand M Mishra
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भारत में रिश्ते चुनने की परम्परा रही है। प्राचीन काल में बहुत ही कम को स्वेच्छा से रिश्ते चुनने की छूट मिली थी। उदाहरण के लिए हम सावित्री, माता ...

यहाँ कुछ लोग थे - राजेन्द्र लहरिया - 3
by राज बोहरे
  • 408

राजेन्द्र लहरिया कहानी यहाँ कुछ लोग थे  3                  और साहब, बाबा के निर्देशानुसार कार्य शुरू हो गया। लोगों ने गाँव में चंदा इक्ट्ठा करना शुरू कर दिया। ...

शैतानियाँ
by Brijmohan sharma
  • 372

( कॉलेज के छात्रों की शैतानियाँ )  भूमिका  प्रस्तुत कहानी एक सत्यकथा पर आधारित है कि किस प्रकार एक बहादुर मिलिट्री रिटायर्ड प्रिंसिपल गुंडागर्दी से त्रस्त बदनाम कॉलेज को ...