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बचपन

इन भीड़ भरे शहरों में क्यों जीवन सूना - सा लगता है
जानें किस आस की चाहत में ये रातों को भी जगता है
जीवन की आपाधापी में उन गांवों को हम छोड़ आए
जिस माटी में बचपन बीता उनसे रिश्ते क्यूं तोड़ आए
बचपन के दिन जब याद आयें नज़रें खोजें उस सूरत को
ममता और स्नेह थीं बरसाती आँखें ढूँढें उस मूरत को
लंबी पगडंडी याद आयें जिनमें दौड़ा अपना बचपन

वो साथी - संगी याद आयें जो हर्षाते थे सबका मन

वो दादी अम्मा याद आए जिनके अमरूद चुराते थे

वो स्वाद दुबारा मिल न सका जो अमृत सा भाते थे

शहरों की भीड़ - भरी दरिया में जब भी मन अकुलाता है

करके बचपन को याद अपना मन भी बच्चा बन जाता है

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आप सभी को विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं
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जय श्री राम

आदर्श राम का देखकर , हम भी लें कुछ सीख
राम के जैसा जगत में , दूजा कोई न दीख

मर्यादा के शिखर पर , सदा विराजे राम
सभी काज सध जात हैं , लेकर राम का नाम

कितने रूप हैं राम के , सुंदर सरल सुजान
उनको जैसा जो भजे , फल पाए भजे समान

बड़ी - बड़ाई राम की , गावत सकल जहान
राम - नाम एक मंत्र है , कहे सन्त का ज्ञान

सच्ची पूजा राम की , हम जिएं राम आदर्श
राम - राज हो जगत में , सबका हो उत्कर्ष

मातृ - भूमि से प्रीति हो , परहित के हो कर्म
मात - पिता गर्वित रहें , हो यही हमारा धर्म


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-- सुधाकर मिश्र "सरस"

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हिंदी

गर्भ नाल सी जुड़ी है हमसे,भारत का संस्कार है हिंदी

हर पीढ़ी के अकथ द्वंद के,भावों का आधार है हिंदी

मां सी ममता रही लुटाती,मां का दूजा रूप है हिंदी

जीवन की गति मंद पड़े तो,सुबह की मीठी धूप है हिंदी

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम,सबका मेल कराती हिंदी

भारत मां की कीर्ति पताका,जग में है फहराती हिंदी

पावन तुलसी की माला सी,सबको साथ मिलाती हिंदी

दूजी बहनों सी भाषा को,अपने गले लगाती हिंदी

कर्तव्य हैं भूलें अपना हम सब,भूल किए जाते हैं सरासर
कृतघ्न बन व्यवहार हैं करते,ज्यों घर की मुर्गी दाल बराबर

बोल - चाल पठन - पाठन में,भूल चले निज उन्नत भाषा

पश्चिम के अंधी भक्ति में,मन को देते झूंठी दिलासा

देखकर आंखें खुली हमारी,हिंदी को अपनाते जग में

देशभक्ति का ज्वार है उमड़ा, हर भारतीय के रग - रग में

भारत मां की शान है बिंदी,भारत मां की आन है हिंदी

होगा हिंदी का उत्थान,तभी बढ़ेगा हिंदुस्तान


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राखी आई रे

खुशियों की है छाई बहार कि आज है राखी आई रे
ये दिन है हम बहनों का यह सोच बहन मुस्काई रे
राखी से सजाना है हमको अपने भैया की कलाई रे
बांध के राखी नखरे कर मैं लूंगी अच्छी बंधवाई रे
इठलाऊंगी सखियों के संग अब कोई नहीं पराई रे
यह शुभ दिन सारी बहनों को सदा रहे फलदाई रे
मां - बाप का आंगन महके सदा दुख की रहे विदाई रे
हर बहन कहे अपने रब से आबाद रहे हर भाई रे
रिश्तों की डोर रहे जगमग हर तरफ खुशी हो छाई रे
सारे संबंध रहें जीवित हर दिल में उठे अंगड़ाई रे

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परवाने

देश की आन बचाने को, ना जाने कितने समर हुए
नमन है उन परवानों को,जो देश की खातिर अमर हुए
वो भी आंखों के तारे थे, मां - बाप के राजदुलारे थे
अपने बच्चों की दुनिया थे, जो उनको जान से प्यारे थे
आबाद थी राखी बहनों की, भाई की कलाई में सजकर
मां - बाप की सांसे आश्रित थी, बेटे की सांसों से बंधकर
भारत मां की पुकार सुनकर, सारे कर्तव्य लगे बौने
पहुंचा रण में कर सिंहनाद, भागे सियार संग में छौने
मातृभूमि की सेवा में, क्षण भर में सब कुछ त्याग दिया
मां तेरा वैभव अमर रहे , यह निश्चित करके प्रयाण किया
हम कृतज्ञ होकर नमन करें, आंसू के फूल चढ़ाए सब
उनके पदचिन्हों पर चलकर, देश का मान बढ़ाएं अब

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सावन

बरसे फुहार जब सावन की , मन सुमन सदृश खिल जाता है
नव - गीत जन्म लेते मन में , तन - मन शीतल हो जाता है
मधुर - मुस्कान सजे मुख पर , मन गीत खुशी के गाता है
प्रतिपल ही प्रतीक्षा रत रहता , जैसे अपना कोई आता है
हर जीव प्रफुल्लित सावन में , यह देख हृदय को भाता है
ज्यों बादल देख के हर किसान , मन ही मन में हर्षाता है
जीवन की तपिश मिट जाती है , मन सुकून से भर जाता है
बस प्यार ही प्यार जगे मन में , मन खुद से ही शर्माता है
ऐसे में किसी की आहट से , मन झंकृत हो कुछ गाता है।
मन व्याकुल सा हो जाता है , मिलने की आस जगाता है
जीवन संगीत बजे हरदम , हर सांस से उसका नाता है
सावन तो जीवनदायी है , बिन सावन जग सूना रह जाता है

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अनकही

न जाने क्या हुआ मुझको , गिला - शिकवा नहीं कोई
ये दुनिया कितनी सुंदर है , कि मैं रहती हूं कुछ खोई
मुझे लगते हैं सब प्यारे , क्यूं सब लगने लगे न्यारे
ज़माना तू बता मुझको , किया क्या तुमने कुछ इशारे
अकेले में है मन गाता , बदन सिहरन से भर जाता
जाने क्या सोच कर हंसती , सोचकर भी न याद आता
निकल घर से चलूं जब मैं , कदम बहके न जाने क्यों
खुशी इतनी छलकती है , कि सपने सच हुये हैं ज्यों
कोई समझाए तो मुझको , हुआ कोई रोग तो ये नहीं
कोई इसकी दवा भी है , या एक आफ़त है अनकही

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वर्षा की बूंद


प्रथम दिवस वर्षा की बूंदे , रज का आलिंगन करतीं जब
मिट्टी की सोंधी खुशबू से , मन प्रेम से भर जाता है तब
नवजीवन पाते त्रीण , तरुवर , सरितायें और सरोवर भी
धरती का रूप निखरता है , हरियाली संग सजकर ही
भंवरों की गुनगुन सुनकर के , उपवन के सुमन मुस्काते हैं
देकर मौन निमंत्रण उनको , मस्ती में लहराते हैं
मन हरती वन की सुन्दरता , अद्भुत वनचरों की लीला है
आबाद रहे इनकी दुनिया , जंगल इनसे ही सजीला है
वन , उपवन , नदिया , पर्वत , हैं धरती के श्रृंगार सभी
नई नवेली दुल्हन सी , ना उजड़े इसकी मांग कभी
इसकी सुन्दरता बनी रहे , ना इसका कोई शानी हो
इसके दम पर ही जीवन है , ना अपनी ख़तम कहानी हो

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तूफान उठना चाहिए

यदि व्यवस्था सुप्त हो , चल रही चालें गुप्त हों, सब अपने स्वार्थ में लिप्त हों , जयचंद जैसे यदि तृप्त हों
तब
भगत सिंह सा बनकर एक तूफान उठना चाहिए
यदि भस्मासुर सी बुद्धि हो, विचारों में भी अशुद्धि हो
बात - बात में क्रुद्ध हो , कूप - मंडूक सी निर्बुद्धि हो
तब विवेकानंद सा बनकर एक तूफान उठना चाहिये
यदि साहित्य धार विहीन हो , मातृ- शक्ति गमगीन हो
जन आत्मशक्ति में हीन हो , या रंगरलियों में लीन हो
तब दिनकर सी लेखनी बनकर एक तूफान उठना चाहिए
जब खुद के दुश्मन हम बने , भाई - भाई बनकर ठने
यदि हर बात पर भौंहें तने , सब रहे बनकर अनमनें
तब सुभाष बोस सा बनकर एक तूफान उठना चाहिए

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मां

मुझे जिसने रचा उस पर लिखना , अपनी इतनी औकात नहीं
अर्पित करते श्रद्धांजलि हम , और बची कोई बात नहीं
कुछ शेष नहीं जब करूं याद , अपने मन में तुमको ऐ मां
मेरी याद का आदि और अंत तुम्हीं , तुमने ही रचा मेरा संसार ऐ मां
दुनिया की नज़र में बड़ा हूं मैं , पर तेरे लिए बच्चा ही था
जो प्यार लुटाया तुमने सदा , वो सब का सब सच्चा ही था
तुम याद सदा ही आती हो , कब भूला वो पल याद नहीं
जी भर के रो सकता भी नहीं , ये दर्द अभी तक गया नहीं
अपने बच्चों सा दुलार करे , वो नजर नहीं दिखती अब मां
वो कान पकड़ प्यारी झिड़की , अब भी याद आती है मां
दुनिया से दर्द छुपा अपना , गिला न कोई तुमने किया
दुआ , स्नेह और प्यार दिया , मेरी सारी बालाएं तुमने लिया
मुझे कोई भी जब दर्द हुआ , मुझसे ज्यादा थी तुम रोई
ऐसी ही तो मां होती है , मां का दर्द न समझे है कोई
दुनिया की आपाधापी में , ये देखके मन अकुलाता है
राह तके घर में माता , लोग भगवान के दर क्यों जाता है
अपना अनुभव कहता है ये , जीवन को सफल यदि करना है
मां की आंखें न गीली हों , पुण्य का घड़ा यदि भरना है
कुछ कही अनकही बातें थी , तो सोचा मां से बात करूं
दुनिया में नहीं हो तो क्या ग़म , दिल में तो सदा रहती हो मां

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