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भारत माता

बलिदान जहां परिभाषित हो
कर्तव्य जहां अनुशासित हो
जहां कण - कण में भगवान है
उस पावन धरती की हम संतान हैं
जिस धरा की माटी चंदन है
उसे कोटि - कोटिशः वंदन है
धर्म धरा है सच्चाई का वितान है
उस पावन धरती की हम संतान हैं
जहां अखिल विश्व परिवार है
ना ही जीत ना किसी की हार है
गीत अलग पर एक सभी की तान है
उस पावन धरती की हम संतान हैं
जहां धरा को मां कहते हैं
आन में इसके सब सहते हैं
जिस पर मिट जाने में अपनी शान है
उस पावन धरती की हम संतान हैं


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न भटकें हम कभी कर्तव्य पथ से , अपने जीवन में
करें पुरुषार्थ जीवन में , न कोई दुविधा हो मन में
नहीं बदलेगा अपना भाग्य , बैठे हुए आंगन में
जगना और जगाना होगा , राष्ट्र - प्रेम जन - जन में
समर्पित स्वयं होना है , है जब तक प्राण इस तन में
मिटना है इसी माटी में , जहां है ईश कण - कण में
न हो कोई बड़ा छोटा , रहे ना कोई उलझन में
परेशां हो न कोई भी , मिलकर रहें इस जतन में
बढ़े उत्कर्ष हम सबका , गांठ में बांध लें यह मंत्र
नहीं कोई रोक सकता राह , बढ़ता रहे यह गणतंत्र

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#RepublicDay

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तेरी इजाज़त

तेरे पहलू में मुझे आने की तेरी इजाज़त न सही।

अपने दिल से कर दो रुखसत ये हो नहीं सकता।।

लाख फेरो यूँ नज़र मुझको जलाने की खातिर।

पलट - पलट के न देख तू ये हो नहीं सकता।।

मैं वाकिफ हूं तेरी हर एक उन कमजोरियों से।

तुम उनसे तोड़ चुकी हो रिश्ते ये हो नहीं सकता।।

मुझको मालूम है तेरे दिल को बिछड़ने का है डर।

जिस्म से जान हो जाए अलग ये हो नहीं सकता।।

हम तुम एक हैं जनम से है ज़माने को खबर।

तेरी इजाज़त न हो ज़माने को ये हो नहीं सकता।।


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बूढ़ी रज़ाई

मौसम में ठिठुरन बढ़ते ही
तुरत कह उठी बूढ़ी रज़ाई
स्वेटर,जर्सी,शाल, गुलूबंद
उठो सभी है ठंडी आयी

पूर्ण हुये आराम के दिन अब
लगो काम पर तुम सब अपने
ठंड लगे ना छोटे बड़ों को
सब नींद में देखें मीठे सपने

खुशी अधूरी रहेगी तब तक
जा न सकी जिनके घर अब तक
उस घर भी मैं पहुंच बनाऊँ
उनके संग मैं भी इठलाऊं

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बचपन

इन भीड़ भरे शहरों में क्यों जीवन सूना - सा लगता है
जानें किस आस की चाहत में ये रातों को भी जगता है
जीवन की आपाधापी में उन गांवों को हम छोड़ आए
जिस माटी में बचपन बीता उनसे रिश्ते क्यूं तोड़ आए
बचपन के दिन जब याद आयें नज़रें खोजें उस सूरत को
ममता और स्नेह थीं बरसाती आँखें ढूँढें उस मूरत को
लंबी पगडंडी याद आयें जिनमें दौड़ा अपना बचपन

वो साथी - संगी याद आयें जो हर्षाते थे सबका मन

वो दादी अम्मा याद आए जिनके अमरूद चुराते थे

वो स्वाद दुबारा मिल न सका जो अमृत सा भाते थे

शहरों की भीड़ - भरी दरिया में जब भी मन अकुलाता है

करके बचपन को याद अपना मन भी बच्चा बन जाता है

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आप सभी को विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं
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जय श्री राम

आदर्श राम का देखकर , हम भी लें कुछ सीख
राम के जैसा जगत में , दूजा कोई न दीख

मर्यादा के शिखर पर , सदा विराजे राम
सभी काज सध जात हैं , लेकर राम का नाम

कितने रूप हैं राम के , सुंदर सरल सुजान
उनको जैसा जो भजे , फल पाए भजे समान

बड़ी - बड़ाई राम की , गावत सकल जहान
राम - नाम एक मंत्र है , कहे सन्त का ज्ञान

सच्ची पूजा राम की , हम जिएं राम आदर्श
राम - राज हो जगत में , सबका हो उत्कर्ष

मातृ - भूमि से प्रीति हो , परहित के हो कर्म
मात - पिता गर्वित रहें , हो यही हमारा धर्म


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-- सुधाकर मिश्र "सरस"

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हिंदी

गर्भ नाल सी जुड़ी है हमसे,भारत का संस्कार है हिंदी

हर पीढ़ी के अकथ द्वंद के,भावों का आधार है हिंदी

मां सी ममता रही लुटाती,मां का दूजा रूप है हिंदी

जीवन की गति मंद पड़े तो,सुबह की मीठी धूप है हिंदी

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम,सबका मेल कराती हिंदी

भारत मां की कीर्ति पताका,जग में है फहराती हिंदी

पावन तुलसी की माला सी,सबको साथ मिलाती हिंदी

दूजी बहनों सी भाषा को,अपने गले लगाती हिंदी

कर्तव्य हैं भूलें अपना हम सब,भूल किए जाते हैं सरासर
कृतघ्न बन व्यवहार हैं करते,ज्यों घर की मुर्गी दाल बराबर

बोल - चाल पठन - पाठन में,भूल चले निज उन्नत भाषा

पश्चिम के अंधी भक्ति में,मन को देते झूंठी दिलासा

देखकर आंखें खुली हमारी,हिंदी को अपनाते जग में

देशभक्ति का ज्वार है उमड़ा, हर भारतीय के रग - रग में

भारत मां की शान है बिंदी,भारत मां की आन है हिंदी

होगा हिंदी का उत्थान,तभी बढ़ेगा हिंदुस्तान


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राखी आई रे

खुशियों की है छाई बहार कि आज है राखी आई रे
ये दिन है हम बहनों का यह सोच बहन मुस्काई रे
राखी से सजाना है हमको अपने भैया की कलाई रे
बांध के राखी नखरे कर मैं लूंगी अच्छी बंधवाई रे
इठलाऊंगी सखियों के संग अब कोई नहीं पराई रे
यह शुभ दिन सारी बहनों को सदा रहे फलदाई रे
मां - बाप का आंगन महके सदा दुख की रहे विदाई रे
हर बहन कहे अपने रब से आबाद रहे हर भाई रे
रिश्तों की डोर रहे जगमग हर तरफ खुशी हो छाई रे
सारे संबंध रहें जीवित हर दिल में उठे अंगड़ाई रे

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परवाने

देश की आन बचाने को, ना जाने कितने समर हुए
नमन है उन परवानों को,जो देश की खातिर अमर हुए
वो भी आंखों के तारे थे, मां - बाप के राजदुलारे थे
अपने बच्चों की दुनिया थे, जो उनको जान से प्यारे थे
आबाद थी राखी बहनों की, भाई की कलाई में सजकर
मां - बाप की सांसे आश्रित थी, बेटे की सांसों से बंधकर
भारत मां की पुकार सुनकर, सारे कर्तव्य लगे बौने
पहुंचा रण में कर सिंहनाद, भागे सियार संग में छौने
मातृभूमि की सेवा में, क्षण भर में सब कुछ त्याग दिया
मां तेरा वैभव अमर रहे , यह निश्चित करके प्रयाण किया
हम कृतज्ञ होकर नमन करें, आंसू के फूल चढ़ाए सब
उनके पदचिन्हों पर चलकर, देश का मान बढ़ाएं अब

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सावन

बरसे फुहार जब सावन की , मन सुमन सदृश खिल जाता है
नव - गीत जन्म लेते मन में , तन - मन शीतल हो जाता है
मधुर - मुस्कान सजे मुख पर , मन गीत खुशी के गाता है
प्रतिपल ही प्रतीक्षा रत रहता , जैसे अपना कोई आता है
हर जीव प्रफुल्लित सावन में , यह देख हृदय को भाता है
ज्यों बादल देख के हर किसान , मन ही मन में हर्षाता है
जीवन की तपिश मिट जाती है , मन सुकून से भर जाता है
बस प्यार ही प्यार जगे मन में , मन खुद से ही शर्माता है
ऐसे में किसी की आहट से , मन झंकृत हो कुछ गाता है।
मन व्याकुल सा हो जाता है , मिलने की आस जगाता है
जीवन संगीत बजे हरदम , हर सांस से उसका नाता है
सावन तो जीवनदायी है , बिन सावन जग सूना रह जाता है

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