कहानियों और कविताओं की दुनिया से

मुझे पता है
तुम जानते हो
मेरी खुशियों की चाभी का पता
मेरी उदासी का कारण
मेरी नाराजगी
बस तुम समझते नहीं हो

©सुषमा तिवारी

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ये इश्क है जनाब

वाक़िफ़ तो थे हम अपनी पीठ पर खंजरों के वार से
क्या करें हौंसला बढ़ाते ही रहे, इश्क जो था उनसे

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आज आदर करते है उनका जो बिना जान की परवाह किए निकल पड़े है अघोषित, अनिश्चित युद्ध क्षेत्र में.. हमारे डॉक्टर, पुलिस और सभी सेवा कर्मचारियों का दिल से आदर और आभार
#आदर

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एक लघु कथा "बाबुजी आप सही कहते हैं" मेरी ही आवाज़ में

©सुषमा तिवारी

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मन्नतों के धागे

कई जिंदगियों से गुजरी हूं मैं
हाँ उनमे से कुछ मेरे अपने भी हैं,
और मैं वो नहीं हूं जो मैं थी
मेरे मैं रह जाने के कुछ सपने भी हैं
अपने होने के सिद्धांत से लड़ती रही
ताकि मैं संघर्ष करती रहूं भटकूं नही
पलट कर हर बार पीछे देखती हूँ मैं
हाँ हर बार देखने के लिए मजबूर हूँ मैं
ताकि पहले एक बार ताकत जुटा सकूं
फिर आगे की ओर यात्रा पर बढ़ती हूं मैं
मील के पत्थर कम हो गए आगे
क्षितिज की ओर नई राह दिख रही है
सच्चे स्नेह से बांधे मन्नतों के धागे
मेहनत अब मेरी किस्मत लिख रही है
मेरे सच्चे स्नेह से बहुत कुछ तार जुड़े
हाँ अब भी कुछ धागे बिखरे हुए है
आगे बढ़ कर पलट कर जब हम मुड़े
देख नुकसान हृदय के टुकड़े हुए है
विकास की इस बढ़ती उन्मत्त हवा में
अनचाहे कुछेक बंधन टूट गए है
कड़वा कर देता हर खुशी की मिठास
प्यारे से कुछेक दोस्त भी छूट गए है
फिर भी मैं मुड़ती हूं, हाँ मैं मुड़ती हूं
अपनी कोशिशों से कुछ हद तक,
साथ जाने के लिए हाथ बढ़ाती हुई
पता नहीं भले रुकना पड़े कब तक
पर भरोसा है मुझे स्नेह से बंधे
मेरी मन्नतों के धागों, हर एक डोर पर
बाधाओं के उस पार लक्ष्य जब सधे
मेरे अपने, दोस्त भी मिले उस छोर पर
हर अंधेरी रात में एक संदेश भी मिलता है
जो समझ सकूं हर बात इतनी सक्षम नहीं
समझा है बस इतना की अपने में परिवर्तन करो,
अपनों में नहीं!

-सुषमा तिवारी

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आसमानों को छूने की आशा

रानी के हाथ के बने परांठे मोहल्ले में चर्चित थे तो भला नरेंद्र कैसे ना दीवाना होता। ये अलग बात है कि परांठे पेट के रास्ते दिल में जा बसे थे। त्यौहारों के समय तो जैसे लॉटरी लग जाती थी सबकी। फिर एक दिन वो मनहूस सी बीमारी आई, जाने क्या हुआ पर रानी का एक पैर सूखने लगा जैसे कोई हरी लकड़ी सूखती हो। किसी को कुछ पता ना चला क्या हुआ पर हाँ रानी अब दोनों पैरों पर बराबर चल ना पाती थी। पूरे मुहल्ले का स्वाद कसैला हो चुका था। खुसर फुसर होती की अब इसकी शादी कैसे होगी? नरेंद्र ने हिम्मत करके अपने बचपन के प्यार का इजहार किया पर समय ही ऐसा था कि रानी को उसका प्यार मात्र सहानुभूति ही लग रही थी। जहां रानी का परिवार और पूरा मोहल्ला खुश था वहीं नरेंद्र का परिवार नाराज था अपने लड़के के फैसले थे। पर क्या करते? लड़का अपने पैरों पर खड़ा था और रानी को ब्याह कर दूसरे शहर ले गया। रानी को नरेंद्र कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने देता पर शायद दिल ही दिल में रानी को कसक रहती जैसे वो नरेंद्र पर बोझ है। रानी खाना बनाने के साथ हर काम में सुघड़ थी पर घर से बाहर कम ही जाती। उसे लगता कि इतने बड़े शहर में उसकी कमी का कद उससे ऊंचा ही दिखेगा। नरेंद्र भी जिद नहीं करता था। एक दिन नरेंद्र के ऑफिस जाने के बाद रानी की तबियत बिगड़ गई और उसकी हिम्मत भी ना थी कि बिस्तर से उतर कर कुछ बना सके। जब नरेंद्र वापस आया तो रानी बिलख बिलख कर रोते हुए मिली। सिर्फ यही कहे जा रही थी कि मैं किसी काम की नहीं। नरेंद्र ने समझाया कि तुम अकेले रहती हो, दोस्त नहीं है इसलिए ऐसी सोच हावी हो रही है। एक काम करो ऑनलाइन ही अपने शहर की पुराने दोस्तों को खोजों और बाते करो। नरेंद्र की तरकीब काम आई। रानी पहले से ज्यादा खुश रहती। शुरू शुरू में हिचकिचाहट हुई बाद में अब तो दिन कैसे निकल जाता पता ना चलता। बातों बातों में दोस्तों ने कहा कि तुम अपनी रेसिपी शेयर करो। धीरे धीरे उसके बनाए खाने की रेसिपी प्रसिद्ध होने लगी। ऑनलाइन कई शेफ प्रतियोगिता जीत चुकी रानी अब यूट्यूब पर अपने चैनल पर लाइव खाना बनाना सिखाती थी। नरेंद्र ने भी भरपूर साथ दिया। सबके सहयोग और सलाह पर उसने केटरिंग एजेंसी का काम शुरू किया जिसमें नरेंद्र ने उसे पूरा सहयोग किया। आज स्टेज पर रानी को साल की महिला उद्यमी का खिताब दिया जा रहा था। अपनी व्हीलचेयर से खड़ी होकर जब रानी ने माइक पकड़ा तो उसे अपनी शारीरिक कमी अपने उद्यमों के सामने काफ़ी बौनी नजर आ रही थी। मुस्कराते हुए उसने अपना भाषण ख़त्म किया और हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था जिसमें सबसे जोरदार ताली नरेंद्र की थी।

©सुषमा तिवारी

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बेईमानी के बाजार में तेरे ईमानदारी के बोल लगेंगे
तू पलक झपका बस, वही लोग चोर कहने लगेंगे
क्यूँ कोशिश करता है बेकार मुर्दों को जगाने में
बड़ी मुद्दत और मेहनत लगती है ईमान बनाने में
-सुषमा तिवारी

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वृक्ष हूं

मांग रही हूं साफ़ हवा मैं
थोड़ी थोड़ी दोगे क्या
पेड़ लगाना भूल गए थे
बोलो अब करोगे क्या

कल तक जिसको कुछ ना समझा
आज मोल समझ में आया है
अपने अपने मतलब की करना
सबने आखिर यही सिखाया है

वृक्ष ना होंगे तुम जी जाओगे
कितनी सारी भ्रांति है
होश में आओ समय नहीं है
वृक्ष बचाओ क्रांति है


-सुषमा तिवारी

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वो कराह रही थी
वो तड़प रही थी
दर्द अब बर्दास्त के बाहर
पति से कह रही थी
मैं क्या करूं पता नहीं
मालूम तुम्हारी खता नहीं
पर वीआईपी लोगों को आना है
हमको यूँ ही सताना है
उनकी सुरक्षा ज्यादा जरूरी है
तुम मर भी जाओ किसको पड़ी है
ये लाल बत्ती इन्हें हमने ही दी है
ग़लती जान कर भी भयंकर की है
अब ये हमारी लाशों पर सुरक्षा पाएंगे
और मरती रहोगी तो भी वोट मांगने आएंगे
अब प्रजातंत्र है प्रिय
देखो प्रजा को मरना ही पड़ेगा
अब इस वीआईपी कल्चर का
हमे कुछ करना ही पड़ेगा
चलो आज तुम रो लो चिल्ला लो
मैं कुछ कर ना पाउंगा
वादा रहा आने वाली पीढ़ी को
इसके दुष्परिणाम जरूर बताऊँगा
सुने ना सुने कोई आवाज़ हमारी
पर ईन लोगों से गुहार लगाऊंगा

©सुषमा तिवारी

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प्यार में जाने कितनी शिकस्त खाए बैठे हो
कहो अब किस कयामत के इंतज़ार में हो

टुकड़ों को जोड़ जोड़ ये रूह लिए घूम रहे
फ़िर झूठ कहोगे की अब भी प्यार मे हो

#दूरी

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