swati singh solanki shahiba

जब पीली सरसों खेतों में खिलती है।
तब बसंत का रूप ये धरा धरती है।।
जब आमों पर मांजर का अंकुरण होता है।।
जब गेहूँ और जौ में बाली लहराती है।
तब ये धरा बसंती रुप धर इठलाती है।।
प्रेम के बीज दिलों में पनपने लगते हैं।
रंग बिरंगी तितलियों पर भंवरे मंडराने लगते हैं।।
जब सारी सृष्टि ऋतुराज का अभिनन्दन करती हैं।।
तब बसंत का रूप ये धरा धरती है।।

-Swati Solanki Shahiba

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रिश्तों की चुभन

गुजरे वक्त के साथ क्या क्या गुजर जाता हैं।
कुछ अपनों का साथ कैसे छुट जाता हैं।
अपनें ही करते हैं अपनों से जुदाँ
तमाशबीन बन क्यूं लेते है फिर मजा।
हंसती मुस्कुराती जिंदगी हो जाती है तबाह,
छोटी सी गलतफहमी को जब मिलती है थोड़ी हवा।
कुछ रिश्तें सिर्फ फूलों की आड़ में  शूल होते हैं,
जो सदा आपकों चुभन का एहसास देते हैं।।

-Swati Solanki Shahiba

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मत मनाओ तूम रोज डे,
बस रोज़ अपना थोड़ा वक्त दे देना।
मत करना कभी प्रपोज मुझे,
बस अपनी तकलीफ मुझसे ज़रूर बयां करना।
मत लाना कभी मेरे लिए चोकलेट,
बस दिन में एक बार मेरे साथ खाना खा लेना।
नहीं चाहती कोई टेडी या किमती चिज़,
बस कभी जल्दी घर भी आ जाना।।
नहीं चाहती कोई ऐसा वादा जो तुम्हें कोई तकलीफ़ दे,
बस अपनी हर तकलीफ में अपना भागी जरुर बनाना।
नहीं चाहती कि हर समय तुम्हारी बांहों में रखो,
बस शुकून से अपने कंधे पर अपना सर रखने देना।
प्यार का इजहार करने के लिए अधरो को मिलाने की जरूरत नहीं।
बस फिकर की मोहर मेरे माथे पर जरूर लगा देना।
मत बनना मेरे वेलेंटाइन ।
बस मेरे हमसफ़र हमेशा बने रहना।।

-Swati Solanki Shahiba

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जान जाती है एक औरत हर किसी की परेशानी दिल की।
अफसोस इस बात का है ,
उसके माथे पर आई शिकन किसी को दिखाई नहीं देती।।
क्या मंजर होता है, वह भी दुनिया का ।
एक तड़पती बेबस लड़की बेआबरू होती,
अपनों के बीच में ही,
पर  हर कोई तमाशा देखता है उसके बेइज्जती का ।
क्यों ?उसके लिए किसी के मुंह से आह तक नहीं निकलती।
क्यों?
एक लड़की अपनी मौत का कारण जानते हुए भी मौन हो जाती है ।
आखिर क्यों??
शायद इसीलिए
एक लड़की मां की कोख में ही मार दी जाती है।। आखिर क्यों??????

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और कितने मुखौटे,
धरे है तूने अपने तन पर।
राजदार तू खुद है अपनी सारी बेईमानों का।
फिर भी रखता है तू सब का हिसाब,
बड़ी शिद्दत से सब की अच्छाइयों का।।
किसने दिया है तुझे हक,
कि तु करें हिसाब दूसरों की ईमानदारी का,
है हिम्मत तो खुद से कर एक ईमानदारी
गिरेबान में अपने झांक और
हटा यह बेईमानी का मुखौटा जो तूने पहना है।
है हिम्मत ,है हिम्मत तो बात कर
आमने सामने पूरी सच्चाई से,
गीदड़ भभकी देना बंद कर
निकाल के फेक यह गीदड़ का मुखौटा।
सामने बैठ ओढ़कर सच्चाई का मुखौटा।।
दिखावे के मुखौटे से तु दुनिया के सामने भला बनता है,
पर क्या कभी खुद से तू नजरे मिला पाता है।।
शर्म कर ,शर्म कर और थोड़ी इंसानियत धर,
फेंक के दिखावट का मुखौटा इंसानियत की कदर कर।
पर तू रहने दे यह तेरे बस की बात नहीं है,
पर तू रहने दे यह तेरे बस की बात नहीं है।
सच्चाई के साथ जीना यह  तेरी औकात नहीं

स्वाति सिंह साहिबा

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वक्त के थपेड़े कभी सिखाना नहीं छोड़ते।
कुछ बुरे साए कभी पीछा नहीं छोड़ते।
समय पटल चलता रहता है अपनी गति से,
बस कुछ मंजरों के शूल कभी चुभना नहीं छोड़ते।।
















स्वाति सिंह साहिबा

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आप हमारे अनुकृति रूपाकार,
हम में आपके आदर और संस्कार।
शिक्षा का दिया हमें अपार भंडार।
आपके चरणों में हमारा शत् - शत् प्रणाम।

स्वाति सिंह साहिबा

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अपने बचपन को बचपन की तरह जीना,
सबसे बड़ी चुनौती बन गई है आज।
प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बचपन कहां बचा है आज।।
हर तरफ जीतने की होड़ है, न जाने जैसे यह कौन सा बोझ है।
बच्चे के हार जाने पर अभिभावक को अपनी बेइज्जती लगती है।
पर जीत का मजा भी तो हार के बाद यह आता है ।
ना जाने क्यों आज का अभिभावक यह भूल जाता है।।
लगे हैं हर तरफ बस जितने की होड़ में।
हार का मजा भी तो कोई ले इस प्रतिस्पर्धा के दौर में। ।

स्वाति सिंह साहिबा

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जौहर की गाथा सुनाती एक जवानी।
चितौड़ के क़िले में उठी वो ज्वाला भवानी।। राजपूती मर्यादा का मान ओढ़ें सतीत्व को उसने बचाया था।
छल्ली दुष्ट खिलजी को उसने उसके घर में घुसकर हराया था।
नारीत्व को बचाने चड गई शेरनी धधकती अग्नि कुंड की बेदी पर।
पापी नीच पहुंच भी न पाया मर्यादा की पेड़ी पर।।
पावन धरती आज भी हैं कहती वही रवानी ,
जौहर की गाथा सुनाती एक जवानी।
चितौड़ के क़िले में उठी वो ज्वाला भवानी।।

स्वाति सिंह साहिबा

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बातचीत का सिलसिला चलता रहे तो अच्छा है।
लोग एक दूसरे से जुड़े रहे तो अच्छा है ।।
समय की विडंबना है, ना मिल सको तो कोई बात नहीं।
एक दूसरे का हाल पूछते रहो तो अच्छा है।।


स्वाति सिंह साहिबा

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