मैं तारा गुप्ता लखनऊ (उ.प्र.) से‌ मेरी लेखन की मूल विद्या कविता व, गीत एवं कहानी हैं .मेरी रचनाएं अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. वर्तमान में मैं सद्ग्रहणी होने के साथ -साथ सहित्यिक गति विधियों के साथ ही सामाजिक गतविधियों में भी संलग्न हूं.

मौजों के साथ रहकर मिलता ही है किनारा
डूबी वहीं पर की कश्ती साहिल को जो बिसारा।।

अद्वितीय हो तुम, तुम्हारी बातें।
निराले हो तुम, तुम्हारी यादें ।
कट रही है जिंदगी इंतजार में,
तुम आओ तो कट जाएं, ये दिन दुख की सब रातें ।।

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जिंदगी बनी रहती पहेली है, उलझनों की डोर में हमको फंसाती है, हंसाती है, रुलाती है, सिखाती भी बहुत कुछ है

टूटे अहम का भाव जन से, संकल्प सिंचित ज्ञान हो। होवे सफल जीवन
सभी का,
अनहद सरस संगीत हो ।
हे करुणानिधे !अंतः करण से गहन तम
हर लीजिए।
ऋण उतारू इस धरा का, आत्म दोषों को निहांरु।
मनु धीर हो, गंभीर हो, विचलित न हो संसार में। विवेक दीपक जल उठे, प्रभु! ज्ञान प्रज्ञा दीजिए।

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हजार गिले शिकवे गिना दे मुझको। तुझसे कोई गिला नहीं ।बस एकबार आकर मिल तो ले मुझसे।।

फूल मुस्कुराए ऐसा उपवन तुम सजा दो।
मेरे मीत मेरे खातिर एक गीत तो गुनगुना दो।।

सारा उपवन महक गया होता यदि कलियां खिल गई होती ।अपनों को हम गले लगाते तो जिंदगी संवर गई होती।।

सांस तू स्वप्न के साकार होने तक ठहर
आंधियों की ठोकरों से हारकर न बिखर।

बिन कहे जब संवाद होने लगे
होंठ मुस्काए पलकें झुकने लगे ।
गीत संगीत सी प्रिये रवानी बनो
सरगम सा जीवन खनक जाएगा।।

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खिल उठे प्रणय दृष्टि के वो नयन
आज संयम की भी डोल जाएं कदम
थमें न कभी फागुनी ये बयार
रहे रंगों की निशदिन मध्यम फुहार
रंग उठे यह धरा रंग उठे ये गगन
मन के इस पार भी मन के उस पार भी।

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