भावों की ये, अभिव्यक्ति शब्दों के आधार है मेरी कलम ही, मेरे अस्तित्व की पहचान है.

मौसम अब सुहाने लगने लगे हैं,
जब से आप हमारे बनने लगे हैं

गम हो या खुशी हर हाल में अब,
हर पल हम यूंही मुस्कुराने लगे हैं

कोई साथ हो ना चाहिए अब हमारे,
वीराने भी हमें प्यारे लगने लगे हैं


चाहे किसी को भी देखे अब हम,
हर जगह तुम ही नजर आने लगें ,

मुझसे न पूछो मेरे दिल की हालत,
मिलने के अब बहाने बनाने लगे हैं

Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित

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बड़ा सुकून मिलता है,
इन तन्हा रातों में,
दिल ❤️ की बातें भी,
साफ सुनाई देती है,.. जी

Uma vaishnav

इंसाफ करें
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बढ़ता देख कर ये दुष्कर्म,
व्‍यतित हो रहा मेरा मन
जाने कब होगा ये ख़त्म,
जला जा रहा है अन्तर्मन
बढ़े जा रहे हैं ये दुष्कर्मी,
इन की दुनियाँ में नही कमी
जाने ये किस रूप में आये
पहचान उनकी कौन बताये
रावण, बालि, दुर्योधन भी,
वैसे तो थे वो बड़े ही धर्मी,
किन्तु स्त्री की लाज्ज को,
कर दिया छलनी - छलनी,
पुरुषोत्तम श्री राम ने माना,
बहन,माता,पुत्री या परस्त्री,
जो कोई इन पर डाले कुदृष्टि,
मिटा के रख दो उसकी हस्ती
फिर क्यू हम इतना विचार करें,
आओ चलो अब इंसाफ करें ।

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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उसने कहा,
सुबह तो रोज होती है,
आज क्या खास बात हैं?
हम ने कहा,
आज की सुबह में आप जो हमारे साथ हैं
Good morning ji
?☕☕

Uma vaishnav

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वो पूछते हैं,?
आज कल रहते कहाँ हो,
हमने कहा,
कोई अपने दिल ❤️का पता भी पूछता है क्या?? ? ?

Uma vaishnav

कभी कभी उदासी में,
भी कुछ गुनगुना लेना चाहिए
बड़ा सुकून मिलता है जी

Uma vaishnav

आदत चाहे कोई भी हो,
वो हमेशा तकलीफ ही देती है

Uma vaishnav

इन पन्नों में,
क्या ढूंढते हो,
साहब,
हमने तो सबक जिंदगी से ,
सीखे हैं

Uma vaishnav

अब मुझे अंधेरों में,
डर नहीं लगता,
क्यूं की कुछ लोग,
उजालो में
भी धोखा दे जाते हैं

Uma vaishnav

मुखौटे की भी,
एक अजीब कहानी है,
वजूद इसका तो,
कुछ भी नहीं,
फिर भी बदनामी,
उसी की होनी है

Uma vaishnav