भावों की ये, अभिव्यक्ति शब्दों के आधार है मेरी कलम ही, मेरे अस्तित्व की पहचान है.

😊😊

दिनांक :- 24/03/20
विषय :- संकट




आज ऎसा उठा है धुआंँ देखिए।
आग पहुंची कहाँ से कहाँ देखिए।।

आसमां भी हुआ गमनुमा देख कर।
आदमी तड़पता है यहाँ देखिए।।

चाल कैसी चली समय ने देख लो ।
तार टूट गया सासों का वहाँ देखिए।।

देख हालत उमा मै परेशान हूँ।
#संकट आया जग पे -जहाँ देखिए।।

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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गीत
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जरा जरा सा तन्हा है,
.....मेरा ये तन्हा मन.
मैं महकती साँस बनूँ,
तुम बन जाओ जीवन।

हमारा साथ ऎसा हो,
जुदा कभी कोई न ,
............. कर पाये,
मैं बहती नदी बनूँ,
तुम बन जाओ सागर।
जरा जरा....


ऎसी दास्तां लिखें
जो कभी कोई न ,
...... मिटा पाये,
मैं गहरी स्याही बनूँ,
तुम बन जाओ कलम।
जरा जरा........

ऎसी धुन बनाये,
जिसे कोई कभी न,
......... भूल पाये
मैं मधुर संगीत बनूँ,
तुम बन जाओ गज़ल।
जरा जरा.....


Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित

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चलों एक कागज की कस्ती, फिर से बनाए, बचपन की यादें फिर से दौराये।
उमा वैष्णव

कैद कर लो,
उन सभी पलों को,
जो लौट कर,
दुबारा नहीं आने वाले

Uma vaishnav

हर चेहरा मुझे आम नजर आता है
चेहरे में छुपा भाव नजर आता है
मगर जब भी मैं देखूँ माँ का चेहरा,
हरदम माँ में भगवान नजर आता है।

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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झूम रही,
बच्चों की टोली,
रंगों के संग,
पिचकारी बोली,
आप सब को मुबारक होली।
Happy Holi

Uma vaishnav

देखों इन रंगों को,
कैसे एक - दूसरे से,
मिल गये,
अब जुदा इन को कौन करें।
हमें भी इन रंगों से कुछ तो सीखना चाहिए 😊

Uma vaishnav

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तेरे रंग में, मैं रंग जाऊँ, मेरे रंग में तू रंग जाये, आओ कान्हा होली मनाये। Happy Holi Uma vaishnav