बचपन से लेखन, पठन-पाठन में रुचि. विभिन्न पत्र-पत्र्काओं में कहानियां, यात्रा-वृतान्त, संस्मरण और सामयिक आलेखों का निरन्तर प्रकाशन. कलमकार मंच, जयपुर द्वारा सर्वश्रेष्ठ कथा-सम्मान. विन्ध्य क्षेत्र की पहली महिला पत्रकार होने का गौरव हासिल. एक कहानी संग्रह- ’बातों वाली गली’ प्रकाशित. आकाशवाणी, विविधभारती और नोयडा एफ़एम से कहानियां नियमित प्रसारित. वर्तमान में स्वतंत्र लेखन.

मैने कभी ये सोच के कोई अच्छा काम नहीं किया, कि गांधीगिरि करूंगी, बस बचपन के संस्कार ऐसे थे, कि ग़लत करने की कभी हिम्मत नहीं हुई. झूठ बोलना पाप है- बताया था हमारे पापाजी ने, और आज भी झूठ से कोसों दूर हूं. सो बिना किसी प्रयास के लगभग रोज़ ही गांधीगिरि करती रहती हूं. खून में शामिल हो गयी है ये गांधीगिरि अब तो..... :) लिखने पर लगता है, जैसे मनगढ़ंत बात हो, लेकिन सच यही है, कि मेरी इस गांधीगिरि से मेरे परिवार वाले बहुत घबराते हैं. पतिदेव तो कहते हैं- ’किसी दिन घेरी जाओगी’ लेकिन क्या करूं... आदत से मजबूर हूं. आदत यानी वही-गांधीगिरि :)
#गांधीगिरि

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असल में मेरे अन्दर गांधीगिरि बचपन से भरी है. कहीं भी कुछ भी ग़लत दिखता है और मेरे भीतर का गांधी ज़िंदा होने लगता है, सिर उठाने लगता है अपना. लाख पिछले दिनों मैं संघमित्रा ट्रेन से पटना जा रही थी. ट्रेन में भीषण गंदगी, वो भी एसी कोच में. बस फिर क्या था? गन्दगी की बात हो और गांधी ज़ोर न मारे? सफ़ाई कर्मियों की जो क्लास ली, वो याद रखेंगे लम्बे समय तक. उन्हीं की झाड़ू से जो सफ़ाई अपने क्यूबिक में की, उसे यात्री भी न भूलेंगे. क्योंकि डांटा तो उन्हें भी था मैने, गन्दगी फ़ैलाने पर.

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