i am working as a Director in Lok Sabha Secretariat. I am a doctorate in Plant Sciences and literature is not much my cup of tea. I only write when either something impresses me or frustates me. Its a way to vent off feelings. I am a strong believer in truth and honesty and hate diplomacy , especially diplomatic people who dont have the guts to follow a set of principles in life and dont mind diluting their thoughts for petty gains...

today the 21st day of 21st year of 21st century

lets have 21 vows to end all penury

no food waste, no unnecessary haste

no torture and exploit

just supporting what is right

no to foetal ultrasound

to know the sex of baby bound

no to dowry and bride abuse

no tolerence to lame excuse

no to theft of anykind

be it tax or honey or wax

no to unnecessary electric points

lets use the solar joints

no to waste of water too

be it home malls or zoo

No to reckless driving

As roads are meant for surviving

No to everything that hurts our dignity

As a society ,nation and humanity.

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नारी शशक्तिकरण के विषय में सुन सुन कर ,सरकार की तमाम नीतियों में इसका आलेख और इसके लिए धनराशि का आबंटन देख कर और फिर भी नारी की अंतरात्मा में वही पुराने सवाल देख कर को मन उलझन से भर जाता है. मुझे समझ नहीं आता की नारी का ही शशक्तिकरण क्यों हो। पुरुष तो नारी से भी ज्यादा अशक्त है कई मामलों में. ये सच्च है की सिर्फ दो जून भोजन , पानी,और सर छुपाने के एक छत के लिए नारी को बहुत कुछ नहीं सहना पड़ता है पर ये इसलिए है की कभी किसी नारी ने पुरुष की कमजोरी को उसके सामने लाने का साहस नहीं किया, उसे तो बस ये सिखाया गया की पुरुष ही परमेश्वर है और नारी को उसका सम्मान करना हे है पिता भाई पति या पुत्र के रूप में. अगर वह बोलती है तो वाचाल कह कर परिवार नकार देता है, और आश्चर्य की परिवार में माँ भी बेटी की न हो कर बेटे की दामाद की तरफ़दार हो जाती हो, मन में बेशक उसके खटके की में गलत का साथ दे रही हूँ पर एक अनजाने दर की बेबसी उसको सही बोलनी से रोकती है. पुरुष और नारी के स्वाभिमान ,सम्मान को नापने की इकाई बहुत भिन्न है , जो छोटी मोटी बातो में थोड़ा थोड़ा अपमान का घूँट पी कर नारी बहुत स्वाभाविक रूप से अपना काम करती रहती है, कर्त्तव्य निभाती रहःती है , वहीं पुरुष इस सम्मान में एक प्रतिशत कमी में बवाल मचा देता है और परिवार हो या समाज वह इस बवाल का आरोप स्त्री पर डाल देता है। कितनी विचित्र बात है। मैं समझती हूँ जब तक नारी अपने को परिवार और समाज से अलग अपना एक व्यक्तिगत आंकलन नहीं करना आएगा, अपनी शक्ति को पहचानना नहीं आएगा ,वह हमेशा परावलम्बी रहेगी। शिक्षा के साथ साथ ये मेमन चिंतन भी ज़रूरी है , की उसे क्या करना होगा की पुरुष की भांति वह भी निश्चिंत जीवन जी सके , उसे अपने कर्तव्यों को करते हुए अपने आत्मसम्मान की रक्षा का मार्ग खुद ही ढूंढना होगा। उसे पुरुष को ये समझाना होगा की उस से उसको सिर्फ परस्पर सम्मान चाहिए, प्रेम चाहिए , और सम्मान पहली मांग है उसके बिना कुछ नहीं चाहिए.

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नारी शशक्तिकरण के विषय में सुन सुन कर ,सरकार की तमाम नीतियों में इसका आलेख और इसके लिए धनराशि का आबंटन देख कर और फिर भी नारी की अंतरात्मा में वही पुराने सवाल देख कर को मन उलझन से भर जाता है. मुझे समझ नहीं आता की नारी का ही शशक्तिकरण क्यों हो। पुरुष तो नारी से भी ज्यादा अशक्त है कई मामलों में. ये सच्च है की सिर्फ दो जून भोजन , पानी,और सर छुपाने के एक छत के लिए नारी को बहुत कुछ नहीं सहना पड़ता है पर ये इसलिए है की कभी किसी नारी ने पुरुष की कमजोरी को उसके सामने लाने का साहस नहीं किया, उसे तो बस ये सिखाया गया की पुरुष ही परमेश्वर है और नारी को उसका सम्मान करना हे है पिता भाई पति या पुत्र के रूप में. अगर वह बोलती है तो वाचाल कह कर परिवार नकार देता है, और आश्चर्य की परिवार में माँ भी बेटी की न हो कर बेटे की दामाद की तरफ़दार हो जाती हो, मन में बेशक उसके खटके की में गलत का साथ दे रही हूँ पर एक अनजाने दर की बेबसी उसको सही बोलनी से रोकती है. पुरुष और नारी के स्वाभिमान ,सम्मान को नापने की इकाई बहुत भिन्न है , जो छोटी मोटी बातो में थोड़ा थोड़ा अपमान का घूँट पी कर नारी बहुत स्वाभाविक रूप से अपना काम करती रहती है, कर्त्तव्य निभाती रहःती है , वहीं पुरुष इस सम्मान में एक प्रतिशत कमी में बवाल मचा देता है और परिवार हो या समाज वह इस बवाल का आरोप स्त्री पर डाल देता है। कितनी विचित्र बात है। मैं समझती हूँ जब तक नारी अपने को परिवार और समाज से अलग अपना एक व्यक्तिगत आंकलन नहीं करना आएगा, अपनी शक्ति को पहचानना नहीं आएगा ,वह हमेशा परावलम्बी रहेगी। शिक्षा के साथ साथ ये मेमन चिंतन भी ज़रूरी है , की उसे क्या करना होगा की पुरुष की भांति वह भी निश्चिंत जीवन जी सके , उसे अपने कर्तव्यों को करते हुए अपने आत्मसम्मान की रक्षा का मार्ग खुद ही ढूंढना होगा। उसे पुरुष को ये समझाना होगा की उस से उसको सिर्फ परस्पर सम्मान चाहिए, प्रेम चाहिए , और सम्मान पहली मांग है उसके बिना कुछ नहीं चाहिए.

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ज़िंदगी में ज़िंदगी से कीमती कुछ नहीं ,
सिर्फ सांस चले , ये तो जिंदगी नहीं।
#cost

just a proposal, we at matrubharti can devote every month to a social topic and discuss it here, it can be something like women health , problems faced by single mothers, domestic violence or in other angles swachchta abhiyaan and its effect, carefree childhood and responsible youth etc. Sharing of thoughts on common subjects would build a more responsible society and we would know our strengths and weakenesses as a society , so that we can work on ways to improve it. The matrubharti team can think on this.

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आज महिला सशक्तीकरण के युग में मुझे रक्षा बंधन को भी पुनः परिभाषित करने का मन है, कब तक बहिने पुराने जमाने के सोच अनुसार भाइयो की कलाई में इसलिए राखी बांधेगी की वो उनकी रक्षा करें , उनके सहायक होंगे आदि। आज तो राखी बांधनी का अर्थ होना चाहिए की हम भाई और बहन एक धरातल पर है, हमें एक से अवसर है और हम दोनों का आपस का सामंजस्य बना रहे ,हम एक दुसरे की निजता को, माणपरिवार को , इच्छा को सम्मान दे, परस्पर इसकी रक्षा करे

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कल फिर १५ अगस्त है,हमारा ७२ स्वतंत्र दिवस और साथ में रक्षा बंधन भी. इस बार ख़ास है १५ अगस्त , ३७० अब नहीं है और पूरा देश में एक विधान है। ये सब ठीक है, पर अब हम को स्वतंत्रा को भी समझना होगा, स्वतंत्रा माने सिर्फ जश्न नहीं, स्वतंत्रा माने जिम्मेदारी भी है.जिम्मेदारी अपनी, परिवार की ही नहीं बल्कि समाज की और देश की भी। जब तक हमारे अंदर ये भावना घर नहीं करेगी की हमको कुछ भी ऐसा नहीं करना है जिस से कही पर हमारा स्वारथ्य तो सिद्ध हो रहा हो पर देश के हिट में नहीं है वो तो हमें नहीं करना है हुमक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में नहीं आ पाएंगे हित
तो आइये इस स्वतंत्रा दिवस सिर्फ वंदे मातरम गाये ना बल्कि अपने आचरण को भी वंदनीय बनाये देश हित मे अपने आचरण को भी वंदनीय बनाये।

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#Blog
we were on a family vacation to America, me my husband and our chirpy ten year old daughter .It was a kind of dream vacation. It had been just five days when got the news that my dear father had suddenly expired due to cardiac arrest .We flew back A strange kind of vacuum engulfed me, the world looked strange and the feeling of attachment evaporated.I felt like a tree , growing all by myself with no links.either with my roots or my fruits. A strange version of life was painted. and what i concluded was that since we are mortals we need to train our mind and our circumstances on Mortality which perhaps we do not do.I would like to call it reverse spirituality. If we realize we r mortals we would realize how valuable this gift of life is, how precious each moment is and spend our time in constructive thought and work.We would hundred percent use our potential in congenial way. I feel every individual is a world in him or herself , one should be complete in his self and then associate himself in any other relation...be it parents ,spouse ,children, kith kin or friends.This may sound selfish but it is less painful and more gainful

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i strongly feel that we must all raise our voice against torture to babies and children. In metropolitan cities it is pathetic to see young women holding small kids , drowsing with some sedative and begging on the traffic signals. Most of these infants are the ones stolen by the different gangs involved in this .The government can not do every thing if we as citizens are not alert and vigilant. Lets spread the word and complain to the local police , post photographs of these infants and kids and help the police in finding these missing children .This actually leads to pushing the girls among these infants to prostitution and boys to different crimes once they grow up. We have to check this and so lets make a collective voice against these crimes and be the social guards.

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its dhanteras today and every one is busy celebrating the festival as per family traditions .I believe actual dhanteras would be a day when n there will be no ' TARAS" FOR DHAN,meaning every one will be having atleast finances to fullfill his or her basic requirements of food,shelter and education.This is only possible through good governance on the part of governments and duty bound citizens. The nature of accumulating wealth by few at the cost of welfare of many has to be done away with.....Lets pray our nations see's such dhanteras when we celebrate seventy five years of independence......

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