Hello, I’m a published author, book named Dhundhalee Tasveeren (A collection of poems). I’m also a Software Engineer.

वो जिसे महसूस होता हैं वही कह सकता हैं,
यह भूख की बात हैं, भूखा ही कह सकता हैं।

ऊँचे-ऊँचे हवामहल, यें मोती गहरे पानी के,
पर हाँ, रोटी के बिना कोई नहीं रह सकता हैं।

नमक रोटी खाकर वो भूखी अम्मा सो जाती,
और चौराहे पर पकवानों का ढेर लगा रहता हैं।

बर्थ्डे-पार्टी लाख तमाशे, दिखलावे के पुतले,
ठंडी में थरथराता वो बच्चा नंगा रह जाता हैं।

ख़ूब तरक़्क़ी हम सबने की बधाई हों विनय,
शिक्षा का अक्षर आज अनपढ़ सा दिखता हैं।

Vinay Tiwari
From “धूल से धूप तक”

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मेरा जैसा यार दुबारा कहाँ से लाओगे,
मेरा जैसा प्यार दुबारा कहाँ से लाओगे।

हाँ बेशक तुम राही हो पल-दो-पल की,
वो कच्चे आलू, अब किसे खिलाओगे।

राहों में फूल हों, नभ से पैग़म्बर भी उतरें,
उन ख़ुशबू की ज्योति अब कहाँ जलाओगे।

तेरे नयें-नयें वो पायल के बादल से घुँघरू,
सुर-ताल-लय-छंद अब किसे सुनाओगे।

अजनबी राही पर कविता की श्याहि भरी,
ग़ुस्से वाला प्यारा लहजा किसे दिखाओगे।

Vinay Tiwari
From “धूल से धूप तक”

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रंगी नज़ारा जैसे सुबह की अज़ान हैं,
बनारस के घाट की मस्तानी उजान हैं।

कुल्हड़ के चाय सी मीठी वो याद मेरी,
गाँव के पार जैसे मेरा वो मकान हैं।

रिश्तों के धागे यें कब टूट-गिर जाते,
दिलों में अब उसके थोड़ी थकान हैं।

रेत में मृग ख़ुद की ज़िन्दगी को ताके,
दिल में वृंदावन का कान्हा किसान हैं।

कुए के गहन से कई पीढ़ी जो तकती,
मेरा नमन उन सबको जो अंज़ान हैं।

Vinay Tiwari
From “धूल से धूप तक”

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उसके सामने मैं वो सारी बातें भूल जाता हुँ,
उससे प्यार करता हुँ, कहना भूल जाता हुँ।

वो अलग बात हैं कि अब यें रास्ते अलग हैं,
उसके जन्मदिन पर ख़ुद की उम्र भूल जाता हुँ।

मिलना नहीं होता, बात करना नहीं होता उससे,
समोसे अच्छे बने हैं उसे यें कहना भूल जाता हुँ।

किताबों से सारी वो दास्ताँ शुरू हुई थी हमारी,
नयीं किताबें ख़रीदी हैं उसे दिखाना भूल जाता हुँ।

वो नहीं मगर उसका तस्सवूर ही अब बयाँ होगा,
मुझे बुखार थोड़ा हैं मगर अब दवाई भूल जाता हुँ।

Vinay Tiwari
From “धूल से धूप तक”

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हवा का इशारा कुछ समझ में ना आया,
क्या खोया था उसने नज़र में ना आया।

पुरानी शराब में ज़रूर कुछ अलग-सा हैं,
सुना था जो वो मेरे ज़हन में ना आया।

हर बात पर नया मशवरा उनका होता हैं,
वो कुछ कहते रह गये वापिस ना आया।

दिखाकर हसीन ख़्वाब उसने रातें चुराली,
सब डूब गया फिर कुछ किनारे ना आया।

आइना बदल कर सब नया कर लिया हैं,
वो सूरत परेशां फिर सफ़र में ना आया।

Vinay Tiwari
From “धूल से धूप तक”

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एक ख़्वाब दिखा दे सजना,
कि रात में तेरी बाँहें और,
सिर्फ़ ये बिस्तर हो अपना,
एक ख़्वाब दिखा दे सजना।

इन रंग में डूबीं जाए,
वो रंग में मैं रंग जाऊँ,
तेरा नाम लिख-लिख कर,
बादल संग भिजवाऊँ।

एक ख़्वाब दिखा दे सजना...

रास्ता तेरा ताकूँ,
फिर थककर मैं सो जाऊँ,
द्वार पर तेरे आने का,
आहट सुन चली आऊँ।

एक ख़्वाब दिखा दे सजना...

भीगे बदन पर मेरे,
तू भी लिपट जायें,
कुछ मेरी ख़ामोशी में,
तू भी ख़ामोश हो जायें।

एक ख़्वाब दिखा दे सजना...

रात का चंदा जब भी,
तारो से शर्मायें,
तू उनको भी मेरा,
नाम झूम के सुनायें।

एक ख़्वाब दिखा दे सजना...

आँखे जब भी मेरी,
अस्क़ो से भर जाएँ,
उन आवो को तू तेरे,
होठों से सरकाएँ।

एक ख़्वाब दिखा दे सजना...

बातें मेरी जब भी,
थोड़ी काम पड़ जायें,
तू अपनी चादर को,
मेरी ओर बढ़ायें।

एक ख़्वाब दिखा दे सजना...

सो जाऊँ मैं जब रातों को,
तू सपनो में आयें,
ना सोयें ना सोने दे,
यूँही मुझे जगायें।

एक ख़्वाब दिखा दे सजना...





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