मन में उमड़ते भावों को शब्दों में ढालने का प्रयास रहता है और अच्छा लगता है जब दिल से बस यूँ ही लिखे को सुधीजनों का आशीर्वाद मिलता है

घूंघट की आड़ से
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कल ही अपने खेतों में जाना हुआ। एक पारिवारिक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए। कुछ बड़े बुजुर्ग भी थे तो थोड़ा घूंघट भी करना ही था कि तभी मन में मन्थन हमें मथने लगा कि कभी कभी पर्दा करते हैं तो निभा लेते हैं अगर रोज करना पड़े तो नानी याद आये। वैसे जब नई शादी हुई थी तो रोज करते भी थे।
तेज चलने की आदत, रोज ही कहीं न कहीं अटक कर गिरते पड़ते रहते। (अक्सर चोट भी खायी ही है हमने)
मन ही मन मुगलों को बुरा बुरा भी कह डाला।
कारण बस एक कि घूंघट हमारे देश का चलन कभी नही रहा। यह पर्दा प्रथा... मुगलों की जबरन थोपी हुई प्रथा है।
सुंदर हिन्दू नारियों को जबरन अपना बनाने के लिए उनका बलात्कार तक किया जाता और बस उनसे बचने के लिए महिलाओं ने अपना मुँह ढकना आरम्भ कर दिया।
मुगल गए अंग्रेज आये और अंग्रेजों को भी जाना पड़ा, बस रह गयी कुछ कुरीतियाँ प्रथाएं बनकर जिनको बिना सोचे समझे निभाते जा रहे हैं जबकि समय की माँग को समझना भी तो जरूरी है।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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पलायन
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देश के विभिन्न प्रदेशों से मजदूरों के पलायन से स्थिति और बदतर होती जा रही है। उनके भोजन और रात्रि प्रवास के साथ महामारी का भयानक साया भी मंडरा रहा है। अभी स्टार न्यूज़ पर रुबिका को ठेकेदारों की असवेंदनशीलता पर बोलते सुना तो खुद को रोक नही पाई।

आखिर ऐसी स्थिति के कारक कौन लोग है?

बहुत करीब से देखा है उन परिस्थियों को जिनको लिख रही हूँ।
एक व्यक्ति रोजी रोटी कमाने दिल्ली आता है 4 पैसे कमाने भी लगता है। धीरे धीरे वह पैसे जोड़कर और काम की बारीकियां समझ कर ठेकेदार बन जाता है। फिर अपने ही भाई बन्धुओं को दिहाड़ी मजदूरी के लिए बुला लेता है।

इस तरह दिल्ली में अधिकतर ठेकेदार भी बिहार और उत्तर प्रदेश से और मजदूर भी वहीं से।

बाहरी ठेकेदारों में सफलता का प्रतिशत मात्र 2% होता है बाकी ठेकेदारी बस दाल रोटी ही चला पाती है।
उन 2 प्रतिशत की चमक को देखकर गाँव के और लोग मजदूरी करने गांव छोड़कर शहर भाग आते हैं।
दिल्ली में सरकारी जगह पर झुग्गी डालकर रहना आरम्भ करते हैं फिर ये तबका एक बड़ा वोट बैंक बन जाता है जिसके चलते इन्हें बिजली, पानी जैसी सुविधाएं मुफ्त मिलती हैं।
यही वह लोग हैं जो दिल्ली की सरकार बनाने मे अहम भूमिका निभाते हैं।

अब मुसीबत के समय पलायन करने वाले दिहाड़ी मजदूरों की बदतर हालात के जिम्मेदार उन्हीं के भाई बन्धु हैं ना कि कोई और।
व्यथित हम भी हैं लेकिन अगर यह लोग नकली चमक की मृगतृष्णा छोड़ कर अपने गाँव मे ही कोई काम करते तो और 4 लोगो को रोजगार देते।

विशेष
****** हर राज्य के #मुख्यमंत्रियों से करबद्ध प्रार्थना है कि प्रत्येक नागरिक की रोजी रोटी का ऐसे ख्याल रखे कि किसी को अपनी जन्मभूमि अपना गांव छोड़कर जाना ही न पड़े।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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फीका रहा त्यौहार मेरा कोरी रही चुनरी
भीगी आँखे देख रही आईने में सूरत सूनी
जिसने रंगा रूह को, वो रंग न पाया देह
जाने कौनसी वो होली है जब बरसे रंगों का नेह

विनय...दिल से बस यूँ ही

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#साथी


सिर्फ एक दिन से क्या होगा
हर एक दिन हमारा है
उसके बिना अधूरी मैं
मेरे बिना वो अधूरा है
क्यों हावी होने दूँ उसको
करूँ मैं खुद को हावी क्यों
एक दूजे के पूरक हम
बस पूरकता में जीना है।
भेद सृष्टि का तुम समझो
नर नारी की भिन्नता को मानो
एक दूजे को अपनाकर
सम्पूर्णता में जीवन बहने दो।
तू और मैं की तकरार से
हुआ न भला किसी का है
तुम में मैं हूँ मुझमे तुम हो
हम में जीवन सुखमय है।

विनय....दिल से बस यूँ ही

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मेरी सकरात


छूटना नही चाहा तेरी बज़्म से
यादों के घनेरे पहरे नज़र आये
तोड़ना चाहा उन गिरहों को कभी
मजबूती से हम बंधे हुए पाये
जब भी देखा किये हम आईना
मेरे चेहरे में हमें आप नज़र आये
चाहा बहुत खुश रखना खुदा को
नाराज़गी के सौ बहाने नजर आये
काश कि एक दिन ऐसा भी आये
रूठने के तमाम बहाने खत्म हो जाएं
खुश हो जाये मेरा खुदा मुझ से
और जम कर रहम बरसाए
बिखर जाएं फूल बनकर उनके चरणों मे
जीने का मकसद सफल हो जाये
पिघल जाए घी के जैसे तेरी खिचड़ी में
शायद उस दिन मेरी सकरात हो जाये



विनय...दिल से बस यूँ ही

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भेड़चाल के विरुद्ध


मैं बढ़ती जा रही थी आगे ....और आगे,भीड़ का एक हिस्सा ही थी उस वक़्त।अचानक पीछे से मेरे कानों में आवाज आई....विनय..कोई बड़ी तेज आवाज में मेरा नाम पुकार रहा था।एक पल को ठिठकी और मुड़कर देखा तो पाया,विनय मैं अकेली ही नही और भी कोई है।मैं वापस मुड़कर फिर से चलने लगी।इस बार मेरे कदम थोड़ा तेज उठ रहे थे।

   अचानक फिर से कानों में आवाज आई लेकिन इस बार फुसफुसाहट सी।कोई बड़े हल्के सुर में मेरा नाम लेकर पुकार रहा था।मुड़कर देखा तो कोई नजर नही आया।

चलने को हुई तो फिर से आवाज आई।"तुम भीड़ का हिस्सा कब से बनने लगी। " एक जोरदार झटका लगा मुझे।सर उठाकर आस पास देखा तो सब कुछ अपरिचित सा।ऐसे क्या देख रही हो...मेरे कानों में फिर से वो हल्की सी आवाज आई लेकिन इस बार वो मुझे बड़ी मधुर लगी।मेरे अधरों पर मुस्कान खेलने लगी।गर्दन को हल्का सा झटका दिया और मैं वापिस मुड़ गयी।

     कदमों को एक बारगी फिर तेजी दी और अपनी धुन में मस्त चलने लगी।इस बार मुझे सामने से आती हुई भीड़ स्पष्ट नजर आ रही थी लेकिन मैं उसका हिस्सा नही थी।कोई मुझे घूर रहा था तो कोई मुंह बिचका रहा था,कोई मुझ पर हंस भी रहा था।इन सबसे बेपरवाह मैं मस्ती में झूमकर चलने लगी।मेरी चाल में एक लय आने लगी।

   थोड़ी दूर जाकर जब मैंने मुड़कर देखा तो कुछ लोगों को अपने पीछे आते पाया।सभी के चेहरे पर एक सन्तोष और विश्वास को पाया।दूर कहीं एक धुंधला सा साया दिखा जो कह रहा था ....हाँ ...देखो न ,यही तो है असली विनय।


विनय...दिल से बस यूं ही

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मेरा खुदा
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तेरी रूह का मिलना मेरी रूह से
घण्टों बतियाना हाले दिल सुनाना
पुरसुकून हासिल इन मुलाकातों में
इश्क को जी भर कर जी जाना

मिलने पर आँखों का चुराना
कतरा कर रास्ता बदल लेना
मुड़कर देखना मोड़ पर पहुंचकर
मुस्कुराना और आगे बढ़ जाना

रस्म - ए - उल्फत कुछ यूँ निभाना
दिल से चाहना जमाने से छुपाना
खुद से जियादा मेरे रसूख का ख्याल
मेरी नज़रों में तुझे खुदा कर जाना

विनय...दिल से बस यूँ ही

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स्तब्धता
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एक स्त्री होकर भी कुछ स्त्री व्यवहार हमारी समझ से बहुत परे हैं।
विकट परिस्थियों में घिरी स्त्री की हमदर्द अधिकतर वही महिलाएं बनती है जो उस परिस्थिति को झेल चुकी हैं या फिर कहना चाहिए कि वह हमदर्द होने का दिखावा अधिक करती हैं। ऐसे में अनुमानतः वह अपनी भोगी पीड़ाओं का चरम उस वक़्त पीड़ित स्त्री को सहन करने पर मजबूर कर देती हैं।
इस व्यवहार को स्त्री स्वभावगत ईर्ष्या तो हरगिज नही कह सकते, शायद वह चाहती है कि जो पीड़ा उसने सही वह दूसरी स्त्री भी समझे। इस फेर में वह उस वक़्त सही गलत भी भूल जाती है।
स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है यह उक्ति हर जगह चरितार्थ नही होती। कई बार संवेदनाओं के प्रवाह को शब्दचयन बाधित कर देता है। हमदर्द बनने की चाह में अनजाने में ही वह पीड़ित को और अधिक पीड़ा पहुँचा देती है।
यह भी हो सकता है कि उसके मन मे एक संतुष्टि का भाव हो कि शायद अब यह पीड़ित मेरी पीड़ा को समझेगी।
इस प्रक्रिया में एक स्त्री ना चाहते हुए भी कुछ घृणित रिवाजों को खुद ढोते हुए दूसरी स्त्री को भी ढोने पर मजबूर कर देती है।
परिस्थितिवश मजबूर हुई स्त्री के पास ईश्वर की सत्ता के कटु शाश्वत सत्य को स्वीकारने के इतर और कोई चारा भी तो नही होता। एक तो प्रिय परिजन के जाने का गहन दुख तीस पर समाज द्वारा थोपे गए रिवाज ।
इन रिवाजों का इतिहास भी किसी के पास नही है कि कहाँ से आरम्भ हुए और किसने इन्हें आगे बढाया। बस बिना सोचे समझे ढोते जा रहे हैं। वक़्त की संजीदगी को समझते हुए अक्सर पढ़े लिखे समझदार इंसान को भी ना चाहते हुए भी समाज के कथित ठेकेदारों के सामने झुकना पड़ जाता है।
एक स्त्री के विधवा होने पर जबरन उसकी दुनिया बदल दी जाती है जबकि एक पुरुष के विधुर होने पर उसके लिए नए मधुमास की उम्मीदें जाग जाती हैं।
पति के स्वर्गवासी होते ही पत्नी का श्रृंगार छीन लिया जाता है। बेड़ियों को और गहन कर दिया जाता है जबकि पुरुष के विधुर होने पर उसकी आज़ादी का बिगुल बजा दिया जाता है।
जब हम समानता की बात करते हैं तब यह भेदभाव किसी को नज़र नही आता।
स्त्री नई दुनिया बसाने में विश्वास नही रखती, वह बस अपनी बची दुनिया को सहेज कर रखना चाहती है।
जिसकी साँसे पूरी हुई वह चला गया, जो पीछे रह गया वह जिंदा है अभी। उसे जीने तो दो। जिंदा लाश बनाना चाहते उसे। धिक्कार है।
विद्रोही स्वभाव होने के बावजूद भी अक्सर ऐसी परिस्थितियों में मजबूरी स्तब्धता को जन्म देती है।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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