हिंदी हैं हम वतन है, हिन्दुस्तां हमारा

मेरा खुदा
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तेरी रूह का मिलना मेरी रूह से
घण्टों बतियाना हाले दिल सुनाना
पुरसुकून हासिल इन मुलाकातों में
इश्क को जी भर कर जी जाना

मिलने पर आँखों का चुराना
कतरा कर रास्ता बदल लेना
मुड़कर देखना मोड़ पर पहुंचकर
मुस्कुराना और आगे बढ़ जाना

रस्म - ए - उल्फत कुछ यूँ निभाना
दिल से चाहना जमाने से छुपाना
खुद से जियादा मेरे रसूख का ख्याल
मेरी नज़रों में तुझे खुदा कर जाना

विनय...दिल से बस यूँ ही

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स्तब्धता
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एक स्त्री होकर भी कुछ स्त्री व्यवहार हमारी समझ से बहुत परे हैं।
विकट परिस्थियों में घिरी स्त्री की हमदर्द अधिकतर वही महिलाएं बनती है जो उस परिस्थिति को झेल चुकी हैं या फिर कहना चाहिए कि वह हमदर्द होने का दिखावा अधिक करती हैं। ऐसे में अनुमानतः वह अपनी भोगी पीड़ाओं का चरम उस वक़्त पीड़ित स्त्री को सहन करने पर मजबूर कर देती हैं।
इस व्यवहार को स्त्री स्वभावगत ईर्ष्या तो हरगिज नही कह सकते, शायद वह चाहती है कि जो पीड़ा उसने सही वह दूसरी स्त्री भी समझे। इस फेर में वह उस वक़्त सही गलत भी भूल जाती है।
स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है यह उक्ति हर जगह चरितार्थ नही होती। कई बार संवेदनाओं के प्रवाह को शब्दचयन बाधित कर देता है। हमदर्द बनने की चाह में अनजाने में ही वह पीड़ित को और अधिक पीड़ा पहुँचा देती है।
यह भी हो सकता है कि उसके मन मे एक संतुष्टि का भाव हो कि शायद अब यह पीड़ित मेरी पीड़ा को समझेगी।
इस प्रक्रिया में एक स्त्री ना चाहते हुए भी कुछ घृणित रिवाजों को खुद ढोते हुए दूसरी स्त्री को भी ढोने पर मजबूर कर देती है।
परिस्थितिवश मजबूर हुई स्त्री के पास ईश्वर की सत्ता के कटु शाश्वत सत्य को स्वीकारने के इतर और कोई चारा भी तो नही होता। एक तो प्रिय परिजन के जाने का गहन दुख तीस पर समाज द्वारा थोपे गए रिवाज ।
इन रिवाजों का इतिहास भी किसी के पास नही है कि कहाँ से आरम्भ हुए और किसने इन्हें आगे बढाया। बस बिना सोचे समझे ढोते जा रहे हैं। वक़्त की संजीदगी को समझते हुए अक्सर पढ़े लिखे समझदार इंसान को भी ना चाहते हुए भी समाज के कथित ठेकेदारों के सामने झुकना पड़ जाता है।
एक स्त्री के विधवा होने पर जबरन उसकी दुनिया बदल दी जाती है जबकि एक पुरुष के विधुर होने पर उसके लिए नए मधुमास की उम्मीदें जाग जाती हैं।
पति के स्वर्गवासी होते ही पत्नी का श्रृंगार छीन लिया जाता है। बेड़ियों को और गहन कर दिया जाता है जबकि पुरुष के विधुर होने पर उसकी आज़ादी का बिगुल बजा दिया जाता है।
जब हम समानता की बात करते हैं तब यह भेदभाव किसी को नज़र नही आता।
स्त्री नई दुनिया बसाने में विश्वास नही रखती, वह बस अपनी बची दुनिया को सहेज कर रखना चाहती है।
जिसकी साँसे पूरी हुई वह चला गया, जो पीछे रह गया वह जिंदा है अभी। उसे जीने तो दो। जिंदा लाश बनाना चाहते उसे। धिक्कार है।
विद्रोही स्वभाव होने के बावजूद भी अक्सर ऐसी परिस्थितियों में मजबूरी स्तब्धता को जन्म देती है।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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महज संगीत में रुचि, कोई प्रशिक्षण नही।


विनय...दिल से बस यूँ ही

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फ़िल्म -- आर्टिकल 15



अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म जो काफी चर्चा में हैं।
एक सत्य घटना पर आधारित फिल्म जिसके फिल्माकंन में घटनाओं को बुरी तरह से तोड़ा गया है। सत्य को बैकफुट पर रखकर इसे जातीय रँग का जामा पहना दिया।
आयुष्मान खुराना का अभिनय एक क्षण के लिए भी अभिनय नहीं लगा। ऐसा लगा जैसे वो अपनी जिंदगी की कहानी हमारे सामने रख रहे हैं।
सयानी गुप्ता, मनोज पाहवा का अभिनय दमदार है। फ़िल्म के हर कलाकार ने अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया। दो तीन सीन को छोड़कर फ़िल्म रियलिस्टिक लगती है ड्रामा नही लगती। फ़िल्म को मात्र मनोरंजन के लिए नही देख सकते, काफी बातें है जो सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

भारत एक विकासशील देश है जहाँ विकास का मुद्दा जोर शोर से उबलता है, लेकिन क्या उतनी ही तेजी से होता भी है? यह एक बड़ा और गम्भीर सवाल है।
एक विशेष पिछड़ी जाति इस फ़िल्म का केंद्र रही। आज भी जिस तरह से गटर की सफाई की जाती है वह मन को विचलित करती है। हालांकि बड़े शहरों में ऐसी स्थिति नही है वहाँ मशीनों द्वारा यह कार्य सम्पन्न किया जाता है लेकिन दूर दराज के गांवों में क्यों नही?

समानता का अधिकार
और
आरक्षण का लाभ
एक ही व्यक्ति को दोनो चाहिए! यह कैसे सम्भव है?

एक जाति जो स्वयम ही दो धड़ों में बंटी हुई है, आरक्षण से लाभान्वित लोग और उससे वंचित जन।
एक ही जाति से जहाँ कुछ परिवार आरक्षण से पीढ़ी दर पीढ़ी पुनः लाभ उठाते जा रहे हैं वहीं कुछ परिवार ऐसे जिनमें सड़क पर झाड़ू लगाने की सरकारी नौकरी को ही जन्मसिद्ध अधिकार मानते है इस मानसिकता को क्या कहेंगे?
एक सीन में फ़िल्म के नायक की साथी का कहना कि - "राजा की जरूरत ही क्या है?"
हम कहते कि- "राजा विहीन देश की जनता को अनाथ समझ कोई भी दूसरा देश काबिज होने चला आएगा। राजा देश को दिशा देता है, दिशाविहीन समाज तो बहुत ही घातक परिणाम लेकर आता है।"
एक ईमानदार पुलिस कर्मी पर राजनैतिक दबाव ने जहां गटर की बदबू फैलाकर मन को विचलित किया वहीं उसकी कार्यप्रणाली ने पहली बारिश के बाद उठी मिट्टी की सौंधी सुगंध से महका दिया। अगर आप सत्य के लिए सत्ता से लड़ते हैं तो रास्ते भी खुद चलकर स्वागत के लिए खुल जाते हैं।
एक शब्द फ़िल्म में बारम्बार प्रयुक्त हुआ- वो लोग"
कौन हैं यह वो लोग?

यह वो लोग हैं जो बरसों से वोट की राजनीति को गर्म कर रहे हैं? जिसका लाभ हर पार्टी ने उठाया।
इनमें हिम्मत नही आरक्षण के खिलाफ़ कदम उठाने की और ना ही किसी दल ने हिम्मत दिखाई इसे खत्म करने की।
यह कभी नही कहेंगे कि हम भी बाकी सभी की तरह मेहनतकश इंसान हैं तो पिछड़े क्यों घोषित हैं?
आज़ादी के 70 साल बाद भी जो पिछड़े विशेष दर्जे से लाभ लेकर भी अगड़े नही बन जाये तो भगवान ही मालिक है।
लिखने को इस मुद्दे पर बहुत कुछ है मगर समझदार को इशारा काफी है।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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उसके हिस्से का अमृत
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वो सबला थी अबला घोषित हुई
समर्थ थी आश्रित बना दी गई
जब खुद को साबित करने चली
नजाकत उसे छोड़ कर चली गई।

खड़ी दोराहे पर सोच में डूबी हुई
खता उससे कब और कहाँ हो गई
चाहा कंधे से कंधा मिलाकर चलना
मगर चार कदम वह आगे बढ़ गई।

अनजाने में कुछ अनचाही सी कर गई
मर्द की मर्दानगी को आहत कर गई
और करीब आने की ज़िद थी उसकी
दिल से ना जाने वो कब उतार दी गई।

घर, बच्चे, रिश्ते नाते संभालती रही
मर्द को हर दर्द से मुक्त करती रही
थोड़ा सा खुद के लिए जो जीने लगी
अपनो की आंखों की किरकिरी बन गईं।

मुड़कर नही देखेगी अब एक पल को भी
प्रगति के पथ पर सभी को पछाड़ने लग गई
जवाब देगी सटीक हर बात का तुरंत ही
कर्तव्यों सँग अधिकार भी समझने लग गई।

अब लद चुके वह दिन जब सभी कहते थे
पुत्र जायदाद और बेटियां इज्जत संभालती हैं
सँग ही इज्जत के अब वह जम कर
पिता की जायदाद को संभालने लग गई।

मार खाती है एक ही बात से हर बार
ईश्वर ने उसे ग्राह्ता बनाकर भेज दिया
झूठे दम्भ को संतुष्टि का पोषण देने
पुरुष उसके बलात्कार पर उतर चला।

जननी थी वह जनानी बनकर रहती थी
मर्दानी का रूप वह धरने लग गई
शारीरिक कमजोरी को भी हर पल
तर्ज पर लौहपुरुष की संवारने लग गयी।

हर घड़ी हलाहल पीती चली गई
अवधूत की कृपा फिर भी न पा सकी
अब फेंक दिया उसने हलाहल का पात्र
अपने हिस्से की सुधा अर्जित करने लगी

संघर्ष यहाँ खत्म नही होता उसका एक पल
घर सँग बाहरी दुनिया में तालमेल बैठा गई
महज अपना काल्पनिक घरौंदा बचाने को
झूठे मर्दाने अहम को पोषित करती चली गई।

बढे कदम अब उसके रुकने का नाम न लेंगे
बदलाव की बयार को सुनामी करती चली गई
समझना होगा अब मर्द को हर पल हर घड़ी
समानता का दर्जा सम्मान सँग पाकर ही रुकेगी।

वह नारीवाद का सहारा छोड़ चल दी
अपनी धुन में जुटी रहती हर पल हर घड़ी
नही जरूरत अब उसे सहारे की सुन लो
मजबूती से सहारा कमजोरों को देगी






विनय...दिल से बस यूँ ही

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उजास
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मेरे मन के उजास में
थोड़ा धुंधलापन आया
ऐसा कुछ लगा जैसे
एक कोने में अंधेरा छाया।

क्या कुछ पल को
किसी चिंता ने तुम्हे डसा
जिसके भारी दंश से
मेरे मन का उजास घटा।

हाँ, एक कोना मेरे मन का
जिसमें तुम्हे संजो कर रखती
दमकता है दहकता है
तुम्हारी खुशी और गम से ही।

तुम कहोगे नही कभी
इतना तो यकीं है मुझे
ये अनकहे अहसास मगर
जीने भी देते नही मुझे।

कह दो जो शूल मन मे हो
मेरे उजास से कालापन दूर हो
नही भाती कालेपन की परछाई
नूरे-उजास से फिजाओं को रंगने दो।

एक नूर बरसता है
तुम्हारे कहकहों से हर पल
उस नूर में जम कर
मुझे नहा लेने दो हर क्षण।

हर पल जिंदगी कम हो रही है
एक पल को सौ बार मुझे जीना है
मानव जन्म मिला मुश्किल से
अंधेरों में इसे नही खोना है।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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जाने क्या बात है, कुछ तो बात है तुझमे,
मुकम्मल होंगे ख्वाब, यकीन फिर जगने लगा है
बेज़ार मृत सी पड़ी, उम्मीद उफनने लगी है मुझमें
खत्म है आंखों का मलाल, समा सुरमई सा हो गया है,


विनय...दिल से बस यूँ ही

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#काव्योत्सव

सुखनवर इश्क

लम्हों ने दास्तां बनाई है
इश्क सुखनवर है मेरा
वारी जाऊं एक इशारे पर
जान, हुकुम तो कर जरा

जो पल गुजरे पहलू में तेरे
मेरी सांस अटकी है वहीं
महकना मेरा आगोश में तेरे
होश छोड़े हैं हमने वहीं

फिर से वही पल दो मुझे
एक प्यास अभी बाकी है
तेरे संग गुजरे लम्हों की
जुस्तजू हर शै पर भारी है।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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#काव्योत्सव


एक शाम कान्हा को मस्ती छाई
थोडा सा झुके फिर ली अंगड़ाई
देख उन्हें राधा मन ही मन मुस्काई
लाज के मारे मगर कुछ शरमाई
पास आये मचल कर कन्हाई
थोडा सा हंसे फिर विनय से बोले
अरी राधे सुन, तुम हो मेरी सखी
क्यों छुपाती हो मुझसे अपनी हंसी
ना मैं भोला कतई ना नादाँ हूँ मै
सोलह कलाओं से भी परिपूर्ण हूँ मैं
अरी, फिर भी मुझे बनाती हो तुम
अपनी चाहत मुझसे छुपाती हो तुम
राधा थोड़ी सी सकुचाई
मन ही मन अचकचाई
लाज से भारी हुए नेत्र
मन की बात ना कह पाई
सच में छलिया है ये भारी
मन की भावना पढ़ डाली इसने सारी
अहसास था वो है बड़ा ही ज्ञानी
मगर अज्ञानता की चादर मैंने तानी
कान्हा का प्रेम ना पाई मैं अजानी
उफ़, यह कैसी मैं कर बैठी नादानी
कान्हा अब हुए मथुरा के वासी
अब रो रोकर बाट जुहारे राधा रानी
गिरे प्रीत के फूल हो गए पल में रेत
पछताए अब होत क्या जब चुग गयी चिड़िया खेत
तभी बजी भोर की घंटी और मैं झुँझलाई
एक पल को शरमाई फिर खुद पे ही हंसी आई



विनय.....दिल से बस यूं ही

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#काव्योत्सव


पुरुष मन अबुझापन
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अवधूत का अद्वैत बनना चाहती हूँ
सुनो,
हाँ कुछ पल को
मैं पुरुष बनना चाहती हूं
नारी हूँ गर्विता भी हूँ
मगर
अर्धनारीश्वर को जीना चाहती हूँ
चाहती हूँ समझना
पुरुष के मन की पीड़ा
पढ़ना चाहती हूँ उसका मन
लेनी है थाह
उसकी गहराइयों की
कैसे एक स्त्री को
बाँध लेता है
खुद बंधे बगैर
कैसे रोक लेता है आँसू
अपनों के दर्द को जीकर
क्या कोमलता नही
उसमें जर्रा भर भी
या कठोरता ही नियति उसकी
एक स्त्री जीती है
कोमलता कठोरता के संगम को
क्या पुरुष में इतनी
सक्षमता नही
या वंचित रखा है ईश्वर ने
कोमल भावनाओं से उसे
या फिर डरता है वह
एक स्त्री को जीने से
छीन लेगा यह जमाना
पुरुष होने का गौरव
लगा देगा उस पर मोहर
एक जनाना मर्द की
जो विशेषता होकर भी
उसके अंतर्मन को कचोटेगी
पुरुष के दम्भ को
नागिन सा डस लेगी
एक पल को जो मिले आशीष
अर्धनारीश्वर का मुझे
दिमाग में जहर बोते
सवालों का तो जवाब मिले
जी लूँ कुछ पल नर जीवन के
पुरुष की व्यथा के पट तो खुलें।

विनय...दिल से बस यूँ ही

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