मेरे मन में उस डर का बीज शायद तभी रोपा गया था, जब पिछले दिनों पापा मेरे ग्यारहवें जन्मदिन ...
इस मकान को उषा अपना अधीन राज्य मान कर चलती है और हम परिवार वालों को अपनी प्रजा। ...
वाराणसी से कोई मिलने आया? अपने अभिवादन के साथ ही उषा पिता से पूछ बैठी । बल्लियों उछल रहे ...
जब एक बड़े शहर के जाने- माने अस्पताल में मेरी नियुक्ति हुई तो मैं फूली न समायी। ...
घड़ी में तीन बजे थे जब जाई बिस्तर से उठ कर बैठ ली थीं। ...
बिजली की तार बेचने वाली अपनी दुकान की सीढ़ियों पर उस छोटे बच्चे को देख कर पहले तो मैं ...
मेरे लिए दरवाज़ा बहन ने खोला। “और कौन आया है?” अंदर ...
लेखिका: दीपक शर्मा ड्यूटी रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर के साथ ...
क्या मैं मृत्युलोक में हूं? स्वर्ग आ पहुंचा हूं? धरती और ...
कुंती को वह खेल अकस्मात ही सूझा था। टंडन मेम ...