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आरव घर में बहुत स्ट्रीक होकर रहता था दादी को छोड़ कर सभी घर वाले उससे डरते थे आर...
मी कोण?हा वेदान्तामधला “मी कोण?” हा प्रश्न नाहीये. हा प्रश्न लेखकाबद्दल आहे, तो...
ભાગ - ૩: ઝેરીલી સવાર અને શતરંજની ચાલઅમદાવાદના આકાશમાં સૂર્ય હજુ હમણાં જ ડોકિયું...
ઈ.સ 1993: જ્યારે RDX એ ભારતની સુરક્ષા વ્યવસ્થાને હચમચાવી દીધી! શું તમે જાણો છો...
---तीसरे पहर का सपना प्रस्तावनातीसरा पहर — दिन का वह समय जब सूरज अपनी तपिश खोने...
ಬೆಂಗಳೂರಿನ ಆ ಬೆಳಗಿನ ಜಾವ ಎಂದಿನಂತಿರಲಿಲ್ಲ. ಹಕ್ಕಿಗಳ ಚಿಲಿಪಿಲಿ ಸದ್ದಿನ ಬದಲು ಗಾಳಿಯಲ್ಲಿ ಒಂ...
मुजरिमकमल चोपड़ाशोर-शराबा तो ऐसे मचा था जैसे कोई जीता-जागता आतंक गाँव में घुस...
તમે પણ આ શબ્દ સાંભળ્યો જ હશે. કે આપણે તો મોટા ઘરના કહેવાય. આપણે આ રીતે ના બો...
काया एक शातिर दिमाग औरत थी। वह भूपेंद्र के चेहरे पर छाई हवाइयों और उसकी उखड़ी सा...
અજેય મનોબળનું અમોઘ શસ્ત્ર: ગોલ્ડા મીરની કથા अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रव...
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की रसोई से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस ज...
मजबूरी की शादीबारिश की वो रात भूला न जाने वाली थी। पटना की तंग गलियों में पानी की धाराएँ तेज़ी से बह रही थीं, सड़कें नदियों में बदल चुकी थीं। मानो आसमान भी अनन्या मिश्रा के आँसुओं...
Heroine: शानवी सिंह Hero: कार्तिकेय (दिन में बिल्ली, रात में इंसान) शानवी सिंह को अकेलापन काटने दौड़ता था। बड़े शहर में छोटी सी नौकरी, छोटा सा कमरा और दिन भर का शोर… लेकिन रात...
15 अक्टूबर 2003 को दिल्ली की अस्पताल में मेरा जम्म हुआ था. उस वक़्त वक़्त तेज बारिश हो रही थी.मुझे देखकर मेरे माता पीता खुश हो गये थे. मैं काफ़ी शरारती थी. नर्स ने मुझे प...
दस वर्षीया पारुल दौड़ती जा रही है। नदी के किनारे-किनारे। रेत पैरों में चुभ रही है, मगर वह हँस रही है। बालों में दो चोटियाँ हैं, हरी फ्रॉक हवा में लहरा रही है। पैरों में...
'જય શ્રી કૃષ્ણ' વાંચક મિત્રો! આજ એક ન્યુ ધારાવાહિક નિલક્રિષ્નામાં પ્રવેશ કરવા જઇ રહી છું. વાંચક મિત્રો તમારો સાથ, સહકાર હંમેશા મળતો રહ્યો છે, અને આગળ પણ મળતો રહે! એવી અપેક...
चारों तरफ एक ऐसी रोशनी थी जो धूप से छनकर, हल्की सी अयान के चेहरे पर पड़ रही थी। अयान रॉय, अपनी कोठी की बालकनी में खड़ा था। हवा में, एक शाही रसूख की महक थी। उसने अपनी शर्ट की आस्तीन...
एक ही शहर, दो दुश्मन और वो पुरानी चोट दरभंगा की तपती दुपहरी में राजवीर राठौर और भानु प्रताप ठाकुर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। दोनों का रसूख ऐसा कि परिंदा भी पर न मारे। राजवीर स...
ही कथा पूर्णपणे काल्पनिक असायला हवी होती खरंतर. कारण उगाच दोन जीवांची ताटातूट. त्यातून आलेली उदासीनता... आणि शेवटी अधुरं राहिलेलं एक स्वप्नं जे दोघांनी पाहिलेलं... अनेक उतार आणि चढ...
આજના સમયમાં જે પ્રમાણે ટેકનોલોજીનો વિકાસ થઇ રહ્યો છે, તેટલી જ ઝડપથી માહિતીનું પણ આદાન પ્રદાન થઇ રહ્યું છે. એક સમયે એવો હતો કે, માહિતી સંતાડવી અને તેણે જાહેર થતી રોકવી ખુબ જ સહેલું...
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