ऋगुवेद सूक्ति-- (10)की व्याख्या"न रिष्येत त्यावत: सखा"ऋगुवेद --1/91/8भावार्थ --हे ईश्वर !आपका सखा (भक्त) कभीनष्ट नहीं होता।ऋग्वेद १।९१।८ का पूरा ...
ऋगुवेद सूक्ति--(11)की व्याख्या"एको विश्वस्य भुवनस्य राजा"ऋगुवेद --6/36/4भावार्थ -समस्त लोकों का वह स्वामी एक है।इसका पूरा मंत्र अर्थ सहितऋग्वेद ६.३६.४ ...
ऋगुवेद सूक्ति-(१२) की व्याख्या-“त्वमस्माकं तव स्मसि”ऋगुवेद --८/९२/३२भावार्थ --प्रभु ! तू हमारा है हम तेरे हैं।यह आत्मसमर्पण, आश्रय और दिव्य–संबंध ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (१३) की व्याख्याअधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा — ऋग्वेद ७/२९/३भावार्थ --हे प्रभो ! हमारी पुकार को सुनो।पदच्छेद--अधाम । ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (१४) की व्याख्याऋग्वेद के मंत्र “यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति""… (१.१६४.३९)भावार्थ --ब्रह्म-तत्त्व को जाने बिना वेद-मंत्रों का पाठ ...
ऋगुवेद सूक्ति--(१५) की व्याख्यातवेद्धि सख्यम् स्तृतम्। १/१५/५भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है।पद-विश्लेषण--तव = तेरा / आपकाएव इद्धि ...
ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१भावार्थ --हमारे अन्दर कंजूसी न हो।पद विच्छेद --मान्तः — भीतर, अन्तर मेंस्थूः/स्थुर्नः — ...
ऋगुवेद सूक्त.(१७) की व्याख्यामन्त्र — ऋग्वेद १०/११७/१उतो रयिः पृणतो नो पदस्यति।भावार्थ -दान करने वाले का धन नहीं घटता।पदच्छेद--उत + ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (18) की व्याख्या"अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व" 10/34/13भावार्थ--जुआ मत खेलो, खेती करो।ऋग्वेद का यह मन्त्र द्यूत (जुआ)के दुष्परिणामों ...
ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या-“जाया तप्यते कितवस्य हीना”भावार्थ --जुआरी की पत्नी दीन हीन होकर दुख पाती है।ऋग्वेद १०.३४.१० (अक्षसूक्त)यह मंत्र ...