रात का अंधेरा गहराता जा रहा था। बाहर सन्नाटा पसरा था, लेकिन मेरे भीतर एक अजीब-सी हलचल थी। हाथों ...
वह शाम बाकी दिनों जैसी नहीं थी। कमरे में अजीब-सी ख़ामोशी थी, जैसे दीवारें भी मेरी तन्हाई सुन रही ...
------उस शाम मैं अकेला ही सिनेमा हॉल की ओर चला गया था। ज़िंदगी के तमाम सवालों और उलझनों से ...
जिंदगीनामा – शुरुआत यह मैं हूँ… और यह ‘मैं’ शब्द यहाँ अहंकार का प्रतीक है। अहंकार वह शक्ति है ...
कुछ एहसास ऐसे होते हैं जिन्हें अल्फ़ाज़ में बयां करना मुश्किल होता है। ये शायरी उन ही लम्हों की दास्ताँ ...