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वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत ‎- 3

by vikram kori

‎ part -3‎‎सुहानी मोबाइल को देखे जा रही थी।‎‎स्क्रीन पर वही शब्द रुके हुए थे—‎“Harsh is typing…”‎‎उसने एक पल ...

वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत ‎- 2

by vikram kori
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‎ PART–2‎सुहानी को घर पहुँचते ही एहसास हुआ कि कुछ छूट गया है।‎‎बैग खोला।‎डायरी थी।‎चाबियाँ थीं।‎मोबाइल था।‎‎लेकिन चार्जर नहीं ...

वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत ‎- 1

by vikram kori
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‎ पार्ट - 1‎सुहानी को भीड़ पसंद नहीं थी, लेकिन अकेलापन उससे भी ज़्यादा डराता था।‎शहर की यह शाम ...

समर्पण से आंगे - 13 - (अंतिम भाग )

by vikram kori
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‎भाग – 13 last part‎‎‎‎लेकिन समाज‎अब भी बाहर खड़ा था।‎‎माँ ने पूछा—‎“फैसला कर लिया?”‎‎सृष्टि ने जवाब दिया—‎‎“हाँ। मां जी ...

समर्पण से आंगे - 12

by vikram kori
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‎भाग – 12‎‎‎गाँव की मिट्टी‎आज सृष्टि के पैरों को‎पहले जैसी नहीं लगी।‎‎न डर था,‎न अपनापन—‎बस एक ठोस सच्चाई।‎‎अंकित उसके ...

समर्पण से आंगे - 11

by vikram kori
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‎भाग – 11‎‎‎रात बहुत भारी थी।‎ऐसी रात, जिसमें नींद आँखों से नहीं‎सोचों से भाग जाती है।‎‎सृष्टि खिड़की के पास ...

समर्पण से आंगे - 10

by vikram kori
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‎भाग – 10‎‎‎शाम का समय था।‎सृष्टि की सिलाई मशीन आज कुछ ज़्यादा देर तक चलती रही।‎‎काम अब बढ़ने लगा ...

समर्पण से आंगे - 9

by vikram kori
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‎‎भाग – 9‎‎‎स्टेशन पर उतरते ही सृष्टि ने गहरी साँस ली।‎‎वही शहर,‎वही सड़कें,‎लेकिन अब उसकी चाल में झिझक नहीं ...

समर्पण से आंगे - 8

by vikram kori
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‎‎‎भाग – 8‎‎बस की खिड़की से बाहर भागती सड़क‎सृष्टि की आँखों के अंदर भी भाग रही थी।‎‎नया शहर।‎नई जगह।‎और ...

समर्पण से आंगे - 7

by vikram kori
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‎‎भाग – 7‎जब बदनामी ने दरवाज़ा खटखटाया‎समाज जब हारने लगता है,‎तो वह सच से नहीं,‎बदनामी से हमला करता है।‎‎अगली ...