उमस कैलाश बनवासी तांगेवाले ने घोड़े की लगाम खींच दी।तांगा रूक गया।जाने किस हड़बड़ी में पहले माँ नीचे उतरी।सूटकेस भी माँ ने संभाल लिया।तांगेवाले की ओर बढ़कर पूछा—कित्ता पैसा हुआ? —दो रूपये।तांगेवाला इत्मीनान से बीड़ी पी रहा था। मैंने रोकना चाहा माँ को—रहने दो माँ..। —तू चुप रह। माँ ने मुझे मीठी झिड़की दी।मैं बरबस मुस्कुरा पड़ी।ग्वालियर में ऑटो का भाड़ा देते वक्त भी माँ ने यही जिद की थी।माँ ए ेसी छोटी—छोटी बातों के लिए लड़ने की हद तक जिद्दी है। उस चौरस्ते से माँ ए क गली की तरफ बढ़ी। मैं भी उस संकरी गली में उनके पीछे—पीछे