उज्जैन एक्सप्रेस - 6

  • 408
  • 120

एक महीना बीत चुका था...   उज्जैन स्टेशन की वही चिरपरिचित चुप्पी अब भी बरकरार थी। ट्रेनों की आवाज़ें, यात्रियों की भीड़, और उस एकांत बेंच की खामोशी — सब कुछ वैसा ही था। लेकिन अब वहाँ हवा में एक अदृश्य भारीपन था, जिसे कोई देख नहीं सकता था, पर महसूस हर कोई करता था।   एक सुबह शहर की नींद एक अख़बार की ख़बर ने तोड़ दी:   "पिछले एक महीने में पाँच युवाओं ने उज्जैन एक्सप्रेस के सामने कूदकर आत्महत्या की। पाँचों की जेब से एक-एक डायरी मिली, जिनमें उनकी अंतिम लिखावट थी — पर सबसे हैरान करने