“राजू… उठ जा बेटा… चल, काम पर नहीं जाना है क्या?” राजू की माँ उसे रोज़ सुबह जल्दी जगा दिया करती थी, जिससे वह हमेशा चिढ़ जाता था। वह अपने कानों पर हाथ रखकर चादर फिर से मुँह तक खींच लिया करता था। “माँ, थोड़ी देर और सोने दो ना…” राजू मुँह बनाकर कहता। माँ उसे अफ़सोस भरी नज़र से देखती और फिर दोबारा आवाज़ लगाती, “राजू बेटा, सुबह जल्दी उठने से दिन अच्छा गुजरता है और इंसान के सारे काम बन जाते हैं।” इतना कहकर माँ रसोई की ओर बढ़ जाती और राजू बड़बड़ाता रह जाता। “हाँ, जल्दी उठने