ट्रेन धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ती रही और कुछ ही घंटों बाद वह उस छोटे से स्टेशन पर आकर रुक गई, जहाँ से मिश्राइन का गाँव अधिक दूर नहीं था।मिश्राइन और दोनों बच्चियाँ सामान समेटकर नीचे उतरीं। स्टेशन छोटा था, लेकिन वहाँ की हलचल किसी बड़े स्टेशन से कम नहीं थी। इधर-उधर अपने घर जाने की जल्दी में लोग भागते नज़र आ रहे थे।प्लेटफॉर्म पर ही उनका देवर उन्हें लेने आया हुआ था।वह गाँव के ही एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक था।मिश्राइन को देखते ही उसने आगे बढ़कर सामान उठा लिया और मुस्कुराते हुए बोला—“भाभी, सफर में कोई दिक्कत