इंसानियत का इनाम कमल चोपड़ाएक गाँव के एक सेठ का किसी ने दरवाजा खटखटाया। रात का वक्त था। ‘इस वक्त कौन हो सकता है?’ यह सोचते हुए सेठ ने दरवाजा खोला। देखा सामने एक चालीस-बयालीस वर्ष का अनजान आदमी एक छोटी-सी गठरी लिए हुए खड़ा था। उसके कपड़े फटे हुए थे और हाथ-मुँह आदि कई जगहों से खून रिस रहा था।सेठ ने पूछा, ‘कौन हो तुम? क्या चाहते हो?’उस घायल आदमी ने कहा, ‘मुसीबत का मारा राहगीर हूँ। इस गाँव के पास से गुजर रहा था कि रास्ते में कुछ लुटेरों ने मुझे सेठ समझकर मुझ पर हमला कर दिया।