-------------- "प्रेम यदि पुर्ण हो तो भुला दिया जाता है। उसकु अधूरे स्वरूप को ही पूजा जाता । प्रेम मे विरह वेदना नही...उस प्रेम की परिक्षा जो हर श्वास मे केवल प्रियतम के मान की रक्षा चाहता है। मै भी यही चाहती हूं ! इसलिए अपनी इस देह को आज समाप्त कर रही हूं । " कहकर वो अग्निकुंड मे प्रवेश कर गई। उसकी देह से आग की लपटे उठने लगी। वो जलने लगी किसी जिवंत चिता की भांती। वो महादेव के मंदिर का प्रांगन था। मंदिर चार स्तंभ पर खडा था । हर स्तंभ हर युग