आतिश- ए है जुनूँ

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मोह मोह के धागेमोह मोह के धागे.... वो उस बारह मंजिला की पाँचवी मंज़िल थी । सुरज़ ढलने को था । हवा में हल्की सी सर्द मोहरी थी । पत्थर की बनी उस बालकनी का रंग गहरा ख़ाकी था जहाँ जगह-जगह कथई और सफ़ेद धब्बे उभर आए थे… वो उस पर बैठी हुई थी उसके पैर हवा में झूल रहे थे और उसे पता था की उसकी उपरी और निचली मंज़िल पर कोई नहीं रहता था । इस वक़्त उसके हाथ में एक ग्लास था जिसमें ढेर सारे पुदीने के पत्ते और कटे हुए नींबू के स्लाइस थे वो लेमन मिन्ट