पत्नीजी के नखरे

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कर्माजी की पत्नीश्री उसको ठिठुरती ठंड में झिंझोड़कर उठाई और खुद रजाई में दुबकते हुए नाराजगी जताई, ‘‘उठो भी; कब तक खर्राटे भरते रहोगे? इतना सोने के बावजूद तुम्हारी नींद कभी पूरी नहीं होती। दिनभर कौन-सा पहाड़ खोदते रहते हो, जो थककर चूर हो जाते हो। आफिस में फखत कुर्सी तो तोड़ते हो।’’