पत्नीजी के नखरे

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कर्माजी की पत्नीश्री उसको ठिठुरती ठंड में झिंझोड़कर उठाई और खुद रजाई में दुबकते हुए नाराजगी जताई, ‘‘उठो भी; कब तक खर्राटे भरते रहोगे? इतना सोने के बावजूद तुम्हारी नींद कभी पूरी नहीं होती। दिनभर कौन-सा पहाड़ खोदते रहते हो, जो थककर चूर हो जाते हो। आफिस में फखत कुर्सी तो तोड़ते हो।’’इसके बावजूद कर्माइन का मन नहीं भरा। वह पड़ोसी लाला के घर की ओर हाथ मटकाकर बोली,‘‘देखो, जरा उनकी ओर! कितने पत्नीव्रता हैं वे? मुंह अंधेरे उठ जाते हैं और झाड़ू-पोछा-बरतन निपटाकर ललाइन के लिए जलपान का इंतजाम करते हैं। पति हो, त