एपिसोड 1: सोने का पिंजरा खामोशी की भी अपनी एक भाषा होती है, और रणजीत सिंह के इस पाँच सौ गज में फैले आलीशान महल में वह भाषा 'मौत' के समान सर्द थी। यह सन्नाटा कानों को नहीं, सीधे रूह को झकझोर देता था। महल की भारी-भरकम, सीलन भरी दीवारों के भीतर हवा इस कदर ठहरी हुई थी, जैसे समय ने यहाँ आकर अपना दम तोड़ दिया हो। ऊँची छतों से लटकते विशाल झूमर भी रोशनी से ज़्यादा परछाइयाँ उगल रहे थे। यहाँ आधुनिकता के नाम पर कोई शोर नहीं था—न टेलीविज़न की चकाचौंध, न ही कंप्यूटर की स्क्रीन की