घर का आँगन

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घर तो आज भी वही है, पर जिस आँगन में जीवन हँसता-खेलता था, वो आँगन अब न रहा।उस आँगन में बचपन पला-बढ़ा करता था। कभी हँसी के ठहाके गूँजा करते थे तो कभी बिन आँसुओं की दहाड़ें। चारपाई के चारों ओर चोर-पुलिस का खेल हुआ करता था और माँ की थपकी को बैट बनाकर घुमाते फिरते थे। क्यारियों में बड़े चाव से सब्ज़ियाँ लगाते, पेड़ से मीठे अमरूद तोड़कर खाते और थक जाने पर नीम की छाँव में सो जाया करते थे। बचपन तो आज भी वही है, पर वो खेल का मैदान अब न रहा।गर्मियों में सूरज ढलते ही