अनाथ - अध्याय 2

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रात गहरा चुकी थी। अनाथालय के लंबे बरामदों में सन्नाटा पसरा हुआ था। टूटी हुई खिड़कियों से आती ठंडी हवा दीवारों से टकराकर अजीब-सी आवाज़ें पैदा कर रही थी। बाहर चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ था और पूरा परिसर अंधेरे में डूबा था। लेकिन... स्टोर रूम के अंदर बैठा मानव सो नहीं रहा था। उसकी पीठ पर डंडों के ताज़ा निशान थे। चेहरे पर चोट के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे। फिर भी उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। वह चुपचाप उसी पुराने संदूक के सामने बैठा था, जो वर्षों से किसी ने खोला तक नहीं था। दिन