चलो दूर कहीं..! - 26

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चलो दूर कहीं.. 26 प्रतीक्षा को जीवित देखकर जैसे उसकी माँ के प्राण लौट आए थे ! महीनों से बिछावन में पड़े रहने के बाबजूद भी ना जाने उसमें कहां से इतनी शक्ति आ गई थी कि वह एक झटके में उठ बैठी थी और उसके गालों को थरथराते हाथों से सहलाते हुए बोली रही थी,"तू इतने दिनों तक कहां थी बेटा.. तुझे पता है तेरे बापू ने तुझे मरा हुआ मानकर तेरा क्रिया कर्म भी करा दिया.. मैं.. उनसे कहती रही कि मेरी प्रतीक्षा जिंदा है, वो इस तरह मर नहीं सकती कहीं चली गई होगी.. एक न एक दिन