रिया को लोग प्यार से 'नन्ही चिड़िया' कहते थे। अनाथ थी वह, माँ-बाप का साया बचपन में ही उठ गया था, पर उसकी आँखों में सपनों की चमक कभी कम नहीं हुई। उसे अपना घर चाहिए था, अपनी छत, अपनी छोटी-सी दुनिया, जिसे वह तिनका-तिनका जोड़कर खुद बनाना चाहती थी। इसके लिए वह दिन-रात मेहनत करती थी। उसके चेहरे पर न बनावटी मेकअप होता, न बातों में चालाकी, बस एक निश्छल सच्चाई थी जो पहली नजर में ही मन को छू जाती थी।एक दिन वह शहर की एक बड़ी कंपनी में साक्षात्कार देने गई। कंपनी का सीईओ एक युवा था,