उसके चारों ओर एक सुनहरे रंग की परत है जो कि आसमान तक जाती है। जितनी ऊँची उसकी निगाहें फैल सकती हैं, वहाँ तक सब कुछ अस्पष्ट नज़र आता था। कालापन अब और भी बढ़ गया था। पास में एक चिमनी से ऊँचे-ऊँचे काले बादल निकल रहे थे। मदन को यही लगता था कि इसी से बादल बनते हैं, क्योंकि कुछ ऊँचाई के बाद यह धुआँ भी बादल का हिस्सा हो जाता था। वह उस चिमनी को देखे जा रहा था। तभी उसे एक मज़दूर ने आकर कहा, जो कि अपने मुँह में गुटका भरे हुए था, "मदन, तू यहाँ क्या कर रहा है? तेरा काम हो गया ना? जा, घर जा। स्कूल भी जाना।" इतना कहकर वह चला गया।
सुनहरा फलक - 1
कहानी: सुनहरा फलकउसके चारों ओर एक सुनहरे रंग की परत है जो कि आसमान तक जाती है। जितनी ऊँची निगाहें फैल सकती हैं, वहाँ तक सब कुछ अस्पष्ट नज़र आता था। कालापन अब और भी बढ़ गया था। पास में एक चिमनी से ऊँचे-ऊँचे काले बादल निकल रहे थे। मदन को यही लगता था कि इसी से बादल बनते हैं, क्योंकि कुछ ऊँचाई के बाद यह धुआँ भी बादल का हिस्सा हो जाता था।वह उस चिमनी को देखे जा रहा था। तभी उसे एक मज़दूर ने आकर कहा, जो कि अपने मुँह में गुटका भरे हुए था, "मदन, तू ...Read More
सुनहरा फलक - 2
वह बैठकर शराब की बॉटल खाली करने में लगा हुआ है।उसका हर रोज़ का सबसे कर्तव्य होता है कि दारू पिए फिर पत्नी से लड़ाई करे। उसे मारे, पीटे, धमकाए। असल मायनों में यह संघर्ष में उसकी आर्थिक तंगी से उपजा है, जो उसे कई चीज़ों में जकड़े हुए है। एक मर्तबा तो चीख-चिल्लाहट इतनी ऊँची उठी कि उसके अंत में मदन की माँ ने उसके बाप का सिर फोड़ दिया। उस दिन उसने ज़्यादा पी ली थी, तब भी वह उसे गालियाँ देता रहा। जब माथे की गर्मी गुस्से के साथ ठंडी हुई और सिर भारी हुआ, तो ...Read More