यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई -( 48)

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                : : प्रकरण  - 48 : :         मैं अगले इतवार को बिभूति को छोड़ने कुर्ला टर्मिनस पहुंच गया था. उस का टिकिट बुक था और बोगी नंबर मेरे पास थे. इस वजह से उसे ढूंढने में कोई दीक्क़त नहीं हुई थी.        मैंने रेलवे स्टेशन से उस के लिये नास्ते के पैकेटस ख़रीदे. सफर लंबा था. उस की मौसी ने भी उसे टिफिन भर के दिया था.        उस पर बिभूति ने मुझे अपनी बेटी की तरह डांट दिया था.         " बडे पापा!